कुपोषण

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नीचे दिए गए आरेख से जाहिर होता है कि शहरी इलाके की अपेक्षा ग्रामीण इलाके में प्रति व्यक्ति-प्रतिदिन कैलोरी की खपत ज्यादा है। बहरहाल दोनों ही इलाकों में एनएसएस के आकलन के मुताबिक प्रति व्यक्ति-प्रतिदिन कैलोरी की खपत में कमी आयी है।

कैलोरी की खपत प्रति व्यक्ति-प्रतिदिन (किलो कैलोरी में)

कैलोरी की खपत प्रति व्यक्ति-प्रतिदिन (किलो कैलोरी में)

स्रोत: न्यूट्रीशनल इनटेक इन इंडिया: 2004-2005, एनएसएस 61 वां दौर का आकलन, जुलाई 2004- जून 2005

न्यूट्रीशनल इनटेक इन इंडिया: 2004-2005, (एनएसएस 61 वां दौर का आकलन)  के अनुसार - 

  • उपभोक्ता के खर्चे पर केंद्रित सर्वेक्षण से पता चलता है कि ग्रामीण इलाके की भारतीय जनता अपने कुल खर्चे में ५५ फीसदी और शहरी इलाके की भारतीय जनता अपने कुल खर्चे का ४२.५ फीसदी भोजन पर खर्च करती है।साल १९९३-९४ में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएस) के अन्तर्गत ऐसा ही सर्वेक्षण हुआ था। पिछले सर्वेक्षण से तुलना करें तो जाहिर होता है कि कुल खर्चे में भोजन पर किया गया खर्च ग्रामीण इलाके में ८ फीसदी और शहरी इलाके में १२ फीसदी घटा है।
  • पिछले सर्वेक्षण (यानी १९९३-९४) से इस सर्वेक्षण (यानी २००४-०५) की तुलना करें तो पता चलता है कि ग्रामीण इलाके की जनता के रोजाना के कैलोरी उपभोग में औसतन १०६ किलो कैलोरी (४.९ फीसदी) की कमी आयी है जबकि शहरी इलाके की जनता के रोजाना के कैलोरी उपभोग में औसतन ५१ किलो कैलोरी की गिरावट आयी है।साल १९९३-९४ में ग्रामीण इलाके में रोजाना का औसत कैलोरी उपभोग २१५३ किलोकैलोरी और शहरी इलाके में २०७१ किलोकैलोरी था जो दस साल बाद घटकर क्रमशः २०४७ किलो कैलोरी और २०२० किलो कैलोरी रह गया।
  • अगर रोजाना २७०० किलो कैलोरी के उपभोग को मानक मानें तो ग्रामीण इलाके में ६६ फीसदी और शहरी इलाके में ७० फीसदी लोग मानक किलो कैलोरी से कम का उपभोग करते हैं।
  • पंजाब (२७६३),उत्तरप्रदेश (२७४३)  और राजस्थान (२७१४) के ग्रामीण इलाकों में प्रति उपभोक्ता-प्रतिदिन कैलोरी का उपभोग राष्ट्रीय औसत से बेहतर था ।झारखंड (३०१३), बिहार (२६८३) और पंजाब के शहरी इलाकों में भी रोजाना के कैलोरी उपभोग के लिहाज से स्थिति राष्ट्रीय औसत के मुकाबले बेहतर थी । दूसरी तरफ, कर्नाटक (२२७६) और तमिलनाडु के ग्रामीण इलाकों में और महाराष्ट्र (२२६१), कर्नाटक (२३८५) और तमिलनाडु (२३९४) के शहरी इलाकों में प्रति उपभोक्ता-प्रतिदिन कैलोरी उपभोग राष्ट्रीय औसत से कहीं कम था।प्रति व्यक्ति-प्रति दिन कैलोरी उपभोग का राष्ट्रीय औसत २०४७ किलो कैलोरी का है और इस पैमाने पर असम ,बिहार, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और उत्तरप्रदेश की स्थिति राष्ट्रीय औसत से अच्छी थी।
  • उड़ीसा के ग्रामीण इलाकों के ७९ फीसदी,  छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाको के ७८ फीसदी  और झारखंड के ग्रामीण इलाकों के  ७५ फीसदी  लोगों को कैलोरी उपभोग का ७५ फीसदी हिस्सा सिर्फ अनाज से हासिल होता है। इसकी तुलना में पंजाब (५० फीसदी), हरियाणा (५४ फीसदी) और केरल (५४ फीसदी) में कहीं कम लोगों को अपने रोजाना के कैलोरी उपभोग के लिए सिर्फ इनाज पर निर्भर रहना पड़ता है।
  • साल १९९३-९४ से २००४-०५ के बीच भारत  ग्रामीण इलाके में प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन प्रोटीन के उपभोग में कमी आयी है। साल १९९३-९४ में प्रति व्यक्ति प्रोटीन की खपत ६२.२ ग्राम थी जो साल २००४-०५ में घटकर ५७ ग्राम हो गई। शहरी इलाके में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन प्रोटीन का उपभोग इस अवधि में ५७ ग्राम पर स्थिर बना रहा।
  • यह बात सही है कि शहरी और ग्रामीण इलाके में उपभोक्ताओं के रोजाना के कैलोरी उपभोग में एक दशक के भीतर कमी आयी है लेकिन न्यूनतम जरुरी प्रोटीन और वसा के उपभोग के लिहाज से देखें तो दोनों ही इलाकों में इनके उपभोग में इजाफा हुआ है। भारत के ग्रामीण इलाकों में प्रति उपभोक्ता प्रतिदिन ७० ग्राम प्रोटीन का उपभोग हुआ जबकि शहरी इलाके में ६९ ग्राम। वसा का उपभोग ग्रामीण इलाके में (४४ ग्राम) शहरी इलाके के उपभोक्ताओं(५८ ग्राम) की तुलना में कही कम हुआ।.
  • साल १९९३-९४ से २००४-०५ के बीच प्रति व्यक्ति-प्रतिदिन वसा के उपभोग में इजाफा हुआ है। यह बात ग्रामीण और शहरी भारत दोनों पर समान रुप से लागू होती है। ग्रामीण भारत में दस सालों के भीतर वसा के उपभोग में ३१ ग्राम के मुकाबले ३५ ग्राम (१३.१ फीसदी) का इजाफा हुआ तो शहरी भारत में ४२ ग्राम के मुकाबले ४७ ग्राम यानी १३ फीसदी का।
  • राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो घर में खाए जाने वाले भोजन की बारंबारता में कमी आयी है। भाजन की आदतों में आया यही बदलाव कुछ बड़े राज्यों मसलन गुजरात, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश में भी दीखता है। पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाकों में घर में खाये जाने वाले भोजन की बारंबारता में कोई बदलाव नहीं हुआ। जहां तक शहरी भारत का सवाल है, पिछले एक दशक में घर में भोजन खाने की बारंबारता में लगभग डेढ फीसदी की कमी आयी है।
  • राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो पिछले एक दशक में ग्रामीण भारत में घर के सदस्यों द्वारा घर ही पका भोजन खाने की घटना में ०.५७ फीसदी की कमी आयी है। शहरी भारत में यह गिरावट १.६६ फीसदी की हुई है।
  • ग्रामीण भारत में ५ से ९ और १० से १४ साल की उम्र के बच्चों और किशोरों में घर से बाहर भोजन लेने की घटना बाकी आयु वर्ग की तुलना में कहीं ज्यादा है। इसका एक कारण मिड डे मील योजना हो सकती है।

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