कुपोषण

कुपोषण

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वर्ल्ड बैंक के आकलन के मुताबिक :
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  • भारत में औसत से कम वजन के बच्चों की तादाद दुनिया में सबसे ज्यादा और अफ्रीका के सबसे गरीब माने जाने वाले मुल्कों की तुलना में दोगुनी है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कुपोषण की समस्य़ा कुछ इलाकों में बहुत ज्यादा है। भारत में ५ राज्यों और ५० फीसदी गांवों में कुल कुपोषितों की तादाद का ८० फीसदी हिस्सा रहता है।
  • पिछले एक दशक में कुपोषण की परिघटना में बड़ी थोड़ी सी कमी आई है। १९९२-९३ में भारत में औसत से कम वजन के बच्चों की तादाद ५३ फीसदी थी जो १९९८-९९ में घटकर ४७ फीसदी रह गई।
  • पांच साल से कम उम्र के ७५ फीसदी बच्चों में आयरन की कमी है और ५७ फीसदी बच्चों में विटामिन ए की कमी से पैदा होने वाले रोग के लक्षण हैं। देश के ८५ फीसदी जिलों में लोगों के आहार में आयोडीन की कमी है।  
  • बाल-कुपोषण, बाल-मृत्यु और व्यस्क व्यक्तियों के रोगी होने की मुख्य वजहों में एक है। कुपोषण के कारण बच्चों का संज्ञानात्मक विकास ठीक से नहीं हो पाता । आकलन के अनुसार बाल-मृत्यु की ५० फीसदी घटनाओं की बड़ी वजह कुपोषण है। मलेरिया,डायरिया और न्यूमोनिया से होने वाली बाल-मृत्यु की घटनाओं के लिए कुपोषण की स्थिति ५० फीसदी से भी ज्यादा जिम्मेदार है।भारत में रोगों के उपचार के ऊपर जितना खर्च होता है उसका २२ फीसदी हिस्सा बचाया जा सकता है बशर्ते बाल-कुपोषण की स्थिति पैदा ना हो।
  • भोजन की कमी का असर बच्चों के संज्ञानात्मक और शारीरिक गत्यातमकता के विकास पर पड़ता है। कुपोषित बच्चे शिक्षा ग्रहण करने के मामले में पिछड़े रह जाते हैं। इसका असर उनकी उत्पादकता पर पड़ता है। पोषाहार की कमी का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। आकलन के मुताबिक पोषाहार की कमी से भारत की अर्थ व्यवस्था को सालाना ढाई अरब अमेरिकी डॉलर का घाटा होता है। 
  • भारत में बाल-कुपोषण की मुख्य वजह बच्चों में संक्रमण का लगना और उनको साफ-सफाई के साथ आहार का ना मिलना है। भारत में बच्चों का सर्वाधिक कुपोषण जन्म के बाद के पहले तीन सालों में होता है जबकि भारत में आम मान्यता यह है कि बच्चों को प्रर्याप्त मात्रा में आहार नहीं मिलता इसलिए वे कुपोषित रह जाते हैं। इस मान्यता के कारण कुपोषण को दूर करने के लिए जो सरकारी कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं उनका जोर आहार की मात्रा को संतुलित करन पर है ना कि बच्चों के लालन-पालन की आदतों को बदलने पर।
  • जिन प्रान्तों में बाल-कुपोषण की स्थिति ज्यादा है वहां समेकित बाल विकास योजना के तहत ज्यादा राशि खर्च की जानी चाहिए लेकिन स्थिति इसके ठीक उलट है। ज्यादा कुपोषण वाले राज्यों में समेकित बाल-विकास योजना के मद में कम राशि दी जा रही है और अपेक्षाकृत कम कुपोषण वाले राज्यों में ज्यादा। ज्यादा कुपोषण वाले राज्यों में समेकित बाल विकास योजना के तहत चलाए जाने वाले केंद्रों की संख्या भी अपेक्षाकृत कम है। पांच राज्यों-राजस्थान, उत्तरप्रदेश, बिहार, उड़ीसा और मध्यप्रदेश में औसत से कम वजन के बच्चों की तादाद सबसे ज्यादा है जबकि समेकित बाल विकास योजना के प्रसार के मामले में ये राज्य नीचे के दस राज्यों में शामिल हैं।
  • औसत से कम वजन के बच्चों की तादाद दूसरे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के दौरान शहरों (३८ फीसदी) की अपेक्षा गांवों (५० फीसदी) में ज्यादा पायी गई। लड़कों(४५.४ फीसदी) की तुलना में लड़कियों(५३.२ फीसदी) में औसत से कम वजन के बच्चों की संख्या ज्यादा थी। जातिवार आकलन में पाया गया कि अनुसूचित जाति के बच्चों में ५३ फीसदी और उनुसूचित जनजाति के बच्चों में ५६ फीसदी बच्चे औसत से कम वजन के हैं जबकि बाकी जातियों में इनकी तादाद ४४ फीसदी है।

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