कुपोषण

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नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे-३ यानी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के  अनुसार-

  • राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो औसत से कम लंबाई के बच्चों (तीन साल तक की उम्र वाले) की तादाद कम हुई है। नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे-२ के दौरान ऐसे बच्चों की तादाद ४५.५ फीसदी थी जबकि नैशमल फैमिली हैल्थ सर्वे-३ के दौरान ३८.४ फीसदी। नैशनल फैमिली हैल्थ सर्वे-३ के दौरान औसत से कम लंबाई के बच्चों की सर्वाधिक तादाद उत्तरप्रदेश (४६ फीसदी) में थी। इसके बाद छ्तीसगढ़ (४५.४ फीसदी) और गुजरात में (४२.४ फीसदी)।
  • राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो उम्र के लिहाज से सामान्य लंबाई मगर कम वजन के बच्चों की तादाद (इसका आकलन ३ साल की उम्र तक के बच्चों के बीच किया गया)  बढ़ी है। नेशलन फैमिली हैल्थ सर्वे-२ में ऐसे बच्चों की तादाद  १५.५ फीसदी थी जबकि नेशलन फैमिली हैल्थ सर्वे-३ में १९.१ फीसदी।नेशलन फैमिली हैल्थ सर्वे-३ के आकलन से जाहिर होता है कि  उम्र के लिहाज से औसत लंबाई मगर कम वजन के बच्चों (तीन साल तक की उम्र वाले) की तादाद मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा (३३.३ फीसदी) थी। इसके बाद नंबर झारखँड (३१.१ फीसदी), मेघालय (२८.२ फीसदी) और बिहार (२७.७ फीसदी) का है।
  • औसत से कम वजन के बच्चों की तादाद में नैशनल फैमिली हैल्थ सर्वे-२ की तुलना में थोड़ी सी कमी आयी है। एनएएफएचएस-२ के दौरान ऐसे बच्चों की तादाद राष्ट्रीय स्तर पर ४७.० फीसदी थी जबकि एनएफएचएस-३ के दौरान ४५.९ फीसदी। औसत से कम वजन के (तीन साल तक की उम्र वाले) बच्चों की तादाद मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा (६०.३ फीसदी) थी । इसके बाद झारखंड (५९.२ फीसदी),बिहार (५८.४ फीसदी), गुजरात (४७.४ फीसदी) और उत्तरप्रदेश (४७.३ फीसदी) का नंबर है।

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