कुपोषण

कुपोषण

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यूनिसेफ द्वारा प्रस्तुत इम्प्रूविंग चाइल्ड न्यूट्रीशन: द एचीवेवल इम्पीरेटिव फॉर ग्लोबव प्रोग्रेस (अप्रैल, 2013) नामक दस्तावेज के अनुसार
http://www.unicef.org/publications/files/Nutrition_Report_
final_l o_res_8_April.pdf
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साल 2011 तक भारत में, कुपोषण के कारण सामान्य के कम लंबाई के बच्चों की संख्या 6,17,23,000 (लगभग 6.17 करोड़) थी यानि विश्व में कुपोषण के कारण जिन बच्चों की लंबाई सामान्य से कम है, उनकी कुल संख्या का 37.9 फीसदी हिस्सा भारत में है।

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दक्षिण एशिया में तकरीबन 28 फीसदी बच्चों का वज़न जन्म के समय सामान्य से कम होता है। दक्षिण एशिया में 39 फीसदी बच्चे कुपोषण के कारण सामान्य से कम लंबाई के हैं। साल 2005-06, के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक 5 साल से कम उम्र के 48 फीसदी बच्चे (कुपोषण के कारण) सामान्य से कम लंबाई के हैं।

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भारत के सर्वाधिक धनी राज्य महाराष्ट्र में 2 साल से कम उम्र के 39 फीसदी बच्चे साल 2005–2006 कुपोषण के कारण सामान्य से कम लंबाई के थे। लेकिन राज्यव्यापी न्यूट्रीशन सर्वे के अनुसार साल 2012 में ऐसे बच्चों की तादाद 23 फीसदी पायी गई है।

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महाराष्ट्र राज्य के सर्वे के आंकड़ों के शुरुआती नतीजों से पता चलता है कि साल 2012 में 6-23 माह के मात्र 7 फीसदी बच्चों को न्यूनतम जरुरी पोषाहार हासिल होता है।

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दक्षिण एशिया के सर्वाधिक धनी और गरीब परिवार के बीच तुलनात्मक रुप से देखा जाय तो जहां गरीब परिवारों में कुपोषण के कारण सामान्य से कम लंबाई के बच्चों की संख्या 59 फीसदी थी तो धनी परिवारों में ऐसे बच्चों की तादाद 25 फीसदी पायी गई। उप-सहारीय अफ्रीकी देशों में यह आंकड़ा क्रमश 48 फीसदी और 25 फीसदी का है।

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ब्राजील, ग्वाटेमाला, भारत, फिलीपिन्स, दक्षिण अफ्रीका में हुए हाल के अध्ययनों से पता चलता है कि सामान्य से कम लंबाई का होना बच्चों की स्कूलिंग के सालों को कम करने में एक कारक रहा है और यह भी पता चलता है कि ऐसे बच्चे ग्रेड पाने में असफल रहते हैं। आगे चलकर इन कारणों से ऐसे बच्चे की आय-अर्जन की क्षमता भी कम होती है। साल 2007 के एक अध्ययन में पता चला कि ऐसे बच्चे सालाना औसतन 22 फीसदी कम आय अर्जित करते हैं।

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बच्चे के जन्म के शुरुआती 1000 दिन पोषण के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। अगर इन दिनों में पोषण में कमी हुई तो इसके दुष्प्रभावों को कम कर पाना आगे चलकर संभव नहीं होता। अगर जीवन-चक्र की दृष्टि से देखें तो बच्चे के गर्म में होने की अवस्था से लेकर उसके दूसरे जन्मदिन तक का समय पोषणगत जरुरतों को पूरा करने के लिहाज से अत्यंत निर्णायक होता है।


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वैश्विक स्तर पर देखें तो 5 साल से कम उम्र के कुल बच्चों में 26 फीसदी (यानि हर चार बच्चे में एक बच्चा) साल 2011 में सामान्य से कम लंबाई का था। ऐसे बच्चों की कुल वैश्विक तादाद का 80 फीसदी हिस्सा दुनिया के महज 14 देशों में है।

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कुपोषित बच्चियों के मामले में देखा गया है कि उनके कुपोषित मां बनने की आशंका ज्यादा होती है और ऐसी माताओं के बच्चों का वज़न जन्म के समय सामान्य से कम होता है। इस तरह कुपोषणजनित यह दुष्चक्र एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के बीच चलते रहता है।

 

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