Resource centre on India's rural distress
 
 

कुपोषण

 खास बात
• देश के ग्रामीण अंचल में साल १९९३-९४ में प्रति दिन प्रतिव्यक्ति औसत कैलोरी उपभोग की मात्रा २१५३ किलो कैलोरी थी जो साल २००४-०५ में घटकर २०४७ किलो कैलोरी हो गई।इस तरह कुल १०६ किलो कैलोरी की कमी आई।*
• भारत के ग्रामीण अंचल में तकरीबन ६६ फीसदी आबादी प्रति दिन २७०० किलो कालोरी से कम का उपभोग करती है।*
• साल १९९३-९४ में प्रतिदिन प्रति व्यक्ति प्रोटीन उपभोग की मात्रा का औसत ६०.२ ग्राम था जो साल २००४-०५ में घटकर ५७ ग्राम हो गया।*
• ग्रामीण अंचलों में वसा का उपभोग(४४ ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन) शहरी अंचल (५८.२ ग्राम) की तुलना में कहीं कम होता है।*
• वैश्विक स्तर पर देखें तो औसत से कम वजन के बच्चों की तादाद भारत में सर्वाधिक है। **
• उम्र के हिसाब से कम अपेक्षाकृत कम लंबाई के बच्चों की तादाद(एनएफएचएस-३,२००५-०६) (३ साल से कम आयु वर्ग में)  सबसे ज्यादा उत्तरप्रदेश( ४६ फीसदी) है। इसके बाद इस मामले में छत्तीसगढ(४५.४ फीसदी) और गुजरात(४२.४ फीसदी) का नंबर है। ***
• मानव विकास सूचकांक पर बेहतर माना जाने वाला राज्य पंजाब भी ग्लोबल हंगर इंडेक्स द्वारा सूचीबद्ध ३३ अन्य विकासशील देशों की तुलना में दर्जे के हिसाब से कहीं नीचे है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स को पैमाना माने तो बिहार और झारखंड जैसे राज्य इस कसौटी पर जिम्बाब्वे और हैती से नीचे आयेंगे और मध्यप्रदेश इथोपिया तथा चाड के बीच कहीं मुकाम पाएगा। $#

* न्यूट्रिशनल इंटेक इन इंडिया- २००४-०५, एनएसएस, ६१ वें दौर की गणना जुलाई 2004- जून  2005
** वर्ल्डबैंक
*** नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे-३ (2005-06)
*# फैसिलेटिंग इम्प्रूब्ड न्यूट्रिशन फॉर प्रेगनेंट एंड लैक्टेटिंग वुमन एंड चिल्ड्रेन ०-५ इयर्स ऑव एज- कैथरीन जी ड्यूवी (२००३), पीएचडी, यूनिवर्सिटी ऑव कैलिफोर्निया, डेविस यूएसए

$# घोष जयती (2009): फूड फॉर ऑल, फ्रंट लाइन १५-२८ अगस्त

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[inside]भुखमरी और कुपोषण की दशा पर केंद्रित अर्बन हंगामा( Urban HUNGaMA) रिपोर्ट[/inside] नंदी फाउंडेशन ने फरवरी 2018 में जारी की. यह रिपोर्ट देश की सर्वाधिक आबादी वाले शहरों मुंबई, दिल्ली, बंगलुरु, हैदराबाद, अहमदाबाद, चेन्नई, कोलकाता, सूरत, पुणे और जयपुर में हुए एक सर्वेक्षण पर आधारित है. सर्वेक्षण में जानने की कोशिश की गई कि 0-59 माह के बच्चों के पोषण की स्थिति कैसी है. जिन शहरों में सर्वेक्षण हुआ उनमें समवेत रुप से देखें तो देश की आबादी का 5.3 फीसद तथा 0-71 माह के बच्चों का 4.1 प्रतिशत हिस्सा रहता है. 

 

सर्वेक्षण में कुल 12,286 माताओं का साक्षात्कार लिया गया तथा 0-59 माह के कुल 14,616 बच्चों का लंबाई और भार के लिहाज से आकलन हुआ. 

 

अर्बन हंगामा रिपोर्ट: न्यूट्रीशन एंड द सिटी के मुख्य तथ्य :

मूल रिपोर्ट के लिए यहां क्लिक करें  

 

• जन्म के समय कम वजन(2.5 किलोग्राम से कम) वाले बच्चों की तादाद 15.7 प्रतिशत पायी गई. हैदराबाद में ऐसे बच्चों की तादाद 13.5 प्रतिशत है तो कोलकाता में 25.1 प्रतिशत. 

 

•  पांच साल से कम उम्र के कुल 22.3 प्रतिशत बच्चे लंबे वक्त से कुपोषण का शिकार होने के कारण स्टटिंग के शिकार हैं. कुल 7.6 प्रतिशत बच्चों में स्टटिंग की स्थिति को अत्यंत गंभीर माना जा सकता है. 

 

• स्टटिंग के शिकार बच्चों की संख्या चेन्नई में 14.8 प्रतिशत थी जबकि दिल्ली में 30.6 प्रतिशत. जिन परिवारों में बच्चों की माताओं की स्कूली शिक्षा पांच साल या इससे कम है उनमें स्टटिंग की चपेट में आये बच्चों की संख्या ज्यादा(35.3 प्रतिशत) है जबकि 10 साल या इससे ज्यादा समय की स्कूली शिक्षा वाली माताओं वाले परिवारों में ऐसे बच्चों की तादाद कम(16.7 प्रतिशत) है.

 

• आर्थिक संपदा के लिहाज से जो परिवार श्रेणीक्रम में सबसे निचले स्तर पर हैं उन परिवारों में स्ट्टिंग के शिकार बच्चों की संख्या( 29.3 प्रतिशत) आर्थिक संपदा के लिहाज से सबसे ऊपरली श्रेणी के परिवारों की तुलना में ज्यादा है.(ऊपरली श्रेणी के परिवारों में स्ट्टिंग के शिकार बच्चों की संख्या 15.0 प्रतिशत) 

 

• लगभग 13.9 प्रतिशत बच्चे वेस्टिंग के शिकार हैं. 3.2 प्रतिशत बच्चों में वेस्टिंग की स्थिति अत्यंत गंभीर मानी जा सकती है. 

 

• जयपुर में वेस्टिंग के शिकार बच्चों की संख्या 10.8 प्रतिशत है तो मुंबई में 19.0 प्रतिशत. 

 

• स्टटिंग की ही तरह वेस्टिंग के मामले भी उन परिवारों में ज्यादा हैं जहां माताओं की स्कूली शिक्षा कम सालों तक हुई है. जिन परिवार के माताओं की स्कूली शिक्षा पांच साल या इससे कम समय तक हुई है उन परिवारों में वेस्टिंग के शिकार बच्चों की संख्या 17.6 प्रतिशत है जबकि जिन परिवारों में माताओं की स्कूली शिक्षा 10 साल या उससे ज्यादा समय तक हुई है उन परिवारों में वेस्टिंग के शिकार बच्चों की संख्या 12.2 प्रतिशत है. आर्थिक श्रेणीक्रम में सबसे निचली सीढ़ी के परिवारों में वेस्टिंग के शिकार बच्चों की संख्या 16.7 प्रतिशत है जबकि आर्थिक श्रेणीक्रम में सबसे ऊपरली सीढ़ी के परिवारों में 10.5 प्रतिशत. 

 

• मानक से ज्यादा भार के बच्चों की तादाद 2.4 प्रतिशत है. हैदराबाद में ऐसे बच्चों की तादाद 0.7 प्रतिशत है तो चेन्नई में 3.7 प्रतिशत. 

 

• आर्थिक श्रेणीक्रम में सबसे ऊपरली सीढ़ी के परिवारों में मानक से ज्यादा भार वाले बच्चों की तादाद 3.6 प्रतिशत है जबकि आर्थिक श्रेणीक्रम में सबसे निचली सीढ़ी के परिवारों में ऐसे बच्चों की तादाद 1.8 प्रतिशत है. 

 

• देश की सबसे ज्यादा आबादी वाले 10 शहरों में हर 4 बच्चे में 1 बच्चा लंबे समय से कुपोषण का शिकार चला आ रहा है और इस कारण उसका शारीरिक विकास सामान्य से कम हुआ है. 

 

•  देश के दस सर्वाधिक आबादी वाले शहरों में केवल 22.5 प्रतिशत (यानि चार बच्चों में एक से भी कम) बच्चों को ही वैसा भोजन मिल पाता है जो उनके सेहतमंद शारीरिक विकास के लिए जरुरी है. 

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[inside]नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे-4 के आंकड़ों के अनुसार भारत में स्टटिंग और वेस्टिंग के शिकार बच्चों की संख्या[/inside]--

मूल रिपोर्ट के लिए यहां क्लिक करें

राज्यवार वेस्टिंग के शिकार बच्चों का अनुपात--

देश के 29 राज्यों में मात्र 12 राज्य ऐसे हैं जहां 2005-06 से 2015-16 के बीच पांच साल या इससे कम उम्र के वेस्टिंग के शिकार बच्चों की संख्या में तुलनात्मक रुप से कमी आयी है. 

 

2015-16 में पांच साल तक की उम्र के वेस्टिंग के शिकार बच्चों की संख्या झारखंड में सबसे ज्यादा(29 प्रति.) थी. गुजरात (26.4 प्रति.), कर्नाटक (26.1 प्रति.), मध्यप्रदेश (25.8 प्रति.), और महाराष्ट्र (25.6 प्रति.) में भी ऐसे बच्चों की तादाद 20 प्रतिशत से ज्यादा है. 

 

मिजोरम में वेस्टिंग के शिकार बच्चों की तादाद आनुपातिक रुप से सबसे कम (6.1 प्रति.) कम है. जिन राज्यों में वेस्टिंग के शिकार बच्चों की संख्या 15 फीसद से कम है उनके नाम हैं मणिपुर (6.8 प्रति.), नगालैंड (11.2 प्रति.), जम्मू-कश्मीर (12.1 प्रति.), और हिमाचल प्रदेश (13.7 प्रति.).  

 

एनएफएचएस-4 के नये आंकड़ों से यह भी जाहिर होता है कि वेस्टिंग के शिकार बच्चों की संख्या ग्रामीण इलाकों (21.5 प्रति.) में शहरों(20.0 प्रति.) की तुलना में ज्यादा है. 

 

राज्यवार अंडरवेट बच्चों की संख्या--

दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को छोड़कर बाकी सभी 28 राज्यों में एनएफएचएस-3 की तुलना में एनएफएचएस-4 में अंडरवेट बच्चों की संख्या में कमी आई है.

 

2015-16 में झारखंड में अंडरवेट बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा (47.8 प्रति.) थी. बिहार (43.9 प्रति.), मध्यप्रदेश (42.8 प्रति.), उत्तरप्रदेश (39.5 प्रति.), और गुजरात (39.3 प्रति.) में भी अंडरवेट बच्चों की संख्या तुलनात्मक रुप से ज्यादा है.

 

मिजोरम में अंडरवेट बच्चों की संख्या का अनुपात सबसे कम (11.9 प्रति.) है. मणिपुर (13.8 प्रति.), सिक्किम (14.2 प्रति.), केरल (16.1 प्रति.) और जम्मू-कश्मीर (16.6 प्रति.) में भी अंडरवेट बच्चों की संख्या झाऱखंड की तुलना में कम से कम तीन गुणा कम है.  

 

एनएफएचएस-4 के आंकड़ों से यह भी जाहिर होता है कि ग्रामीण इलाकों में अंडरवेट बच्चों की संख्या का अनुपात (38.3 प्रति.) शहरी इलाकों (29.1 प्रति.) की तुलना में ज्यादा है.

 

राज्यवार  स्टटिंग के शिकार बच्चों की संख्या--

 

सभी 29 राज्यों में स्टटिंग के शिकार बच्चों की संख्या में एनएफएचएस-3 की तुलना में एनएफएचएस-4 में कमी आई है.

 

2015-16 में स्टटिंग के शिकार बच्चों की सबसे ज्यादा तादाद बिहार (48.3 प्रतिशत) में पायी गई. यूपी((46.3 प्रति.), झारखंड (45.3 प्रति.), मेघालय (43.8 प्रति.), और मध्यप्रदेश (42.0 प्रति.) में भी स्टंटिंग के शिकार बच्चों की संख्या राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है. 

 

केरल में स्टंटिंग के शिकार बच्चों की संख्या आनुपातिक रुप में सबसे कम (19.7 प्रति.) है. इसके बाद गोवा (20.1 प्रति.), त्रिपुरा (24.3 प्रति.), पंजाब (25.7 प्रति.), और हिमाचल प्रदेश (26.3 प्रति.) का स्थान है.

 

एनएफएचएस-4 के नये आंकड़ों से यह भी जाहिर होता है कि स्टंटिंग के शिकार बच्चों की संख्या गांवों(41.2 प्रतिशत) में ज्यादा है, शहरों में तुलनात्मक रुप से कम(31.0 प्रतिशत). 

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[inside]नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे- 4 के नये तथ्य[/inside] के मुताबिक--

 http://rchiips.org/NFHS/factsheet_NFHS-4.shtml

 

--नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे-4 के अद्यतन आंकड़ों के मुताबिक 15-49 आयु वर्ग के 20 फीसद से तनिक ज्यादा स्त्री-पुरुषों का बीएमआई सामान्य से कम है.     

 

--राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो 22.9 फीसद महिलाओं और 20.2 फीसद पुरुषों(15-49 आयु वर्ग) का बीएमआई 18.5 किलोग्राम प्रतिवर्ग मीटर से कम है

 

---नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे-3 के मुताबिक साल 2005-06 में 33 फीसद महिलाओं और 28.1 प्रतिशत पुरुषों का बीएमआई सामान्य से कम था.

 

---कम वजन की समस्या से जूझ रही महिलाओं की संख्या सबसे ज्यादा झारखंड में है. झारखंड में 31.5 फीसद महिलाओं का बीएमआई सामान्य से कम है. इसके बाद बिहार का स्थान है जहां 30.4 फीसद महिलाओं का बीएमआई सामान्य से कम है. मध्यप्रदेश(28.3 प्रतिशत), गुजरात(27.2 प्रतिशत) और राजस्थान(27.0 प्रतिशत) में भी कम वजन की समस्या से जूझ रही महिलाओं की संख्या बहुत ज्यादा है.

 

---सामान्य से कम बीएमआई की महिलाओं की सबसे कम संख्या सिक्किम में है. यहां 6.4 फीसद महिलाओं का बीएमआई सामान्य से कम है. इसके बाद मिजोरम(8.3 प्रतिशत), अरुणाचल प्रदेश(8.5 प्रतिशत), मणिपुर(8.8 प्रतिशत) और केरल(9.7 प्रतिशत) का स्थान है.  

 

---तुलनात्मक रुप से देखें तो 2015-16 में मध्यप्रदेश में सामान्य से कम बीएमआई वाले पुरुषों की संख्या सबसे ज्यादा(28.4 प्रतिशत) है. इसके बाद उत्तरप्रदेश(25.9 प्रतिशत), बिहार(25.4 प्रतिशत), गुजरात(24.7 प्रतिशत) और छतीसगढ़(24.1 प्रतिशत) का स्थान है.

 

---सामान्य से कम बीएमआई वाले पुरुषों की सबसे कम संख्या सिक्किम में है. यहां केवल 2.4 फीसद पुरुषों का बीएमआई सामान्य से कम है. इसके बाद मिजोरम(7.2 प्रतिशत), अरुणाचल प्रदेश(8.3 प्रतिशत) और गोवा(10.8 प्रतिशत) का स्थान है.  

 

---सामान्य से कम बीएमआई वाले स्त्री-पुरुषों के बीच सबसे ज्यादा अन्तर वाला राज्य झारखंड है. इसके बाद ओड़ीशा, असम और बिहार, हरियाणा तथा महाराष्ट्र का स्थान है. 

 

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[inside]IFPRI द्वारा प्रस्तुत 2015 ग्लोबल न्यूट्रीशन रिपोर्ट: एक्शन एंड अकाउंटबिलिटी टू एडवांस न्यूट्रीशन एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट[/inside]( सितंबर 2015 में जारी) नामक दस्तावेज के अनुसार :

http://www.im4change.org/siteadmin/http://www.im4change.org/siteadmin/tinymce///uploaded/global%20nutrition%20report%202015.pdf

 • साल 2013-14 में राष्ट्रीय स्तर पर कराये गये एक नये सर्वेक्षण रैपिड सर्वे ऑन चिल्ड्रेन के अनुसार स्टंटिंग के शिकार बच्चों की संख्या 48 प्रतिशत से घटकर 39 प्रतिशत हो गई है.

 

• आरएसओसी सर्वेक्षण के आंकड़ों से पता चलता है 2006 से 2014 के बीच बच्चों के कुपोषण के मामले में(उम्र और लंबाई के मानक के हिसाब तथा उम्र और वज़न के मानक के हिसाब से) तकरीबन सभी राज्यों में कमी आई है तथा इसी अवधि में नवजात शिशुओं को स्तनपान कराने की परिघटना में बढ़ोत्तरी हुई है.

 

• बिहार, झारखंड और उत्तरप्रदेश में साल 2006 से 2014 के बीच बच्चों के कुपोषण के मामले में प्रगति धीमी रही है.

 

• ज्यादातर राज्यों में बच्चों के कुपोषण(उम्र और लंबाई के मानक के हिसाब से) से कमी आई है लेकिन सभी राज्यों के साथ ऐसा समान रुप से नहीं हुआ है। अरुणाचलप्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, गोवा तथा मिजोरम में बच्चों के कुपोषण(वेस्टिंग- उम्र और लंबाई के मानक के हिसाब से) से बढ़ोत्तरी हुई है, भले ही अरुणाचलप्रदेश तथा महाराष्ट्र में यह बढ़ोत्तरी नाम-मात्र की हुई है.

 

• इन आंकड़ों को तनिक सावधानीपूर्वक पढ़ने की जरुरत है क्योंकि बच्चों के कुपोषण के दो प्रकारों वेस्टिंग( वज़न और लंबाई के मानक के हिसाब से) और स्टंटिंग( उम्र और लंबाई के मानक के हिसाब से) के आंकड़ों में क्षेत्रवार बहुत ज्यादा भिन्नता है. इस बात के लिए और शोध की जरुरत है कि वेस्टिंग को कम करने में रफ्तार क्षेत्रवार इतनी ज्यादा असमान क्यों प्रतीत हो रही है.

 

• अखिल भारतीय स्तर पर शिशुओं को स्तनपान कराने की दर 34 प्रतिशत से बढ़कर 62 प्रतिशत हो गई है. साल 2005-06 में केवल पाँच राज्य स्तनपान की दर 60 प्रतिशत या इससे अधिक थी लेकिन अब 17 राज्यों स्तनपान की दर 60 प्रतिशत से ज्यादा है. यह भी महत्वपूर्ण तथ्य है कि 2005-06 में जिन राज्यों में स्तनपान की दर कम थी वहां भी स्तनपान की दर 60-70 प्रतिशत हो गई है.

 

• बिहार स्तनपान की दर के मामले में 2005-2006 में सबसे नीचे था लेकिन अब वहां स्तनपान की दर में चार गुने की बढ़ोत्तरी हुई है और बिहार देश के 16 राज्यों से ऊपर आ गया है.

 

• मोटापे जनित कुपोषण(लड़के और लड़कियों दोनों के लिए) 2010 के 4.0 प्रतिशत से बढ़कर 2014 में 4.9 प्रतिशत हो गया है. लड़कों के लिए मोटापाजनित कुपोषण में बढ़त 2010 के 2.5 प्रतिशत से बढ़कर 2014 में 3.2 प्रतिशत हुई है जबकि महिलाओं के लिए इस अवधि में यह बढ़त 5.6 प्रतिशत से आगे आकर 6.7 प्रतिशत हुई है.

 

• यह बात ध्यान में रखी जानी चाहिए कि बच्चों की लंबाई उनके जन्म के महीने के हिसाब से बहुत ज्यादा विभिन्नता धारण करती है. जिन बच्चों का जन्म दिसंबर में होता है उनकी तुलना में गर्मी और बारिश के महीनों में जन्म लेने वाले बच्चों की लंबाई अपेक्षाकृत कम होती है.

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[inside]पब्लिक अकाऊंटस् कमिटी (2014-15) रिपोर्ट ऑन इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट सर्विसेज[/inside] के तथ्यों के अनुसार

http://www.im4change.org/siteadmin/http://www.im4change.org/siteadmin/tinymce///uploaded/Public%20Accounts%20Commitee%20report%20on%20ICDS.pdf

समेकित बाल विकास कार्यक्रम के बारे में लोक लेखा समिति के प्रमुख तथ्य

आँगनबाड़ी केंद्रों के संचालित ना होने के बारे में लोक लेखा समिति की रिपोर्ट में तीन प्रमुख कारण बताये गये हैं- अदालती मुकदमे, केंद्रों के संचालन से संबंधित वित्तीय प्रक्रिया तथा आंगनबाड़ी कर्मियों और सहायकों की नियुक्ति में विलंब।

 महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा प्रदत्त सूचना के अनुसार समेकित बाल विकास कार्यक्रम में 31 दिसंबर 2013 तक बाल विकास परियोजना पदाधिकारी के 3209 पद, पर्यवेक्षक के 19831 पद तथा आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के 114368 पद खाली थे।

सुप्रीम कोर्ट ने 13 दिसंबर 2006 को आदेश दिया था कि अनुसूचित जाति, जनजाति की बसाहटों में प्राथमिकता के आधार पर आंगनबाड़ी केंद्र खोले जायें लेकिन आदेश के 8 साल बाद केवल 19 राज्य़ ही इसके अनुकूल आचरण कर पाये हैं। पूरी अवधि में महिला और बाल विकास मंत्रालय ने इस मोर्चे पर सक्रियता नहीं दिखायी और राज्यों से सूचना हासिल होने का इंतजार करती रही।

 महिला एवं बाल विकास मंत्रालय या फिर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा अभी तक ऐसा कोई सर्वेक्षण नहीं करवाया जा सका है जिससे पता चले कि अनुसूचित जाति, जनजाति अथवा अल्पसंख्यक समुदाय की सारी बसाहटों में आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हो रहे हैं या नहीं।

 महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के पास इस बात की कोई पक्की सूचना नहीं है कि कितनी बसाहटों में समेकित बाल विकास कार्यक्रम के अंतर्गत केंद्र खुले हैं। राज्यों द्वारा सूचना ना भेजना मंत्रालय के पास जानकारी ना होने की प्रमुख वजह है।

 सुप्रीम कोर्ट नें ताकीद की थी कि अगर आंगनबाड़ी केंद्र से वंचित कोई ग्रामीण समुदाय जहां कम से कम 40 बच्चे 6 साल से कम उम्र के हों आंगनबाड़ी केंद्र खोलने की मांग करता है तो उसे मांग के तीन महीने के अंदर आंगनबाड़ी केंद्र प्रदान किया जाय। हालांकि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने समेकित बाल विकास कार्यक्रम के तीसरे चरण में ऐसी मांग वाले कुल 20 हजार आंगनबाड़ी केंद्रों की स्थापना की मंजूरी दी लेकिन लोक लेखा समिति ने अपनी रिपोर्ट में पाया कि साल 2011-12 में मंत्रालय द्वारा छह राज्यों में केवल 20130 मांग आधारित आंगनबाड़ी केंद्रों को अनुमोदित किया गया।

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा प्रदान की गई सूचना के अनुसार आंगनबाड़ी केंद्रों में वज़न के लिहाज से मापे गये बच्चों में सामान्य वज़न के बच्चों की संख्या 31 मार्च 2007 के 49.9% प्रतिशत से बढ़कर 31 मार्च 2011 को 58.84% और 31 दिसंबर 2013 को 71.62% हो गई है।

लोक लेखा समिति की रिपोर्ट के अनुसार समेकित बाल विकास कार्यक्रम का 7067 पूर्ण रुप से संचालित परियोजनाओं तथा 13.42 लाख आंगनबाड़ी केंद्रों के जरिए संचालन किया जा रहा है। यह संख्या मार्च 2014 की है। समेकित बाल विकास कार्यक्रम की सेवाएं 1045.08 लाख लाभार्थियों को दी जा रही हैं जिसमें 849.40 लाख बच्चे 6 साल से कम उम्र के हैं जबकि 195.68 लाख संख्या गर्भवती और दूध पिलाने वाली माताओं की है। 3-6 साल की उम्र के तकरीबन 370.7 लाख बच्चों को प्रीस्कूल शिक्षा दी जा रही है जिसमें लड़कों की संख्या 188.19 लाख और लड़कियों की संख्या 182.51 लाख है।

समेकित बाल विकास कार्यक्रम के अंतर्गत छह तरह की सेवाएं प्रदान की जाती हैं। इसके अंतर्गत पूरक पोषाहार, टीकाकरण, रेफरल सेवा, स्वास्थ्य जांच, प्रीस्कूल अनौपचारिक शिक्षा तथा स्वास्थ्य एवं पोषण से संबंधित शिक्षा की सेवा आंगनबाड़ी केंद्रों द्वारा प्रदान की जाती है।

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने साल 2011 में आंगनबाड़ियों से संबंधित दिशानिर्देश जारी किए थे। दिशानिर्देशों में कहा गया था कि आंगनबाड़ी केंद्रों में महिलाओं और बच्चों के बैठने के लिए अलग से कमरा होना चाहिए, रसोईघर अलग से होना चाहिए, खाद्य-पदार्थ के संग्रह के लिए भंडारघर होना चाहिए, बच्चों की सुविधा के अनुकूल शौचालय होना चाहिए, बच्चों के खेलने के लिए अलग से जगह होनी चाहिए साथी ही स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था होनी चाहिए।

सीएजी की रिपोर्ट के आधार पर लोक लेखा समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि कुल 2701 आंगनबाड़ी केंद्रों को नमूने के तौर पर जांचने के बाद पाया गया कि 866 आंगनबाड़ी केंद्र अपने विहित स्थान से कहीं और किसी प्राइमरी स्कूल या किराये की जगह पर चल रहे हैं और अगर स्कूल चल रहे हों तो आंगनबाड़ी केंद्रों को खुली जगह पर चलाया जा रहा है।विभिन्न राज्यों में नमूने के तौर पर जांचे गये 40 से 60 प्रतिशत आंगनबाड़ी केंद्रों में अलग से भंडारघर, रसोईघर या खेलने-कूदने की जगह नहीं थी।

लोक लेखा समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि जांचे गये आंगनबाड़ी केंद्रों में से 52 प्रतिशत आंगनबाड़ी केंद्रों में शौचालय नहीं था जबकि 32 प्रतिशत आंगनबाड़ी केंद्रों में स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था नहीं थी।


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इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट की [inside]ग्लोबल फूड पॉलिसी रिपोर्ट 2014-15[/inside] के तथ्यों के अनुसार

http://www.im4change.org/news-alerts/miles-to-go-for-achieving-food-security-4675677.html

ग्लोबल फूड पॉलिसी रिपोर्ट 2014-15 के मुख्य तथ्य :

•     विश्व में 57 करोड़ फार्मस् हैं। इसमें तकरीबन तीन चौथाई फार्मस् एशिया में है और इसका 60 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ चीन तथा भारत में है।

•     भारत केन्या तथा जांबिया के साक्ष्यों से पता चलता है कि मूल्यों में स्थिरता लाने के लिए राष्ट्रीय रिजर्व प्रभावकारी हो सकता है।

•     भारत में फल और सब्जियों का थोक मूल्य साल 2012-13 की तुलना में साल 2013-14 में 23 प्रतिशत ज्यादा था।

•     भारत और चीन में आर्थिक वृद्धि की रफ्तार तेज है लेकिन दोनों देशों में भुखमरी और कुपोषण के शिकार लोगों की तादाद ज्यादा है जबकि मैक्सिको और ब्राजील जैसी अर्थव्यवस्था में लोग ज्यादा वज़न तथा मोटापा जैसी समस्याओं से पीड़ित हो रहे हैं।

•     सूक्ष्म पोषाहार(माइक्रो न्यूट्रीएन्टस्) की कमी की वजह से भारत को अपनी जीडीपी के 3 प्रतिशत का नुकसान उठाना पड़ता है।


•     ब्राजील, चीन, भारत, इंडोनेशिया और मैक्सिको जैसे देशों में निरंतर भोजन की कमी से जूझ रहे लोगों की संख्या में कमी लाने के लगातार प्रयास किए गए हैं। इन प्रयासों के बावजूद समावेशी विकास को जारी रखना मुश्किल साबित हो रहा है। भोजन की कमी से जूझ रही विश्व की कुल आबादी का तकरीबन पचास प्रतिशत(36 करोड़ 60 लाख) हिस्सा इन्हीं देशों में है।

•    भारत में साल 2004-06 में कुपोषण की शिकार आबादी की संख्या 21.5 प्रतिशत थी जो साल 2011-13 में घटकर 17 प्रतिशत हो गई है। ठीक इसी तरह साल 2004-05 में मानक से कम वज़न के बच्चों(पाँच साल से कम उम्र के) की तादाद भारत में 43.5 प्रतिशत थी जो साल 2011-13 में घटकर 30.7 प्रतिशत हो गई है।

•    विश्व में खुले में शौच करने वाले कुल लोगों की संख्या का 60 प्रतिशत हिस्सा भारत में रहता है। साफ-सफाई और पोषण की स्थितियों पर इसका गहरा असर है।

•    भारत के 29 राज्यों में से केवल पाँच राज्यों में खाद्य सुरक्षा अधिनियम पूरी तरह लागू किया गया है, 6 राज्यों में यह आंशिक रुप से लागू हुआ है।
 

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आईएफपीआरआई द्वारा तैयार [inside]ग्लोबल न्यूट्रीशन रिपोर्ट 2014[/inside]: एक्शन एंड अकाउंटबिलिटी टू एक्सीलेरेट द वर्ल्डस् प्रोग्रेस ऑन न्यूट्रीश नामक दस्तावेज के अनुसार :

 

http://www.im4change.org/siteadmin/http://www.im4change.org/siteadmin/tinymce///uploaded/Global%20Nutrition%20Report%202014.pdf

 

साल 2005-06 में 5 साल के कम उम्र के 47.9 प्रतिशत बच्चे स्टंटिंग के शिकार यानि मानक से कम लंबाई के थे, ऐसे बच्चों की संख्या साल 2013-14 में घटकर 38.8 प्रतिशत हो गई है। नतीजतन स्टंटिंग के शिकार बच्चों की संख्या 5.82 करोड़ से घटकर साल 2013-14 में 4.38 करोड़ रह गई है।

 

साल 2005-06 में 5 साल के कम उम्र के 20.0% बच्चे वेस्टिंग के शिकार थे यानि ऐसे बच्चे का वज़न उनकी लंबाई के लिए मान्य वज़न से कम था। ऐसे बच्चों की संख्या साल 2013-14 में घटकर 15.0%  हो गई है। नतीजतन स्टंटिंग के शिकार बच्चों की संख्या 2.43  करोड़ से घटकर साल 2013-14 में 1.69  करोड़ रह गई है।

स्टंटिंग के घटने की सालाना दर 2.6 प्रतिशत है जबकि भारत के लिए वांछित सालाना दर 3.7 प्रतिशत है। लेकिन यह दर पिछले सर्वे के अनुमान( तब स्टंटिंग के घटने की दर 1.7 बतायी गई थी) से ज्यादा है।

साल 2005-06 से 2013-14 यानि आठ सालों की अवधि में स्तनपान की परिघटना में सालाना 5.5 प्रतिशत( 46.4 से 71.6 प्रतिशत) की दर से बढोत्तरी हुई है यह दर वर्ल्ड हैल्थ असेंबली द्वारा साल 2025 के लिए निर्धारित लक्ष्य (भारत के लिए 1.5 प्रतिशत) से ज्यादा है।

दुनिया की सर्वाधिक आबादी वाले देशों में दूसरे नंबर पर कायम भारत से संबंधित आंकड़ों के संकेत हैं कि वह वर्ल्ड हैल्थ असेंबली द्वारा निर्धारित सूचकांकों पर अपेक्षा से कहीं अधिक तेजी से प्रगति कर रहा है। मिसाल के लिए, अगर प्रारंभिक के दौर के आंकड़ों में अगर बहुत ज्यादा परिवर्तन नहीं होता तो कहा जा सकता है कि स्टंटिंग के शिकार बच्चों की संख्या भारत में 1 करोड़ से ज्यादा की संख्या में कम की जा चुकी है।

भारत सरकार ने बच्चों के पोषण से संबंधित एक नया सर्वेक्षण किया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ ने अभी तक इस सर्वेक्षण के आंकड़ों तथा अपनायी गई पद्धति का पुनरावलोकन नहीं किया है। इस वजह से नये सर्वेक्षण के तथ्य विश्व स्वास्थ्य संगठन के डेटाबेस में अभी शामिल नहीं हो पाये हैं। लेकिन अगर कुपोषण से संबंधित भारत सरकार के नये आंकड़ों का अंतिम रुप भी वही रहता है जैसा कि प्रारंभिक गणना से संबंधित रिपोर्ट में है तो फिर वर्ल्ड हैल्थ असेंबली द्वारा निर्धारित लक्ष्य को हासिल करने के संदर्भ में और भी ज्यादा आशावान हुआ जा सकता है।

महाराष्ट्र राज्य के अनुभवों से संकेत मिलते हैं कि अगर 6-12 साल तक लगातार प्रयास किए जायें तो पोषणगत स्थितियों को सुधारने में महत्वपूर्ण परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।

महाराष्ट्र से संबंधित एक नये राजव्यापी सर्वेक्षण (Haddad et al 2014) का निष्कर्ष है कि वहां बच्चों में स्टंटिंग की परिघटना में महज सात सालों के अंदर एक तिहाई की कमी(36.5 से 24.0 प्रतिशत) आई। वहां स्टंटिंग के घटने की सालाना दर 5.8 प्रतिशत रही। स्टंटिंग की घटना में कमी के लिए पोषणगत उपायों के अतिरिक्त, भोजन और शिक्षा की उपलब्धता की स्थिति को बेहतर बनाना तथा गरीबी और प्रजनन दर को कम करना जरुरी है।

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यूनिसेफ द्वारा प्रस्तुत [inside]इम्प्रूविंग चाइल्ड न्यूट्रीशन: द एचीवेवल इम्पीरेटिव फॉर ग्लोबव प्रोग्रेस (अप्रैल, 2013)[/inside] नामक दस्तावेज के अनुसार
http://www.unicef.org/publications/files/Nutrition_Report_final_l
o_res_8_April.pdf
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साल 2011 तक भारत में, कुपोषण के कारण सामान्य के कम लंबाई के बच्चों की संख्या 6,17,23,000 (लगभग 6.17 करोड़) थी यानि विश्व में कुपोषण के कारण जिन बच्चों की लंबाई सामान्य से कम है, उनकी कुल संख्या का 37.9 फीसदी हिस्सा भारत में है।

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दक्षिण एशिया में तकरीबन 28 फीसदी बच्चों का वज़न जन्म के समय सामान्य से कम होता है। दक्षिण एशिया में 39 फीसदी बच्चे कुपोषण के कारण सामान्य से कम लंबाई के हैं। साल 2005-06, के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक 5 साल से कम उम्र के 48 फीसदी बच्चे (कुपोषण के कारण) सामान्य से कम लंबाई के हैं।

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भारत के सर्वाधिक धनी राज्य महाराष्ट्र में 2 साल से कम उम्र के 39 फीसदी बच्चे साल 2005–2006 कुपोषण के कारण सामान्य से कम लंबाई के थे। लेकिन राज्यव्यापी न्यूट्रीशन सर्वे के अनुसार साल 2012 में ऐसे बच्चों की तादाद 23 फीसदी पायी गई है।

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महाराष्ट्र राज्य के सर्वे के आंकड़ों के शुरुआती नतीजों से पता चलता है कि साल 2012 में 6-23 माह के मात्र 7 फीसदी बच्चों को न्यूनतम जरुरी पोषाहार हासिल होता है।

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दक्षिण एशिया के सर्वाधिक धनी और गरीब परिवार के बीच तुलनात्मक रुप से देखा जाय तो जहां गरीब परिवारों में कुपोषण के कारण सामान्य से कम लंबाई के बच्चों की संख्या 59 फीसदी थी तो धनी परिवारों में ऐसे बच्चों की तादाद 25 फीसदी पायी गई। उप-सहारीय अफ्रीकी देशों में यह आंकड़ा क्रमश 48 फीसदी और 25 फीसदी का है।

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ब्राजील, ग्वाटेमाला, भारत, फिलीपिन्स, दक्षिण अफ्रीका में हुए हाल के अध्ययनों से पता चलता है कि सामान्य से कम लंबाई का होना बच्चों की स्कूलिंग के सालों को कम करने में एक कारक रहा है और यह भी पता चलता है कि ऐसे बच्चे ग्रेड पाने में असफल रहते हैं। आगे चलकर इन कारणों से ऐसे बच्चे की आय-अर्जन की क्षमता भी कम होती है। साल 2007 के एक अध्ययन में पता चला कि ऐसे बच्चे सालाना औसतन 22 फीसदी कम आय अर्जित करते हैं।

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बच्चे के जन्म के शुरुआती 1000 दिन पोषण के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। अगर इन दिनों में पोषण में कमी हुई तो इसके दुष्प्रभावों को कम कर पाना आगे चलकर संभव नहीं होता। अगर जीवन-चक्र की दृष्टि से देखें तो बच्चे के गर्म में होने की अवस्था से लेकर उसके दूसरे जन्मदिन तक का समय पोषणगत जरुरतों को पूरा करने के लिहाज से अत्यंत निर्णायक होता है।


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वैश्विक स्तर पर देखें तो 5 साल से कम उम्र के कुल बच्चों में 26 फीसदी (यानि हर चार बच्चे में एक बच्चा) साल 2011 में सामान्य से कम लंबाई का था। ऐसे बच्चों की कुल वैश्विक तादाद का 80 फीसदी हिस्सा दुनिया के महज 14 देशों में है।

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कुपोषित बच्चियों के मामले में देखा गया है कि उनके कुपोषित मां बनने की आशंका ज्यादा होती है और ऐसी माताओं के बच्चों का वज़न जन्म के समय सामान्य से कम होता है। इस तरह कुपोषणजनित यह दुष्चक्र एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के बीच चलते रहता है।

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सेव द चिल्ड्रेन और वर्ल्डविजन नामक संस्था द्वारा प्रस्तुत [inside]द न्यूट्रीशन बैरोमीटर: गॉजिंग नेशनल रेस्पांसेज टू अंडरन्यूट्रीशन (2012)[/inside] नामक दस्तावेज के अनुसार- http://www.savethechildren.in/images/resources_documents/nutrition_barometer_asia.pdf:

 

डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑव कांगो, भारत और यमन की प्रगति बाल-पोषण के मामले में काफी कमजोर रही, परिणाम अच्छे नहीं आये और इन देशों ने बाल-पोषण के मामले में बड़ी लचर प्रतिबद्धता जाहिर की। इस दस्तावेज में बाल-पोषण के मोर्चे पर भारत की प्रगति के आंकड़े पुराने हैं। ये आंकड़े नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे-3 पर आधारित हैं जिसकी अवधि 2005-06 है। चूंकि भारत ने आधिकारिक तौर पर बाल-पोषण के मामले में राष्ट्रीय स्तर पर कोई सर्वेक्षण प्रस्तुत नहीं किया है इसलिए नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे-3 के ही आंकड़ों का व्यवहार होता है।

साल 2005-06 के बाद भारत में बाल-पोषण के लिहाज से क्या प्रगति हुई, इसे जानने के लिए राष्ट्रीय स्तर के सर्वे की त्वरित जरुरत है। चौथा फैमिली हैल्थ सर्वे साल 2014 में होना है।

भारत की अर्थव्यवस्था ने भले चमत्कारिक प्रगति की हो लेकिन इस प्रगति की प्रतिबिंब बाल-पोषण के रुप में नहीं दिखता। अर्थव्यवस्था की प्रगति के कारण करोड़ों लोग गरीबी के जाल से बाहर निकले हैं लेकिन आर्थिक प्रगति का लाभ समाज के एक छोटे से तबके को बाकी लोगों की तुलना में बहुत ज्यादा हुआ है। कई शोध-आकलनों में कहा गया है कि भारत में आधे से ज्यादा बच्चे सामान्य से कम वज़न के हैं और उनकी लंबाई भी सामान्य से कम है। भारत में 70 फीसदी से ज्यादा महिलाएं और बच्चे गंभीर पोषणगत कमियों से जूझ रहे हैं जिसमें एनीमिया एक है।

इस बात की संभावना दोगुनी है कि कोई बच्चा अगर गरीब घर में पैदा हुआ है तो धनी घर में पैदा हुए बच्चे की तुलना में उसकी लंबाई सामान्य से कम होगी। बहरहाल भारत के सर्वाधिक धनी 20 फीसदी परिवारों में हर पाँच में से एक बच्चा पोषणगत कमी का शिकार है।

पोषण के पैमाने पर शून्य से 2 साल की अवधि को बच्चे के आगे के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। समेकित बाल विकास योजना की एक आलोचना यह कहकर की जाती है कि इस योजना में उपर्युक्त आयु-वर्ग के बच्चों की अनदेखी की जाती है।

इस सर्वेक्षण में कुल 36 देशों को शामिल किया गया था। इसमें 13 यानी तकरीबन एक तिहाई देशों में बाल-पोषणगत प्रतिबद्धता और परिणाम एक ही दिशा में संकेत करते हैं।  तीन देश- ग्वाटेमाला, मलावी और पेरु बाल-पोषण के मामले में राजनीतिक और वित्तीय प्रतिबद्धता दिखाने तथा इसी के अनुरुप बेहतर परिणाम हासिल करने के मामले में बाकी देशों से आगे हैं।

इस सर्वेक्षण में यह भी पता चला कि सर्वेक्षण में शामिल देशों में कुल 12 देश ऐसे हैं जहां बाल-पोषण के मामले में राजनीतिक-वैधानिक और वित्तीय प्रतिबद्धता तो खूब है लेकिन नतीजे के मोर्चे पर हासिल बड़ा कम है।

 

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सेव द चिल्ड्रेन द्वारा प्रस्तुत [inside]अ लाईफ फ्री फ्राम हंगर- टैकलिंग चाईल्ड मालन्यट्रिशन(2012)[/inside] नामक दस्तावेज के अनुसार-

http://www.savethechildren.org.uk/sites/default/files/docs/A%20Life%20Free%20From%20Hunger%20UK%20low%20res.pdf

 

 

·         भारत में 48% फीसदी बच्चों की बढ़वार सामान्य से कम है। अगर यही सूरते हाल जारी रहे तो अगले 15 सालों में सामान्य से कम बढ़वार बाले बच्चों की तादाद 450 मिलियन हो जाएगी।

 

·         साक्ष्यों से पता चलता है कि बच्चों को कुपोषण से बचाया जाय तो वे एक व्यस्क के रुप में कहीं ज्यादा कार्यक्षमता के साथ उत्पादक कामों में लग सकते हैं और उनकी आय-अर्जन की क्षमता में 46 फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है।भारत में कुपोषण जनित अनुत्पादकता के कारण सालाना अनुमानतया 2.3 बिलियन डॉलर का घाटा होता है।

 

·         रवि तथा ऐंगलर द्वारा प्रस्तुत एक अध्ययन (2009) में कहा गया है कि ग्रामीण परिवारों को साल में 100 दिन के रोजगार की गारंटी देने वाले कार्यक्रम मनरेगा के कारण ग्रामीण इलाकों में भोजन के मद में खर्च 40 फीसदी बढ़ा है। इसका सर्वाधिक प्रभाव मनरेगा में काम पाने वाले सर्वाधिक गरीब परिवारों के पोषण की दशा पर हुआ है।

 

·         अनुमान है कि राष्ट्रीय आय का 2–3% कुपोषण के कारण अपव्यय होता है। बचपन में कुपोषण का शिकार व्यक्ति की कार्यक्षमता कम होती है और ऐसा व्यक्ति व्यस्क होने की दशा में औसतन 20 फीसदी कम आय अर्जित करता है।

 

·         फरवरी 2011 में खाद्य-पदार्थों के दामों में रिकार्ड बढ़ोतरी हुई और इसके कारण तकरीबन 400,000 बच्चों के पोषण की दशा पर नकारात्मक असर पडा।

 

·         विश्वस्तर पर देखें तो चार में एक बच्चा कुपोषण का शिकार है। विकासशील देशों में यह आंकड़ा 3 में से एक बच्चे का है। इसका सीधा मतलब हुआ कि इन बच्चों का शरीर और मष्तिष्क कुपोषण के कारण समुचित रीति से नहीं विकसित हो रहा।

 

·         कुपोषण के कारण प्रतिदिन 300 बच्चों की मौत होती है। सालाना 2.6  मिलियन बच्चे विश्वस्तर पर कुपोषणजनित कारणों से मृत्यु को प्राप्त होते हैं।.

 

·         सामान्य से कम बढ़वार वाले बच्चों को इसके दुष्प्रभाव से बचाने की दिशा में वैश्विक स्तर पर प्रगति धीमी रही है। सामान्य से कम बढ़वार वाले बच्चों की तादाद साल 1990 में 40 फीसदी थी जो साल 2010 में घटकर 27 फीसदी हुई है यानी सालाना इस दिशा में 0.6 फीसदी की प्रगति हुई।

 

·         अगर विटामिन ए, जिंक की खुराक और आयोडिन युक्त नमक दिया जाय तथा स्वास्थ्य की सही देखभाल वाली आदतें मसलन-हाथ-मुंह धोना, नवजात शिशु को स्तनपान आदि डाली जायें तो लैंसेट मेडिकल जर्नल के अनुसार पाँच साल से कम उम्र के तकरीबन 2 मिलियन बच्चों की जान उन 36 देशों में बचायी जा सकती है जहां दुनिया के कुपोषित बच्चों की 90 फीसदी तादाद रहती है।

 

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नीचे दिए गए आरेख से जाहिर होता है कि शहरी इलाके की अपेक्षा ग्रामीण इलाके में प्रति व्यक्ति-प्रतिदिन कैलोरी की खपत ज्यादा है। बहरहाल दोनों ही इलाकों में एनएसएस के आकलन के मुताबिक प्रति व्यक्ति-प्रतिदिन कैलोरी की खपत में कमी आयी है।

कैलोरी की खपत प्रति व्यक्ति-प्रतिदिन (किलो कैलोरी में)

कैलोरी की खपत प्रति व्यक्ति-प्रतिदिन (किलो कैलोरी में)

स्रोत: न्यूट्रीशनल इनटेक इन इंडिया: 2004-2005, एनएसएस 61 वां दौर का आकलन, जुलाई 2004- जून 2005

[inside]न्यूट्रीशनल इनटेक इन इंडिया: 2004-2005, (एनएसएस 61 वां दौर का आकलन)[/inside]  के अनुसार - 

  • उपभोक्ता के खर्चे पर केंद्रित सर्वेक्षण से पता चलता है कि ग्रामीण इलाके की भारतीय जनता अपने कुल खर्चे में ५५ फीसदी और शहरी इलाके की भारतीय जनता अपने कुल खर्चे का ४२.५ फीसदी भोजन पर खर्च करती है।साल १९९३-९४ में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएस) के अन्तर्गत ऐसा ही सर्वेक्षण हुआ था। पिछले सर्वेक्षण से तुलना करें तो जाहिर होता है कि कुल खर्चे में भोजन पर किया गया खर्च ग्रामीण इलाके में ८ फीसदी और शहरी इलाके में १२ फीसदी घटा है।
  • पिछले सर्वेक्षण (यानी १९९३-९४) से इस सर्वेक्षण (यानी २००४-०५) की तुलना करें तो पता चलता है कि ग्रामीण इलाके की जनता के रोजाना के कैलोरी उपभोग में औसतन १०६ किलो कैलोरी (४.९ फीसदी) की कमी आयी है जबकि शहरी इलाके की जनता के रोजाना के कैलोरी उपभोग में औसतन ५१ किलो कैलोरी की गिरावट आयी है।साल १९९३-९४ में ग्रामीण इलाके में रोजाना का औसत कैलोरी उपभोग २१५३ किलोकैलोरी और शहरी इलाके में २०७१ किलोकैलोरी था जो दस साल बाद घटकर क्रमशः २०४७ किलो कैलोरी और २०२० किलो कैलोरी रह गया।
  • अगर रोजाना २७०० किलो कैलोरी के उपभोग को मानक मानें तो ग्रामीण इलाके में ६६ फीसदी और शहरी इलाके में ७० फीसदी लोग मानक किलो कैलोरी से कम का उपभोग करते हैं।
  • पंजाब (२७६३),उत्तरप्रदेश (२७४३)  और राजस्थान (२७१४) के ग्रामीण इलाकों में प्रति उपभोक्ता-प्रतिदिन कैलोरी का उपभोग राष्ट्रीय औसत से बेहतर था ।झारखंड (३०१३), बिहार (२६८३) और पंजाब के शहरी इलाकों में भी रोजाना के कैलोरी उपभोग के लिहाज से स्थिति राष्ट्रीय औसत के मुकाबले बेहतर थी । दूसरी तरफ, कर्नाटक (२२७६) और तमिलनाडु के ग्रामीण इलाकों में और महाराष्ट्र (२२६१), कर्नाटक (२३८५) और तमिलनाडु (२३९४) के शहरी इलाकों में प्रति उपभोक्ता-प्रतिदिन कैलोरी उपभोग राष्ट्रीय औसत से कहीं कम था।प्रति व्यक्ति-प्रति दिन कैलोरी उपभोग का राष्ट्रीय औसत २०४७ किलो कैलोरी का है और इस पैमाने पर असम ,बिहार, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और उत्तरप्रदेश की स्थिति राष्ट्रीय औसत से अच्छी थी।
  • उड़ीसा के ग्रामीण इलाकों के ७९ फीसदी,  छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाको के ७८ फीसदी  और झारखंड के ग्रामीण इलाकों के  ७५ फीसदी  लोगों को कैलोरी उपभोग का ७५ फीसदी हिस्सा सिर्फ अनाज से हासिल होता है। इसकी तुलना में पंजाब (५० फीसदी), हरियाणा (५४ फीसदी) और केरल (५४ फीसदी) में कहीं कम लोगों को अपने रोजाना के कैलोरी उपभोग के लिए सिर्फ इनाज पर निर्भर रहना पड़ता है।
  • साल १९९३-९४ से २००४-०५ के बीच भारत  ग्रामीण इलाके में प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन प्रोटीन के उपभोग में कमी आयी है। साल १९९३-९४ में प्रति व्यक्ति प्रोटीन की खपत ६२.२ ग्राम थी जो साल २००४-०५ में घटकर ५७ ग्राम हो गई। शहरी इलाके में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन प्रोटीन का उपभोग इस अवधि में ५७ ग्राम पर स्थिर बना रहा।
  • यह बात सही है कि शहरी और ग्रामीण इलाके में उपभोक्ताओं के रोजाना के कैलोरी उपभोग में एक दशक के भीतर कमी आयी है लेकिन न्यूनतम जरुरी प्रोटीन और वसा के उपभोग के लिहाज से देखें तो दोनों ही इलाकों में इनके उपभोग में इजाफा हुआ है। भारत के ग्रामीण इलाकों में प्रति उपभोक्ता प्रतिदिन ७० ग्राम प्रोटीन का उपभोग हुआ जबकि शहरी इलाके में ६९ ग्राम। वसा का उपभोग ग्रामीण इलाके में (४४ ग्राम) शहरी इलाके के उपभोक्ताओं(५८ ग्राम) की तुलना में कही कम हुआ।.
  • साल १९९३-९४ से २००४-०५ के बीच प्रति व्यक्ति-प्रतिदिन वसा के उपभोग में इजाफा हुआ है। यह बात ग्रामीण और शहरी भारत दोनों पर समान रुप से लागू होती है। ग्रामीण भारत में दस सालों के भीतर वसा के उपभोग में ३१ ग्राम के मुकाबले ३५ ग्राम (१३.१ फीसदी) का इजाफा हुआ तो शहरी भारत में ४२ ग्राम के मुकाबले ४७ ग्राम यानी १३ फीसदी का।
  • राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो घर में खाए जाने वाले भोजन की बारंबारता में कमी आयी है। भाजन की आदतों में आया यही बदलाव कुछ बड़े राज्यों मसलन गुजरात, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश में भी दीखता है। पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाकों में घर में खाये जाने वाले भोजन की बारंबारता में कोई बदलाव नहीं हुआ। जहां तक शहरी भारत का सवाल है, पिछले एक दशक में घर में भोजन खाने की बारंबारता में लगभग डेढ फीसदी की कमी आयी है।
  • राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो पिछले एक दशक में ग्रामीण भारत में घर के सदस्यों द्वारा घर ही पका भोजन खाने की घटना में ०.५७ फीसदी की कमी आयी है। शहरी भारत में यह गिरावट १.६६ फीसदी की हुई है।
  • ग्रामीण भारत में ५ से ९ और १० से १४ साल की उम्र के बच्चों और किशोरों में घर से बाहर भोजन लेने की घटना बाकी आयु वर्ग की तुलना में कहीं ज्यादा है। इसका एक कारण मिड डे मील योजना हो सकती है।
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[inside]वर्ल्ड बैंक के आकलन के मुताबिक[/inside] :
http://web.worldbank.org/WBSITE/EXTERNAL/NEWS/0,,contentMDK:20917151~pagePK:64257043~p
iPK:437376~theSitePK:4607,00.html


  • भारत में औसत से कम वजन के बच्चों की तादाद दुनिया में सबसे ज्यादा और अफ्रीका के सबसे गरीब माने जाने वाले मुल्कों की तुलना में दोगुनी है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कुपोषण की समस्य़ा कुछ इलाकों में बहुत ज्यादा है। भारत में ५ राज्यों और ५० फीसदी गांवों में कुल कुपोषितों की तादाद का ८० फीसदी हिस्सा रहता है।
  • पिछले एक दशक में कुपोषण की परिघटना में बड़ी थोड़ी सी कमी आई है। १९९२-९३ में भारत में औसत से कम वजन के बच्चों की तादाद ५३ फीसदी थी जो १९९८-९९ में घटकर ४७ फीसदी रह गई।
  • पांच साल से कम उम्र के ७५ फीसदी बच्चों में आयरन की कमी है और ५७ फीसदी बच्चों में विटामिन ए की कमी से पैदा होने वाले रोग के लक्षण हैं। देश के ८५ फीसदी जिलों में लोगों के आहार में आयोडीन की कमी है।  
  • बाल-कुपोषण, बाल-मृत्यु और व्यस्क व्यक्तियों के रोगी होने की मुख्य वजहों में एक है। कुपोषण के कारण बच्चों का संज्ञानात्मक विकास ठीक से नहीं हो पाता । आकलन के अनुसार बाल-मृत्यु की ५० फीसदी घटनाओं की बड़ी वजह कुपोषण है। मलेरिया,डायरिया और न्यूमोनिया से होने वाली बाल-मृत्यु की घटनाओं के लिए कुपोषण की स्थिति ५० फीसदी से भी ज्यादा जिम्मेदार है।भारत में रोगों के उपचार के ऊपर जितना खर्च होता है उसका २२ फीसदी हिस्सा बचाया जा सकता है बशर्ते बाल-कुपोषण की स्थिति पैदा ना हो।
  • भोजन की कमी का असर बच्चों के संज्ञानात्मक और शारीरिक गत्यातमकता के विकास पर पड़ता है। कुपोषित बच्चे शिक्षा ग्रहण करने के मामले में पिछड़े रह जाते हैं। इसका असर उनकी उत्पादकता पर पड़ता है। पोषाहार की कमी का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। आकलन के मुताबिक पोषाहार की कमी से भारत की अर्थ व्यवस्था को सालाना ढाई अरब अमेरिकी डॉलर का घाटा होता है। 
  • भारत में बाल-कुपोषण की मुख्य वजह बच्चों में संक्रमण का लगना और उनको साफ-सफाई के साथ आहार का ना मिलना है। भारत में बच्चों का सर्वाधिक कुपोषण जन्म के बाद के पहले तीन सालों में होता है जबकि भारत में आम मान्यता यह है कि बच्चों को प्रर्याप्त मात्रा में आहार नहीं मिलता इसलिए वे कुपोषित रह जाते हैं। इस मान्यता के कारण कुपोषण को दूर करने के लिए जो सरकारी कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं उनका जोर आहार की मात्रा को संतुलित करन पर है ना कि बच्चों के लालन-पालन की आदतों को बदलने पर।
  • जिन प्रान्तों में बाल-कुपोषण की स्थिति ज्यादा है वहां समेकित बाल विकास योजना के तहत ज्यादा राशि खर्च की जानी चाहिए लेकिन स्थिति इसके ठीक उलट है। ज्यादा कुपोषण वाले राज्यों में समेकित बाल-विकास योजना के मद में कम राशि दी जा रही है और अपेक्षाकृत कम कुपोषण वाले राज्यों में ज्यादा। ज्यादा कुपोषण वाले राज्यों में समेकित बाल विकास योजना के तहत चलाए जाने वाले केंद्रों की संख्या भी अपेक्षाकृत कम है। पांच राज्यों-राजस्थान, उत्तरप्रदेश, बिहार, उड़ीसा और मध्यप्रदेश में औसत से कम वजन के बच्चों की तादाद सबसे ज्यादा है जबकि समेकित बाल विकास योजना के प्रसार के मामले में ये राज्य नीचे के दस राज्यों में शामिल हैं।
  • औसत से कम वजन के बच्चों की तादाद दूसरे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के दौरान शहरों (३८ फीसदी) की अपेक्षा गांवों (५० फीसदी) में ज्यादा पायी गई। लड़कों(४५.४ फीसदी) की तुलना में लड़कियों(५३.२ फीसदी) में औसत से कम वजन के बच्चों की संख्या ज्यादा थी। जातिवार आकलन में पाया गया कि अनुसूचित जाति के बच्चों में ५३ फीसदी और उनुसूचित जनजाति के बच्चों में ५६ फीसदी बच्चे औसत से कम वजन के हैं जबकि बाकी जातियों में इनकी तादाद ४४ फीसदी है।
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[inside]नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे-३[/inside] यानी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के  अनुसार-

  • राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो औसत से कम लंबाई के बच्चों (तीन साल तक की उम्र वाले) की तादाद कम हुई है। नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे-२ के दौरान ऐसे बच्चों की तादाद ४५.५ फीसदी थी जबकि नैशमल फैमिली हैल्थ सर्वे-३ के दौरान ३८.४ फीसदी। नैशनल फैमिली हैल्थ सर्वे-३ के दौरान औसत से कम लंबाई के बच्चों की सर्वाधिक तादाद उत्तरप्रदेश (४६ फीसदी) में थी। इसके बाद छ्तीसगढ़ (४५.४ फीसदी) और गुजरात में (४२.४ फीसदी)।
  • राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो उम्र के लिहाज से सामान्य लंबाई मगर कम वजन के बच्चों की तादाद (इसका आकलन ३ साल की उम्र तक के बच्चों के बीच किया गया)  बढ़ी है। नेशलन फैमिली हैल्थ सर्वे-२ में ऐसे बच्चों की तादाद  १५.५ फीसदी थी जबकि नेशलन फैमिली हैल्थ सर्वे-३ में १९.१ फीसदी।नेशलन फैमिली हैल्थ सर्वे-३ के आकलन से जाहिर होता है कि  उम्र के लिहाज से औसत लंबाई मगर कम वजन के बच्चों (तीन साल तक की उम्र वाले) की तादाद मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा (३३.३ फीसदी) थी। इसके बाद नंबर झारखँड (३१.१ फीसदी), मेघालय (२८.२ फीसदी) और बिहार (२७.७ फीसदी) का है।
  • औसत से कम वजन के बच्चों की तादाद में नैशनल फैमिली हैल्थ सर्वे-२ की तुलना में थोड़ी सी कमी आयी है। एनएएफएचएस-२ के दौरान ऐसे बच्चों की तादाद राष्ट्रीय स्तर पर ४७.० फीसदी थी जबकि एनएफएचएस-३ के दौरान ४५.९ फीसदी। औसत से कम वजन के (तीन साल तक की उम्र वाले) बच्चों की तादाद मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा (६०.३ फीसदी) थी । इसके बाद झारखंड (५९.२ फीसदी),बिहार (५८.४ फीसदी), गुजरात (४७.४ फीसदी) और उत्तरप्रदेश (४७.३ फीसदी) का नंबर है।