मिड डे मील (एमडीएमएस) योजना

मिड डे मील (एमडीएमएस) योजना

 

वर्ल्ड फूड प्रोग्राम(WFP) द्वारा प्रस्तुत स्टेट ऑव स्कूल फीडिंग वर्ल्डवाइड 2013 नामक रिपोर्ट के अनुसार,

http://documents.wfp.org/stellent/groups/public/documents/

communications/wfp257481.pdf:

 

   भारत में साल 1995 में शुरु की गई मध्याह्न भोजन(मिड डे मील) विश्व में इस किस्म की सबसे बड़ी योजना है। साल 2011 में इस योजना की पहुंच भारत के 11 करोड़ 30 लाख 60 हजार बच्चों तक हो चुकी थी।

    स्कूलों में पोषाहार देने की योजना के मामले में सर्वाधिक बड़ी योजना चलाने वाले देशों के नाम हैं (11 करोड़ 40 लाख) ब्राजील (4 करोड़ 70 लाख), संयुक्त राज्य अमेरिकी (4 करोड़ 50 लाख) और चीन (2 करोड़ 60 लाख). दुनिया में कम से कम 43 देश ऐसे हैं जहां स्कूलों में छात्रों को पोषाहार देने की योजना 10 लाख से ज्यादा बच्चों तक पहुंची है।

  भारत में प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों की कुल तादाद के 79 फीसदी को मिड डे मील हासिल होता है।

   भारत में भोजन की सुरक्षा के मामले में अधिकार आधारित दृष्टि अपनायी गई है। इसके अंतर्गत कानून बनाकर उसमें कहा गया है देश में स्कूल जाने वाले हर बच्चे का अधिकार है कि उसे स्कूल की तरफ से भोजन दिया जाय। इस अधिकार को आहार-सुरक्षा और शिक्षा के अधिकार के व्यापक परिप्रेक्ष्य से जोड़ा गया है।

    नागरिक आंदोलनों की कोशिशों के कारण साल 2001 में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया था कि स्कूल में भोजन हासिल करना प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने वाले हर विद्यार्थी का अधिकार है। इस फैसले में कहा गया कि प्राथमिक विद्यालयों में सरकार द्वारा बच्चों को पकाया हुआ भोजन दिया जाना अनिवार्य है। इसके परिणामस्वरुप मिड डे मील योजना की कवरेज साल 2001 से 2011 के बीच 10 फीसदी बढ़ी है। क्षेत्रगत विभिन्नताएं भी हैं जिसका कारण राज्यस्तर पर वित्तीय बाधाओं का होना है।

 साल 2010-11 में राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों तथा केंद्र सरकार द्वारा साथ मिलकर मध्याह्न भोजन पर खर्च की गई राशि $3,85 करोड़ डालर थी। कई आकलनों में कहा गया है कि मध्याह्न भोजन के कारण स्कूलों में नामांकन पर सकारात्मक असर पडा है, भूखे पेट पढ़ाई करने की स्थितियों में सुधार आया है और लैंगिक तथा सामाजित समता की स्थितयां बेहतर हुई हैं।

    अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के बच्चों का स्कूली नामांकन विशेष रुप से बढ़ा है। साल 2001-2002 से 2007-2008 के बीच के स्कूली नामांकन से संबंधित आंकड़ों के अनुसार अनुसूचित जाति के बच्चों के स्कूली नामांकन में अच्छी बढ़ोत्तरी (103.1 से 132.3 फीसदी तक लड़कों के लिए और 82.3 से  116.7 तक लड़कियों के लिए) है। अनुसूचित जनजाति के बच्चों के स्कूली नामांकन के मामले में भी खासी बढ़ोत्तरी (106.9 से 134.4 फीसदी तक लड़कों के लिए और 85.1 से 124 फीसदी तक लड़कियों के लिए) दर्ज की गई है।

 

   दुनिया के विकासशील और विकसित देशों को एकसाथ मिलाकर देखें तो कुल 36 करोड़ 80 लाख यानि हर पाँच बच्चे में से एक को 169 देशों में प्रतिदिन स्कूलों में मध्याह्न भोजन हासिल होता है। स्कूलों में दिए जाने वाले पोषाहार के वैश्विक चलन के बावजूद, जिन जगहों पर स्कूलों में छात्रों को भोजन दिया जाना सर्वाधिक जरुरी है उन जगहों पर इस कार्यक्रम की कवरेज जरुरत से ज्यादा कम है। कम आय-वर्ग में आने वाले देशों मात्र 18 फीसदी स्कूली बच्चों को मध्याह्न भोजन हासिल होता जबकि मध्यवर्ती आय-वर्ग वाले देशों में 49 फीसदी बच्चों को यह सुविधा हासिल है।

   विश्वस्तर पर स्कूली बच्चों को स्कूल में भोजन मुहैया कराने के कार्यक्रमों पर $75 बिलयन डॉलर का निवेश हुआ है। यह निवेश बड़ा जान पड़ सकता है लेकिन इससे होने वाले फायदों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। रिपोर्टों में कहा गया है कि दानदाता या सरकार के द्वारा इस मद में खर्च किये जाने वाले हर एक डालर से आर्थिक फायदे के रुप में कम से कम 3 डॉलर हासिल होगा।

 

 

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