मिड डे मील (एमडीएमएस) योजना

मिड डे मील (एमडीएमएस) योजना

देश के अनेक हिस्सों में मिड डे मील योजना का मूल्यांकन कई स्वतंत्र संस्थाओं ने किया है। इन अध्ययनों में शामिल है-
  • कुक्ड मिड डे मील प्रोग्राम इन वेस्ट बंगाल-अ स्टडी ऑव बीरभूम डिस्ट्रिक्ट नाम से एक अध्ययन प्रोफेसर अमर्त्य सेन के प्रतीची रिसर्च टीम(२००५) का है।इस अध्ययन का आकलन है कि मिड डे मील योजना से प्राथमिक शिक्षा के सार्वीकरण में मदद मिली है। बच्चों का स्कूल में नामांकन बढ़ा है और इनकी उपस्थिति की स्थिति में सुदार आया है।यह बढ़त सबसे ज्यादा अनुसूचित जाति-जनजाति के छात्र-छात्राओं के मामले में हुई है। इस अध्ययन का एक निष्कर्ष यह भी है कि मीड डे मील योजना से शिक्षकों की गैरहाजिरी की घटना में कमी आयी है।
  • राजस्थान विश्वविद्यालय और यूनिसेफ द्वारा प्रस्तुत सिचुएशन एनालिसिस ऑव मिड डे मील प्रोग्राम इन राजस्थान नामक अध्ययन के अनुसार मिड डे मील योजना में रोजाना बदल बदल कर भोजन दिए जाने से छात्रों के नामांकन और उपस्थिति पर साकारात्मक प्रभाव पड़ा है। इस योजना से सामाजिक समानता बढ़ी है क्योंकि अलग अलग सामाजिक वर्ग के बच्चों को एक ही पांत और साथ में इस योजना के अन्तर्गत भोजन करना होता है। इस योजना से लैंगिक असमानता को भी दूर करने में मदद मिली है क्योंकि लडकियों के नामांकन में बढ़ोत्तरी हुई है।
  • समाज प्रगति सहयोग नामक संस्था ने साल २००५ में मिड डे मील इन मध्यप्रदेश नाम से मध्यप्रदेश के ७० सर्वाधिक पिछड़े गांवों में एक अध्ययन किया। इस अध्ययन का निष्कर्ष था कि इन गांवों में मिड डे मील योजना के कारण स्कूली नामांकन में १५ फीसदी का इजाफा हुआ । अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के बच्चों के नामांकन में ४३ फीसदी का इजाफा हुआ।
  • इकॉनॉमिक एन्ड पॉलिटिकल वीकली नामक पत्रिका में प्रकाशित फरजाना अफरीदी के शोध आलेख मिड डे मील्स्-द इम्पलीमेंटेशन एन्ड इन्सटीट्युशनल आर्गनाइजेशन ऑव द प्रोग्राम इन टू स्टेटस्(अप्रैल २००५)  का निष्कर्ष है कि इस योजना के कार्यान्वयन में तेजी से सुधार आ रहा है लेकिन अब भी इस दिशा में काफी कुछ किया जाना शेष है। सुरुचि भोजन नाम से शुरु की गई नयी पहल दलिया देने के पुराने प्रग्राम से कहीं ज्यादा सफल है।
  • अनुराधा दे, क्लेर नोरोन्हा और मीरा सैम्सन द्वारा प्रस्तुत मिड डे मील स्कीमस् इन दिल्ली-अ फंक्शनिंग प्रोग्राम नामक सर्वेक्षण में एमसीडी के कुल १२ विद्यालयों की जांच की गई। इस अध्ययन के अनुसार इन सभी विद्यालयों में बच्चों को मिड डे मील का खाना दिया जा रहा था और इसका सबसे ज्यादा सकारात्मक असर लड़कियों की स्कूली उपस्थिति पर पड़ा था जिन्हें अक्सर घर से खाली पेट स्कूल भेज दिया जाता था।
  • डाक्टर राम नाइक, धारवाड़ विश्विद्यालय,  द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट ऑन अक्षर दसोहा स्कीम ऑव कर्नाटक के अनुसार ग्रामीण क्षेत्र के स्कूलों में बच्चों के नामांकन में इस योजना के कारण बड़ी तेजी से इजाफा हुआ है। मिड डे मील योजना के कारण  शिक्षकों की गैर हाजिरी समस्या से भी निपटने में मदद मिली है। सर्वेक्षण में पता चला कि ६४ फीसदी विद्यालयों में शिक्षकों की गैरमौजूदगी में कमी आयी है।
  • राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवम् प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) कि एक रिपोर्ट(२००५) के अनुसार जो बच्चे मिड डे मील योजना से लाभान्वित हुए उनकी बोध-क्षमता उन बच्चों से कहीं ज्यादा थी जिन्हें इस योजना का लाभ नहीं मिला था।
  • मिड डे मील स्कीम इन कर्नाटक-ए स्टडी(नेशनल इंस्टीट्यूट ऑव पब्लिक कोऑपरेशन एंड चाइल्ड डेवलपमेंट द्वारा प्रस्तुत-२००५-०६)-अधिकतर स्कूलों में मिड डे मील योजना से छात्रों की उपस्थिति में सुदार आया है और गैरहाजिरी कम हुई है। इस योजना से समाजिक समानता की भावना बलवती हुई है और छात्रों में भाईचारा बढ़ा है।


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