मिड डे मील (एमडीएमएस) योजना

मिड डे मील (एमडीएमएस) योजना

  • मिड डे मील योजना को चलते हुए एक दशक से ज्यादा का समय हो गया लेकिन इस योजना से किन लक्ष्यों को साधा जाना है इसके बारे में अब भी अस्पष्टता की स्थिति बनी हुई है। साल २००६ के सितंबर में नीति के स्तर पर एक गुणात्मक बदलाव आया(पहले जोर नामांकन बढ़ाने, शिक्षण का स्तर सुधारने और उपस्थिति बढ़ाने पर था) और जोर पोषण तथा स्वास्थ्य के पहलू पर दिया जाने लगा।
  • मंत्रालय ने इस बात की जांच नहीं की है कि इस योजना से छात्रों के नामांकन और उपस्थिति में कितना इजाफा हुआ है। अंकेक्षण(ऑडिट) के लिए जो आंकड़े इक्कठे किए गए उनके विश्लेषण से इस बात का पक्का पता नहीं चलता कि छात्रों की उपस्थिति या नामांकन में तुलनात्मक रुप से कुछ सुधार हुआ है। 
  • मिड डे मील योजना का एक लक्ष्य प्राथमिक विद्यालय के छात्रों की सेहत को पोषाहार देकर तंदुरुस्त बनाना था और साल २००६ के सितंबर महीने में जो बदलाव किये गए उसमें इसी लक्ष्य को प्रमुख बना दिया गया।मंत्रालय ने योजना के इस प्रमुख लक्ष्य की पूर्ति की जांच के लिए पोषण से जुड़े आंकड़े अब भी एकत्र नहीं किये हैं।योजना में यह भी कहा गया है कि बच्चों के स्वास्थ्य की जांच करायी जाएगी लेकिन इसके अनुकूल स्वास्थ्य एवम् परिवार कल्याण मंत्रालय के साथ मिलकर कोई व्यवस्था नहीं हो पायी है। अधिकतर राज्यों में छात्रों को भोजन में सूक्ष्म पोषक तत्व और पेट के कीड़े मारने की दवा मुहैया नहीं हो पा रही।
  • देशव्यापी स्तर पर इस योजना के क्रियान्वयन को परखने के लिए की गई ऑडिट से पता चलता है कि अंदरुनी तौर पर इस योजना में निगरानी और नियंत्रण रखने के काम ढिलाई बरती जाती है। कार्यक्रम के मूल्यांकन और निरीक्षण का काम नियमित रुप से नहीं होता और ना ही कार्यक्रम के लागू करने में पहले हुई गलतियों से सीख लेते हुए स्थानीय स्तर पर उसमें नवीकरण के प्रयास किये जाते हैं। मंत्रालय की तरफ से राज्य और केंद्र के स्तर पर योजना की निगरानी और संचालन के लिए समितियां बनायी गई हैं लेकिन ये समितियां नियमित रुप से बैठक नहीं करतीं। केंद्रीय स्तर पर इस समिति की बैठक साल २००५ के बाद से बस दो बार हुई है जबकि अब तक पांच बार बैठक होनी चाहिए थी। निगरीनी के लिए बनायी गई राज्य स्तरीय समितियों की स्थिति इस मामले में इससे भी बुरी है।
  • ऑडिट के दौरान नमूने के तौर पर कुछ विद्यालयों की जांच की गई। अधिकतर विद्यालयों में परोसने जाने वाले भोजन की गुणवत्ता की जांच का काम नियमित रुप से नहीं हो रहा था। कुछ बुनियादी रिकार्ड (मसलन-जारी और प्राप्त अनाज की मात्रा की रसीद, भोजन की गुणवत्ता के बारे में टिपण्णी और गांव की की पंचायत की शिक्षा समिति की भागीदारी के प्रमाण आदि) विद्यालयों में सिरे से गायब थे।
  • राज्यों में योजना के क्रियान्वयन के पहलुओं की जांच से पता चला कि फंड को सही वक्त पर जारी नहीं किया जा रहा, परिवाहन खर्चे में अनियमितता बरती जा रही है, कार्यक्रम को लागू करने लायक बुनियादी ढांचे का अभाव है और जारी किए गये अनाज की मात्रा में लक्ष्य तक पहुंचने से पहले हेराफेरी होती है।
  • मंत्रालय अब भी इस बात की कोई कारगर व्यवस्था नहीं कर सका कि मीड डे मील के काम से शिक्षकों की शैक्षिक गतिविधि में कोई बाधा नहीं पहुंचे। ऐसे कई उदाहरण मिले जिससे जाहिर होता है कि शिक्षक पढ़ाने का ढेर सारा वक्त मिड डे मील के अन्तर्गत परोसे जाने वाले भोजन की बंदोबस्ती और देखरेख में लगा देते हैं।


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