Resource centre on India's rural distress
 
 

मिड डे मील (एमडीएमएस) योजना

खास बात

• मिड डे मील योजना की शुरुआत साल 1995 में हुई लेकिन अधिकतर राज्यों ने इस योजना के नाम पर मासिक आधार पर कच्चा अनाज देना शुरु किया। अदालत ने २८ नवंबर २००२ को इसका संज्ञान लेते हुए आदेश दिया कि बच्चों को योजना के तहत पकाया हुआ भोजन दिया जाय।###

•मिड डे मील  योजना का संशोधन और परिमार्जन साल 2004 के सितंबर में हुआ और इसे सार्विक कर दिया गया। इस योजना के तहत केंद्र सरकार ने सभी सरकारी विद्यालयों, स्थानीय निकायों द्वारा संचालित स्कूलों और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के कक्षा I–V तक के विद्यार्थियों को पकाया हुआ भोजन देने के लिए प्रति छात्र प्रति स्कूलीदिन एक रुपये का खर्च अपनी तरफ से देना स्वीकार किया।#

• साल 1995 में मिड डे मील योजना के अन्तर्गत 3.22  लाख स्कूलों के कुल 3.34 करोड़ बच्चों को भोजन हासिल था जबकि साल 2006–07 में यह तादाद बढकर 9.5 प्राइमरी स्कूलों के 12  करोड़ विद्यार्थियों तक जा पहुंची। #

• इस योजना के तहत साल 2001-02  में 18.67 लाख टन चावल का आबंटन हुआ था जो साल 2008-09 में बढ़कर 21.48 लाख टन हो गया । 2008-09. गेहूं के आबंटन में कमी आई( साल साल 2001-02 में 9.96 लाख टन जबकि साल 2008-09 में 4.78 लाख टन) ##

• साल 2001-02 में  चावल के कुल आबंटन में 72 फीसदी का उपभोग हुआ जबकि यही मात्रा साल  2008-09 में बढ़कर ७४ फीसदी हो गई। साल 2001-02 में गेहूं के कुल आबंटन के 73 फीसदी का उपभोग हुआ था जो साल 2008-09 में बढ़कर 91 फीसदी हो गया ।##
   
• ऑडिट के जरिए इस योजना की कई खामियों का खुलासा हुआ है। इसमें एक यह भी है कि शिक्षकों को भोजन पकाने के काम की देखभाल करने में काफी समय खर्च करना पड़ता है और इससे उनके अध्यापन के घंटों में कमी आती है, या असर पड़ता है।@

 

# योजना आयोग  (2007): अध्याय 1: शिक्षा , भारत सरकार
http://planningcommission.nic.in/plans/planrel/fiveyr/11th/11_v2/11v2_ch1.pdf
## खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग, भारत सरकार
http://fcamin.nic.in/dfpd/EventDetails.asp?EventId=152&Section=Welfare%20Schemes&ParentID=0&Parent=1&check=0
### रीतिका खेरा  (2009): राइट टू फूड एक्ट- बियोन्ड चीप प्रामिसेज  18 जुलाई इकॉनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली
@ परफार्मेंस ऑडिट रिपोर्ट ऑन एमडीएमएस- कंपट्रोलर एंड ऑडिटर जेनरल (2008), http://cag.gov.in/html/reports/civil/2008_PA13_MDMscivil/highlights.pdf

 

 

 आगे पढ़े

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वर्ल्ड फूड प्रोग्राम(WFP) द्वारा प्रस्तुत [inside]स्टेट ऑव स्कूल फीडिंग वर्ल्डवाइड 2013 नामक रिपोर्ट[/inside] के अनुसार,

http://documents.wfp.org/stellent/groups/public/documents/

communications/wfp257481.pdf:

 

   भारत में साल 1995 में शुरु की गई मध्याह्न भोजन(मिड डे मील) विश्व में इस किस्म की सबसे बड़ी योजना है। साल 2011 में इस योजना की पहुंच भारत के 11 करोड़ 30 लाख 60 हजार बच्चों तक हो चुकी थी।

    स्कूलों में पोषाहार देने की योजना के मामले में सर्वाधिक बड़ी योजना चलाने वाले देशों के नाम हैं (11 करोड़ 40 लाख) ब्राजील (4 करोड़ 70 लाख), संयुक्त राज्य अमेरिकी (4 करोड़ 50 लाख) और चीन (2 करोड़ 60 लाख). दुनिया में कम से कम 43 देश ऐसे हैं जहां स्कूलों में छात्रों को पोषाहार देने की योजना 10 लाख से ज्यादा बच्चों तक पहुंची है।

  भारत में प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों की कुल तादाद के 79 फीसदी को मिड डे मील हासिल होता है।

   भारत में भोजन की सुरक्षा के मामले में अधिकार आधारित दृष्टि अपनायी गई है। इसके अंतर्गत कानून बनाकर उसमें कहा गया है देश में स्कूल जाने वाले हर बच्चे का अधिकार है कि उसे स्कूल की तरफ से भोजन दिया जाय। इस अधिकार को आहार-सुरक्षा और शिक्षा के अधिकार के व्यापक परिप्रेक्ष्य से जोड़ा गया है।

    नागरिक आंदोलनों की कोशिशों के कारण साल 2001 में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया था कि स्कूल में भोजन हासिल करना प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने वाले हर विद्यार्थी का अधिकार है। इस फैसले में कहा गया कि प्राथमिक विद्यालयों में सरकार द्वारा बच्चों को पकाया हुआ भोजन दिया जाना अनिवार्य है। इसके परिणामस्वरुप मिड डे मील योजना की कवरेज साल 2001 से 2011 के बीच 10 फीसदी बढ़ी है। क्षेत्रगत विभिन्नताएं भी हैं जिसका कारण राज्यस्तर पर वित्तीय बाधाओं का होना है।

 साल 2010-11 में राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों तथा केंद्र सरकार द्वारा साथ मिलकर मध्याह्न भोजन पर खर्च की गई राशि $3,85 करोड़ डालर थी। कई आकलनों में कहा गया है कि मध्याह्न भोजन के कारण स्कूलों में नामांकन पर सकारात्मक असर पडा है, भूखे पेट पढ़ाई करने की स्थितियों में सुधार आया है और लैंगिक तथा सामाजित समता की स्थितयां बेहतर हुई हैं।

    अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के बच्चों का स्कूली नामांकन विशेष रुप से बढ़ा है। साल 2001-2002 से 2007-2008 के बीच के स्कूली नामांकन से संबंधित आंकड़ों के अनुसार अनुसूचित जाति के बच्चों के स्कूली नामांकन में अच्छी बढ़ोत्तरी (103.1 से 132.3 फीसदी तक लड़कों के लिए और 82.3 से  116.7 तक लड़कियों के लिए) है। अनुसूचित जनजाति के बच्चों के स्कूली नामांकन के मामले में भी खासी बढ़ोत्तरी (106.9 से 134.4 फीसदी तक लड़कों के लिए और 85.1 से 124 फीसदी तक लड़कियों के लिए) दर्ज की गई है।

 

   दुनिया के विकासशील और विकसित देशों को एकसाथ मिलाकर देखें तो कुल 36 करोड़ 80 लाख यानि हर पाँच बच्चे में से एक को 169 देशों में प्रतिदिन स्कूलों में मध्याह्न भोजन हासिल होता है। स्कूलों में दिए जाने वाले पोषाहार के वैश्विक चलन के बावजूद, जिन जगहों पर स्कूलों में छात्रों को भोजन दिया जाना सर्वाधिक जरुरी है उन जगहों पर इस कार्यक्रम की कवरेज जरुरत से ज्यादा कम है। कम आय-वर्ग में आने वाले देशों मात्र 18 फीसदी स्कूली बच्चों को मध्याह्न भोजन हासिल होता जबकि मध्यवर्ती आय-वर्ग वाले देशों में 49 फीसदी बच्चों को यह सुविधा हासिल है।

   विश्वस्तर पर स्कूली बच्चों को स्कूल में भोजन मुहैया कराने के कार्यक्रमों पर $75 बिलयन डॉलर का निवेश हुआ है। यह निवेश बड़ा जान पड़ सकता है लेकिन इससे होने वाले फायदों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। रिपोर्टों में कहा गया है कि दानदाता या सरकार के द्वारा इस मद में खर्च किये जाने वाले हर एक डालर से आर्थिक फायदे के रुप में कम से कम 3 डॉलर हासिल होगा।

 

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२८ अगस्त २००४ के दिन के जारी, [inside]मिड डे मील विषयक राष्ट्रीय परामर्ष परिषद की सिफारिशों के अनुसार[/inside]-
http://pmindia.nic.in/nac/communication/meal.pdf

  • प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर छात्रों को पोषाहार देने की राष्ट्रीय योजना (मिड डे मील) की शुरुआत १९९५ में हुई।
  • साल २००२ के बाद छात्रों को पकाया हुआ भोजन मुहैया कराने वाले राज्यों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ। इसके पहले सुप्रीम कोर्ट ने सभी रोज्यों को आदेश दिया (तारीख २८ नवंबर, २००१) था कि प्राइमरी स्कूलों में बच्चों को दोपहर का भोजन दिया जाय।

ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के दस्तावेज के अनुसार-
http://planningcommission.nic.in/plans/planrel/fiveyr/11th/11_v2/11v2_ch1.pdf

  • मिड डे मील योजना की शुरुआत साल १९९५ में हुई। इसके पीछे उद्देश्य यह था कि बच्चों की नामांकन बढ़े, स्कूलों में उनकी उपस्थिति सुनिश्चत हो,वे कक्षा की पढ़ाई बीच में ना छोड़ें और साथ ही बच्चों पौष्टिक भोजन मिल सके। 
  • साल १९९५ में मिड डे मील योजना के अन्तर्गत ३.२२ लाख प्राइमरी स्कूलों के ३.३४ करोड़ बच्चों को मिड डे मील योजना के अन्तर्गत पोषाहार देना आरंभ हुआ और यह संख्या २००६-०७ में बढ़कर ९.५ लाख स्कूल और १२ करोड़ छात्रों तक जा पहुंची है।
  • साल २००४ के सितंबर महीने में एमडीएमएस में संशोधन किए गए और इसे सर्वव्यापी बनाया गया। सरकारी अनुदान प्राप्त स्कूल, स्थानीय शासन के अन्तर्गत चलने वाली शिक्षा शालाएं और सरकारी प्राइमरी स्कूल में (कक्षा १ से ४ तक) पढ़ने वाले प्रत्येक छात्र को पोषाहार पकायी हुई अवस्था में मिले, इसे सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीय कोष से प्रत्येक छात्र १ रुपये देना मंजूर हुआ।
  • साल २००८-०९ तक एमडीएमएस के दायरे में १८ करोड़ बच्चे आ गए हैं।
  • अपर प्राइमरी स्कूल के बच्चों के लिए सुनिश्चित किया गया है कि उन्हें भोजन से ७०० किलो कैलोरी हासिल हो। इसके लिए १५० ग्राम अनाज और २० ग्राम प्रोटीन की मात्रा तय की गई है।
  • विशेष वर्ग में आने वाले राज्यों को मिड डे मील सामग्री के परिवहन के मद में प्रति किविंटल १०० रुपये और सामान्य श्रेणी के राज्यों को प्रति किविन्टल ७५ रुपये मिलेंगे।
  • साल २००६ में मिड डे मील योजना में फिर से संशोधन किया गया और भोजन पकाने के मद में प्रति छात्र रकम २ रुपये कर दी गई। भोजन से प्राप्त कैलोरी की मात्रा घटाकर ४५० किलोकैलोरी ऱखी गई। प्रोटीन की मात्रा घटाकर १२ ग्राम कर दी गई।
  • रिपोर्टों का आकलन है कि एमडीएमएस से ग्रामीण आबादी का ८.१ फीसदी और शहरी आबादी का ३.२ फीसदी लाभान्वित हुआ है।
  • एमडीएमएस से गांवों और शहरों में आबाद निम्न आय वर्ग के परिवार के बच्चों को फायदा पहुंचा है।

एमडीएमएस लागू करने के उत्कृष्ट उदाहरण

तमिलनाडु में प्राइमरी स्कूलों के सभी बच्चों को हैल्थ कार्ड जारी किये गए हैं और प्रत्येक  वृहस्पतिवार को स्कूलों में हैल्थ डे मनाया जाता है। स्कूली परिसर में करीपत्ता और सहिजन के पेड़ लगाए गये हैं। कर्नाटक के सभी स्कूलों में रसोई गैस के इस्तेमाल से मिड डे मील का भोजन तैयार किया जाता है। पांडिचेरी में प्राइमरी स्कूल के बच्चों को मिड डे मील के तहत दोपहर का भोजन तो दिया ही जाता है साथ ही में राजीव गाधी ब्रेकफास्ट योजना के अन्तर्गत उन्हें बिस्किट के साथ एक ग्लास गर्म दूध भी दिया जाता है। बिहार में बाल संसद के माध्यम से यह सुनिश्चित किया गया है कि मिड डे मील का वितरण सुचारु रुप से हो। उत्तराखंड में प्राइमरी स्कूलों में महिलाओं को भोजनमाता के रुप में नियुक्त किया गया है। गुजरात, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में बच्चों को भोजन के साथ सूक्ष्म पोषक तत्त्व मुहैया कराया जा रहा है और उन्हे पेट के कीड़े मारने की दवा भी जाती है।
स्रोत-ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना का दस्तावेज

 

 

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[inside]मीड डे मील योजना- सरकार का तर्क[/inside]-
http://pib.nic.in/archieve/flagship/bkg_mdm1.pdf

  • स्कूलों में बच्चों की भागीदारी बढ़ाना-: मिड डे मील योजना से स्कूलों में बच्चों की भागीदारी बढ़ी है। स्कूलों में सिर्फ नामांकन की संख्या ही नहीं बढ़ी बल्कि बच्चों की उपस्थिति में भी सकारात्मक बदलाव आया है।
  • गरीब परिवार के छात्रों के भुखमरी से बचाना-: कई बच्चे घर से बिना गुछ खाये-पीये स्कूल आते हैं। जो बच्चे थोड़ा बहुत खाना खाकर स्कूल पहुंचते हैं वे भी दोपहर तक भूख से छटपटाने लगते हैं क्योंकि उन्हें घर से दोपहर के खाने के लिए कुछ भी नहीं मिलता या फिर उनका घर स्कूल से इतना दूर होता है कि दोपहर के खाने के लिए घर जायें तो समय पर लौटना मुश्किल हो। मिड डे मील योजना से ऐसे बच्चों को लाभ हो सकता है जो एक ना एक कारण से स्कूल में भूखे रहने के लिए मजबूर हैं।
  • स्कूली बच्चों को सेहतमंद बनाना-:मिड डे मील योजना बच्चों को निरंतर पोषाहार प्रदान करने की भूमिका अदा कर सकती है। इससे बच्चों की तंदुरुस्ती बढ़ेगी।
  • मिड डे मील योजना का शैक्षिक मूल्य है-: अगर मिड डे मील योजना को सुनियोजित ढंग से चलाया जाय तो इसके सहारे बच्चों के भीतर कई अच्छी आदतें विकसित की जा सकती हैं। मसलन, उन्हें खाने से पहले और बाद में हाथ को अच्छी तरह से साफ करने के बारे में बताया जा सकता है। बच्चों के भीतर साफ पानी, देह-हाथ की सफाई और इससे जुड़ी बाकी बातों के लिए रुचि पैदा की जा सकती है।
  • सामाजिक समानता के मूल्य को बढ़ावा देना- मिड डे मील योजना के सहारे समाजिक समानता के मूल्य को बढ़ावा दिया जा सकता है क्योंकि स्कूल में अलग अलग सामाजिक पृष्ठभूमि के बच्चे आते हैं और उन्हें एक साथ-एक पांच में भोजन करना होता है। इससे जाति और धर्म के आधार पर व्यक्ति व्यक्ति को अलगा कर देखने की भावना कमजोर होती हैं। भोजन को अगर किसी दलित समुदाय के व्यक्ति द्वारा पकाया जा रहा है तो इससे भी जातिगत पूर्वग्रह कमजोर होते हैं।
  • लैंगिक समानता को बढ़ावा देना-स्कूलों में लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की भागीदारी(नामांकन और उपस्थिति के मामले में) कम है। मिड डे मील योजना के सहारे स्कूलों में इस दिशा में बराबरी लायी जा सकती है। एक तो जिन कारणों से लड़कियां स्कूल नहीं आ पातीं, मिड डे मील योजना उन कारणों को कमजोर करती है दूसरे मीड डे मील योजना में महिलाओं को रोजगार देने की भी अच्छी क्षमता है। महिलाये घर के बजाय अगर स्कूलों में दोपहर का भोजन तैयार करती हैं तो उन्हें घर के रोज के चूल्हे-चक्की के काम से थोड़ी राहत होगी और साथ में आमदनी भी बढ़ेगी।
  • मनोवैज्ञानिक लाभ- शारीरिक रुप से कमजोर होने पर बच्चे के अंदर आत्मविश्वास में कमी आती है. उसके भीतर असुरक्षा बोध बढ़ता है और बच्चे के मन लगातार चिन्ता और तनाव में रहता है। इन सबका असर बच्चे के ज्ञानात्मक, भावनात्मक और सामाजिक विकास पर पड़ता है। मीड डे मील योजना के भीतर बच्चों के मनोवैज्ञानिक विकास की संभावना है।

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[inside]मिड मील योजना-क्या कहते हैं सर्वेक्षण?[/inside]
http://pib.nic.in/archieve/flagship/bkg_mdm1.pdf
देश के अनेक हिस्सों में मिड डे मील योजना का मूल्यांकन कई स्वतंत्र संस्थाओं ने किया है। इन अध्ययनों में शामिल है-
  • कुक्ड मिड डे मील प्रोग्राम इन वेस्ट बंगाल-अ स्टडी ऑव बीरभूम डिस्ट्रिक्ट नाम से एक अध्ययन प्रोफेसर अमर्त्य सेन के प्रतीची रिसर्च टीम(२००५) का है।इस अध्ययन का आकलन है कि मिड डे मील योजना से प्राथमिक शिक्षा के सार्वीकरण में मदद मिली है। बच्चों का स्कूल में नामांकन बढ़ा है और इनकी उपस्थिति की स्थिति में सुदार आया है।यह बढ़त सबसे ज्यादा अनुसूचित जाति-जनजाति के छात्र-छात्राओं के मामले में हुई है। इस अध्ययन का एक निष्कर्ष यह भी है कि मीड डे मील योजना से शिक्षकों की गैरहाजिरी की घटना में कमी आयी है।
  • राजस्थान विश्वविद्यालय और यूनिसेफ द्वारा प्रस्तुत सिचुएशन एनालिसिस ऑव मिड डे मील प्रोग्राम इन राजस्थान नामक अध्ययन के अनुसार मिड डे मील योजना में रोजाना बदल बदल कर भोजन दिए जाने से छात्रों के नामांकन और उपस्थिति पर साकारात्मक प्रभाव पड़ा है। इस योजना से सामाजिक समानता बढ़ी है क्योंकि अलग अलग सामाजिक वर्ग के बच्चों को एक ही पांत और साथ में इस योजना के अन्तर्गत भोजन करना होता है। इस योजना से लैंगिक असमानता को भी दूर करने में मदद मिली है क्योंकि लडकियों के नामांकन में बढ़ोत्तरी हुई है।
  • समाज प्रगति सहयोग नामक संस्था ने साल २००५ में मिड डे मील इन मध्यप्रदेश नाम से मध्यप्रदेश के ७० सर्वाधिक पिछड़े गांवों में एक अध्ययन किया। इस अध्ययन का निष्कर्ष था कि इन गांवों में मिड डे मील योजना के कारण स्कूली नामांकन में १५ फीसदी का इजाफा हुआ । अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के बच्चों के नामांकन में ४३ फीसदी का इजाफा हुआ।
  • इकॉनॉमिक एन्ड पॉलिटिकल वीकली नामक पत्रिका में प्रकाशित फरजाना अफरीदी के शोध आलेख मिड डे मील्स्-द इम्पलीमेंटेशन एन्ड इन्सटीट्युशनल आर्गनाइजेशन ऑव द प्रोग्राम इन टू स्टेटस्(अप्रैल २००५)  का निष्कर्ष है कि इस योजना के कार्यान्वयन में तेजी से सुधार आ रहा है लेकिन अब भी इस दिशा में काफी कुछ किया जाना शेष है। सुरुचि भोजन नाम से शुरु की गई नयी पहल दलिया देने के पुराने प्रग्राम से कहीं ज्यादा सफल है।
  • अनुराधा दे, क्लेर नोरोन्हा और मीरा सैम्सन द्वारा प्रस्तुत मिड डे मील स्कीमस् इन दिल्ली-अ फंक्शनिंग प्रोग्राम नामक सर्वेक्षण में एमसीडी के कुल १२ विद्यालयों की जांच की गई। इस अध्ययन के अनुसार इन सभी विद्यालयों में बच्चों को मिड डे मील का खाना दिया जा रहा था और इसका सबसे ज्यादा सकारात्मक असर लड़कियों की स्कूली उपस्थिति पर पड़ा था जिन्हें अक्सर घर से खाली पेट स्कूल भेज दिया जाता था।
  • डाक्टर राम नाइक, धारवाड़ विश्विद्यालय,  द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट ऑन अक्षर दसोहा स्कीम ऑव कर्नाटक के अनुसार ग्रामीण क्षेत्र के स्कूलों में बच्चों के नामांकन में इस योजना के कारण बड़ी तेजी से इजाफा हुआ है। मिड डे मील योजना के कारण  शिक्षकों की गैर हाजिरी समस्या से भी निपटने में मदद मिली है। सर्वेक्षण में पता चला कि ६४ फीसदी विद्यालयों में शिक्षकों की गैरमौजूदगी में कमी आयी है।
  • राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवम् प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) कि एक रिपोर्ट(२००५) के अनुसार जो बच्चे मिड डे मील योजना से लाभान्वित हुए उनकी बोध-क्षमता उन बच्चों से कहीं ज्यादा थी जिन्हें इस योजना का लाभ नहीं मिला था।
  • मिड डे मील स्कीम इन कर्नाटक-ए स्टडी(नेशनल इंस्टीट्यूट ऑव पब्लिक कोऑपरेशन एंड चाइल्ड डेवलपमेंट द्वारा प्रस्तुत-२००५-०६)-अधिकतर स्कूलों में मिड डे मील योजना से छात्रों की उपस्थिति में सुदार आया है और गैरहाजिरी कम हुई है। इस योजना से समाजिक समानता की भावना बलवती हुई है और छात्रों में भाईचारा बढ़ा है।

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[inside]सीएजी द्वारा प्रस्तुत द परफार्मेंस ऑडिट ऑन नेशनल प्रोग्राम फॉर न्यूट्रीशनल सपोर्ट टू प्राइमरी एजुकेशन(मिड डे मील स्कीम)[/inside]-रिपोर्ट संख्या-पीए १३(२००८)
http://cag.gov.in/html/reports/civil/2008_PA13_MDMscivil/highlights.pdf में कहा गया है- 
  • मिड डे मील योजना को चलते हुए एक दशक से ज्यादा का समय हो गया लेकिन इस योजना से किन लक्ष्यों को साधा जाना है इसके बारे में अब भी अस्पष्टता की स्थिति बनी हुई है। साल २००६ के सितंबर में नीति के स्तर पर एक गुणात्मक बदलाव आया(पहले जोर नामांकन बढ़ाने, शिक्षण का स्तर सुधारने और उपस्थिति बढ़ाने पर था) और जोर पोषण तथा स्वास्थ्य के पहलू पर दिया जाने लगा।
  • मंत्रालय ने इस बात की जांच नहीं की है कि इस योजना से छात्रों के नामांकन और उपस्थिति में कितना इजाफा हुआ है। अंकेक्षण(ऑडिट) के लिए जो आंकड़े इक्कठे किए गए उनके विश्लेषण से इस बात का पक्का पता नहीं चलता कि छात्रों की उपस्थिति या नामांकन में तुलनात्मक रुप से कुछ सुधार हुआ है। 
  • मिड डे मील योजना का एक लक्ष्य प्राथमिक विद्यालय के छात्रों की सेहत को पोषाहार देकर तंदुरुस्त बनाना था और साल २००६ के सितंबर महीने में जो बदलाव किये गए उसमें इसी लक्ष्य को प्रमुख बना दिया गया।मंत्रालय ने योजना के इस प्रमुख लक्ष्य की पूर्ति की जांच के लिए पोषण से जुड़े आंकड़े अब भी एकत्र नहीं किये हैं।योजना में यह भी कहा गया है कि बच्चों के स्वास्थ्य की जांच करायी जाएगी लेकिन इसके अनुकूल स्वास्थ्य एवम् परिवार कल्याण मंत्रालय के साथ मिलकर कोई व्यवस्था नहीं हो पायी है। अधिकतर राज्यों में छात्रों को भोजन में सूक्ष्म पोषक तत्व और पेट के कीड़े मारने की दवा मुहैया नहीं हो पा रही।
  • देशव्यापी स्तर पर इस योजना के क्रियान्वयन को परखने के लिए की गई ऑडिट से पता चलता है कि अंदरुनी तौर पर इस योजना में निगरानी और नियंत्रण रखने के काम ढिलाई बरती जाती है। कार्यक्रम के मूल्यांकन और निरीक्षण का काम नियमित रुप से नहीं होता और ना ही कार्यक्रम के लागू करने में पहले हुई गलतियों से सीख लेते हुए स्थानीय स्तर पर उसमें नवीकरण के प्रयास किये जाते हैं। मंत्रालय की तरफ से राज्य और केंद्र के स्तर पर योजना की निगरानी और संचालन के लिए समितियां बनायी गई हैं लेकिन ये समितियां नियमित रुप से बैठक नहीं करतीं। केंद्रीय स्तर पर इस समिति की बैठक साल २००५ के बाद से बस दो बार हुई है जबकि अब तक पांच बार बैठक होनी चाहिए थी। निगरीनी के लिए बनायी गई राज्य स्तरीय समितियों की स्थिति इस मामले में इससे भी बुरी है।
  • ऑडिट के दौरान नमूने के तौर पर कुछ विद्यालयों की जांच की गई। अधिकतर विद्यालयों में परोसने जाने वाले भोजन की गुणवत्ता की जांच का काम नियमित रुप से नहीं हो रहा था। कुछ बुनियादी रिकार्ड (मसलन-जारी और प्राप्त अनाज की मात्रा की रसीद, भोजन की गुणवत्ता के बारे में टिपण्णी और गांव की की पंचायत की शिक्षा समिति की भागीदारी के प्रमाण आदि) विद्यालयों में सिरे से गायब थे।
  • राज्यों में योजना के क्रियान्वयन के पहलुओं की जांच से पता चला कि फंड को सही वक्त पर जारी नहीं किया जा रहा, परिवाहन खर्चे में अनियमितता बरती जा रही है, कार्यक्रम को लागू करने लायक बुनियादी ढांचे का अभाव है और जारी किए गये अनाज की मात्रा में लक्ष्य तक पहुंचने से पहले हेराफेरी होती है।
  • मंत्रालय अब भी इस बात की कोई कारगर व्यवस्था नहीं कर सका कि मीड डे मील के काम से शिक्षकों की शैक्षिक गतिविधि में कोई बाधा नहीं पहुंचे। ऐसे कई उदाहरण मिले जिससे जाहिर होता है कि शिक्षक पढ़ाने का ढेर सारा वक्त मिड डे मील के अन्तर्गत परोसे जाने वाले भोजन की बंदोबस्ती और देखरेख में लगा देते हैं।

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[inside]द परफार्मेंस ऑडिट ऑन नेशनल प्रोग्राम फॉर न्यूट्रीशनल सपोर्ट टू प्राइमरी एजुकेशन(मीड डे मील स्कीम)-रिपोर्ट संख्या-पीए १३(२००८)[/inside]
http://cag.gov.in/html/reports/civil/2008_PA13_MDMscivil/highlights.pdf में कहा गया है-

  • मिड डे मील योजना को चलते हुए एक दशक से ज्यादा का समय हो गया लेकिन इस योजना से किन लक्ष्यों को साधा जाना है इसके बारे में अब भी अस्पष्टता की स्थिति बनी हुई है। साल २००६ के सितंबर में नीति के स्तर पर एक गुणात्मक बदलाव आया(पहले जोर नामांकन बढ़ाने, शिक्षण का स्तर सुधारने और उपस्थिति बढ़ाने पर था) और जोर पोषण तथा स्वास्थ्य के पहलू पर दिया जाने लगा।
  • मंत्रालय ने इस बात की जांच नहीं की है कि इस योजना से छात्रों के नामांकन और उपस्थिति में कितना इजाफा हुआ है। अंकेक्षण (ऑडिट) के लिए जो आंकड़े इक्कठे किए गए उनके विश्लेषण से इस बात का पक्का पता नहीं चलता कि छात्रों की उपस्थिति या नामांकन में तुलनात्मक रुप से कुछ सुधार हुआ है