शिक्षा

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 स्वयंसेवी संस्था प्रथम द्वारा प्रस्तुत एनुअल स्टेटस् ऑव एजुकेशन रिपोर्ट 2010(असर) के अनुसार-

 
 
 
·       नामांकन- सर्वेक्षण के अनुसार देश के:ग्रामीण इलाके में 6-14 साल की उम्र के 96.5 फीसदी बच्चों का नामांकन स्कूल में है।इनमें से कुल 71.1% बच्चे सरकारी स्कूलों में नामांकित हैं जबकि, 24.3 % फीसदी बच्चों ने प्राइवेट स्कूलों में दाखिला लिया है।

·       स्कूल वंचित लडकियां--  11-14 आयुवर्ग की कुल 5.9% लड़कियां भी स्कूल-वंचित हैं। बहरहाल साल 2009 में स्कूल वंचित लड़कियों की तादाद 6.8 फीसदी थी यानि सर्वेक्षण के अनुसार स्कूल वंचित बच्चियों की तादाद में कमी आई है।

·       राजस्थान(12.1%) और यूपी (9.7%) जैसे राज्यों में स्कूल वंचित बच्चियों की संख्या अब भी ज्यादा है और साल 2009 की तुलना में इसमें कुछ खास कमी नहीं आई है। इस सिलसिले में बिहार का जिक्र जरुरी है। बिहार में साल 2005 के बाद से स्कूल वंचित लड़के और लड़कियों की तादाद में उल्लेखनीय कमी आई है। साल 2006 में बिहार में 11-14 आयुवर्ग के स्कूल वंचित लड़कों की तादाद 12.3 फीसदी और लड़कियों की तादाद 17.7 फीसदी थी जो साल 2010 में घटकर क्रमश 4.4% और 4.6% फीसदी हो गई है।

·       प्राईवेट स्कूलों में दाखिले में बढोतरी- ग्रामीण भारत में प्राईवेट स्कूलों में दाखिले का चलन बढ़ा है। साल 2009 में देश के ग्रामीण इलाके में कुल 21.8% फीसदी बच्चे प्राईवेट स्कूलों में दाखिल थे तो साल 2010 में उनकी तादाद बढ़कर 24.3% फीसदी हो गई है। इस आंकड़े में साल 2005(असर की प्रथम रिपोर्ट) से ही इजाफा हो रहा है। 2005 में देश के गंवई इलाके में प्राईवेट स्कूलों में दाखिल बच्चों की तादाद 16.3% फीसदी थी।

·       साल 2009 से 2010 के बीच दक्षिण के राज्यों में गंवई इलाके में प्राईवेट स्कूलों में दाखिले का चलन उल्लेखनीय गति से बढ़ा है। आंध्रप्रदेश में प्राईवेट स्कूल में दाखिल बच्चों की तादाद एक साल के अंदर 29.7% फीसदी से बढ़कर to 36.1% फीसदी हो गई है। तमिलनाडु में प्राईवेट स्कूलों में दाखिल बच्चों की तादाद 19.7% फीसदी से बढ़कर 25.1% फीसदी, कर्नाटक में 16.8% फीसदी से बढ़कर 20% फीसदी और केरल में  51.5% फीसदी से बढ़कर 54.2% फीसदी हो गई है।

·       प्राईवेट स्कूल में बच्चों के दाखिले के मामले में अन्य राज्यों में पंजाब कहीं आगे है। वहां यह तादाद साल भर के अंदर 30.5% फीसदी से बढ़कर 38% फीसदी तक पहुंच गई है। बहरहाल बिहार में यह अनुपात (5.2%) फीसदी, पश्चिम बंगाल में (5.9%), झारखंड में (8.8%) ओड़ीसा में (5.4%) और त्रिपुरा में (2.8%) है।

·       पाँच साल की उम्र के बच्चों के स्कूल-नामांकन की तादाद बढ़ी- राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो साल 2009 में स्कूलों में दाखिला ले चुके पाँच साल की उम्र के बच्चों की तादाद 54.6% फीसदी थी जो साल 2010 में बढ़कर 62.8% फीसदी हो गई। कर्नाटक में यह बढ़ोतरी खास तौर पर देखने में आई।यहां साल 2009 में पाँच साल की उम्र के 17.1% फीसदी बच्चे स्कूलों में दाखिल थे। साल 2010 में इनकी तादाद बढ़कर 67.6 फीसदी हो गई।

·       पाँच साल की उम्र के बच्चों के स्कूली नामांकन में अन्य राज्यों में भी तादाद बढ़ी है। पंजाब में यह तादाद साल भर के अंदर बढ़कर 68.3% से  79.6% फीसदी, हरियाणा में (62.8% से 76.8%), राजस्थान में (69.9% से75.8%), यूपी में (55.7% से 73.1%) और असम में 49.1% से बढ़कर 59% फीसदी हो गई है।

·       कुछ राज्यों को छोड़कर पढ़ पाने की क्षमता के मामले में खास बढ़त दर्ज नहीं हुई--: स्कूली शिक्षा के पाँच साल के बाद भी स्कूलों में दाखिल तकरीबन आधे बच्चे पढ़ पाने की क्षमता के मामले में दूसरी कक्षा के विद्यार्थी से अपेक्षित योग्यता तक भी नहीं पहुंच पाये हैं।कक्षा पाँच में दाखिल केवल 53.4% फीसदी बच्चे ही कक्षा दो के बच्चे से अपेक्षित पाठ को पढ़ पाने में सक्षम हैं।

·       गणित कर पाने की क्षमता में फिसड्डीपन--: औसतन कहा जा सकता है कि सरल गणित करने की क्षमता के मामले में बच्चों में फिसड्डीपन बढ़ा है। कक्षा-1 के कुल 69.3% फीसदी बच्चे साल 2009 में 1-9 तक की संख्या पहचान पाने में सक्षम थे लेकिन साल 2010 में ऐसे बच्चों की तादाद घटकर 65.8% फीसदी हो गई। ठीक इसी तरह कक्षा तीन के कुल 39% फीसदी छात्र साल 2009 में दो अंकों के घटाव का गणित कर पाने में सक्षम पाये गये जबकि साल 2010 में ऐसे बच्चों की तादाद घटकर 36.5 फीसदी हो गई। भाग करने की गणितीय क्षमता से लैस क्लास पाँच के बच्चों की तादाद साल 2009 में 38% फीसदी थी जो साल 2010 में घटकर 35.9% फीसदी हो गई।

·       रोजमर्रा के हिसाब के मामले में मिडिल स्कूल के छात्र कमजोर हैं— साल 2010 में असर सर्वेक्षण के दौरान मिडिल स्कूल के बच्चों से रोजमर्रा के हिसाब वाले सवाल मसलन मेन्यूकार्ड से जुड़े प्रश्न, कैलेंडर पढ़ने के बारे में और खेत या जमीन का क्षेत्रफल या फिर किसी चीज का आयतन बचाने के सवाल पूछे गए। आठवीं क्लास के तकरीबन तीन चौथाई बच्चों ने मेन्यूकार्ड से संबंधित सवाल हल कर दिये, दो तिहाई छात्र कलैंडर पर आधारित सवाल के सही जवाब दे पाये जबकि सिर्फ 50 फीसदी छात्र ही क्षेत्रफल-आयतन से जुड़े सवालों को हल कर पाये।क्षेत्रफल के सवालों को हल कर पाना छात्रों के लिए कहीं ज्यादा कठिन साबित हुआ जबकि ऐसे सवाल चौथी क्लास की पाठ्यपुस्तक से ही शुरु हो जाते हैं। केरल(79% ) और बिहार(69%) के आठवीं क्लास के छात्र क्षेत्रफल पर आधारित सवालों को हल करने में बाकी राज्यों से कहीं आगे थे।

·       प्राईवेट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों में ट्यूशन का चलन पिछले साल के मुकाबले कम हुआ है--  प्राईवेट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों में आठवीं क्लास तक के बच्चों के बीच ट्यूशन का चलन एक साल के अंदर साफ-साफ कम होता नजर आ रहा है। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों में ट्यूशन लेने का चलन कम नहीं हुआ है हालांकि बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडीसा जैसे राज्यों में जहां प्राईवेट स्कूलों में दाखिल बच्चों की संख्या कम है, पांचवीं क्लास में पढ़ रहे बच्चों में ट्यूशन लेने वाले बच्चों की संख्या ज्यादा( पश्चिम बंगाल-75.6%, बिहार -55.5% और ओडीसा -49.9%) है।

·       शिक्षा के अधिकार का अनुपालन – असर 2010 के सर्वेक्षण में कुल 13000 स्कूलों को शामिल किया गया। इसमें 60 फीसदी स्कूल इमारत के मामले में शिक्षा के अधिकार के मानकों के अनुरुप पाये गये। बहरहाल इन स्कूलों में से आधे से अधिक में शिक्षकों की तादाद बढ़ानी होगी।एक तिहाई स्कूलों में क्लासरुम की संख्या बढ़ानी होगी। सर्वेक्षण में शामिल कुल 13 हजार स्कूलों में से 62% में खेलकूद के लिए मैदान था, 50 फीसदी में चहारदीवारी थी और कुल 90 फीसदी स्कूलों में शौचालय मौजूद थे। बहरहाल शौचालय की सुविधायुक्त स्कूलों में केवल आधे ऐसे हैं जहां शौचालय इस्तेमाल करने लायक दशा में है। सर्वेक्षण में शामिल शौचालययुक्त स्कूलों में से 70% में लड़कियों के लिए अलग से इसकी सुविधा है लेकिन इस्तेमाल करने लायक दशा में शौचालय केवल 37 फीसदी स्कूलों में पाये गए।  81% स्कूलों में रसोईघर बने थे और 72 फीसदी स्कूलों में पेयजल की सुविधा थी।

·       प्राइमरी स्कूलों में सभी शिक्षकों की मौजूदगी के मामले में राष्ट्रीय स्तर पर गिरावट के रुझान हैं। सर्वेक्षण के दिन सभी शिक्षकों की मौजूदगी वाले प्राइमरी स्कूलों की तादाद साल 2007 में 73.7%, साल 2009 में 69.2% और साल 2010 में 63.4% पायी गई।

·        समग्र ग्रामीण भारत में साल 2007 से 2010 के बीच स्कूलों में छात्रों की उपस्थिति के मामले में कोई खास बदलाव देखने में नहीं आया। इस अवधि में स्कूलों में छात्रों की मौजूदगी तकरीबन 73% फीसदी पर स्थिर रही। हां, राज्यवार इसमें खास अन्तर जरुर है।
 

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