शिक्षा

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 स्वयंसेवी संस्था प्रथम द्वारा प्रस्तुत द एनुअल स्टेटस् ऑव एजुकेशन रिपोर्ट २००९ के अनुसार-

http://www.asercentre.org/asersurvey/aser09/pdfdata/nation
al%20highlights.pdf



११-१४ आयु वर्ग की लड़कियों में स्कूल वंचितों की कमी
• साल २००८ में ६-१४ आयु वर्ग के स्कूल वंचित बच्चों की तादाद ४.३ फीसदी थी जो साल २००९ में घटकर ४ फीसदी हो गई।
• साल २००८ में ११-१४ आयु वर्ग की बच्चियों में स्कूल वंचितों की संख्या ७.२ फीसदी थी जो साल २००९ में घटकर ६.८ फीसदी हो गई। प्रतिशत पैमाने पर यह कमी सबसे ज्यादा छत्तीसगढ़  (3.8) , बिहार  (2.8), राजस्थान (2.6), ओडिसा (2.1), जम्मू-कश्मीर  (1.9) में नजर आई। मेघालय को छोड़कर पूर्वोत्तर के बाकी राज्यों में भी यही रुझान रहा। .
• आंध्रप्रदेश में साल २००८ में ११-१४ आयु वर्ग की बच्चियों में स्कूल वंचितों की संख्या ६.६ फीसदी थी जो साल २००९ में बढ़कर १०.८ फीसदी हो गई। पंजाब में यह आंकड़ा ४.९ फीसदी से बढ़कर ६.३ फीसदी पर पहुंचा।

प्राइवेट स्कूलों में नामांकन के मामले में रुझान में ज्यादा बदलाव नहीं
• कुल मिलाकर देखें तो ६-१४ आयु वर्ग के बच्चो के प्राइवेट स्कूलों में नामांकन के मामले में साल २००९ के मुकाबले साल २००९ में महज नामालूम (0.8 प्रतिशत अंक) सी कमी आई। बहरहाल, छह राज्यों में इस मामले में प्रतिशत पैमाने पर पांच अंकों की कमी आई है। पंजाब में इस आयु वर्ग के बच्चों का प्राइवेट स्कूल में नामांकन प्रतिशत पैमाने पर सर्वाधिक है और वहां इस मामले में कुल 11.3 अंकों की कमी दर्ज की गई।

देश में पांच साल के आयु वर्ग के कुल बच्चों में ५० फीसदी स्कूलों में नामांकित हैं
• साल २००९ में ५ साल की उम्र वाले ५० फीसदी बच्चे स्कूलों में नामांकित थे। साल २००८ में भी यही स्थिति थी।
• आंगनवाड़ी या बालवाड़ी जैसे प्रीस्कूल स्तर पर देखें तो ३-४ साल के आयु वर्ग के बच्चों के मामले में स्थिति पिछले साल की ही तरह है।  खासकर बिहार, ओडिसा, छत्तीसगढ़ और गुजरात में इस आयु वर्ग के बच्चों का दाखिला प्रीस्कूल स्तर की संस्थाओं में प्रतिशत पैमाने पर पांच अंक बढ़ा है।

कक्षा-१ के स्तर पर सीखने की क्षमता में सुधार आया
• बच्चे की बोध क्षमता की बुनियादी शुरुआती कक्षाओं में पड़ती है। कुल मिलाकर देखें तो जहां साल २००८ में कक्षा-१ के स्तर पर कुल ६५.१ फीसदी बच्चे वर्णमाला के अक्षरों को पहचान पाते थे वहीं साल २००९ में ऐसे बच्चों की तादाद ६८.८ फीसदी हो गई। ठीक इसी तरह संख्याओं को पहचानने के मामले में एक साल के अंदर यह आंकड़ा ६५.३ फीसदी से बढ़कर ६९.३ फीसदी तक जा पहुंचा है।
•  संख्या १-९ तक की पहचान या वर्णमाला के अक्षरों की पहचान के मामले में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, झारखंड और ओड़िसा में कक्षा-१ के स्तर पर बच्चों की बोध क्षमता के लिहाज से पिछले साल के मुकाबले प्रतिशत पैमाने पर १० अंकों की बढ़त दर्ज की गई है। तमिलनाडु और गोवा में पाठवाचन क्षमता और गणितीय योग्यता के मामले में उक्त स्तर पर पांच अंकों की बढत दर्ज की गई है। यही रुझान उत्तराखंड,महाराष्ट्र और करनाटक में भी नजर आई ।

कक्षा-५ के स्तर पर बोध क्षमता में तमिलनाडु (पाठ वाचन क्षमता) को छोड़कर कोई खास बदलाव नहीं

• ग्रामीण बच्चों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि साल २००८ में जहां कक्षा- ५ के ५६.२ फीसदी छात्र कक्षा-२ के लिए मानक रुप में तैयार की गई पुस्तक को पढ़-समझ लेते थे वहीं साल २००९ में ऐसे बच्चों की तादाद घटकर ५२.८ फीसदी हो गई। इसके मायने हुए कि कम से पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाले कम से कम ४० फीसदी बच्चे बोध के लिहाज से ३ कक्षा पीछे चल रहे हैं।
• तमिलनाडु में, सरकारी स्कूलों की पांचवीं कक्षा में पढ़ने बच्चों के मामले में यह तथ्य प्रकाश में आया कि उनके पाठन वाचन की क्षमता में पिछले साल के मुकाबले प्रतिशत पैमाने पर ८ अंकों का इजाफा हुआ है। कर्नाटक और पंजाब में भी साल २००८ के मुकाबले इस मामले में प्रगति नजर आई मगर बाकी राज्यों में मामला कमोबेश पिछले साल वाला ही रहा।
• जहां तक गणितीय योग्यता का सवाल है, देशव्यापी स्तर पर देखें तो कक्षा पांच में पढ़ने वाले विद्यार्थियों में घटाव करने की क्षमता में खास बढोत्तरी नहीं हुई है।इस मामले में कुल सात राज्यों में प्रतिशत पैमाने पर ५-८ फीसदी बढत (विद्यार्थियों की संख्या के मामले में) नजर आई। इन राज्यों के नाम हैं- हिमाचल प्रदेश, पंजाब, असम, पश्चिम बंगाल, ओडिसा, आंध्रप्रदेश और कर्नाटक।

देशस्तर पर अंग्रेजी पढ़ सकने और उसे समझ पाने के की क्षमता के मामले में पर्याप्त विभिन्नता है।

• अखिल भारतीय आंकड़े संकेत करते हैं कि कक्षा -५ में पढ़ रहे ग्रामीण विद्यार्थियों में २५ फीसदी की तादाद अंग्रेजी में लिखे सरल वाक्य पढ़ लेते हैं। अंग्रेजी के सरल वाक्यों को बच्चों की जो तादाद पढ़ लेती है उसमें ८० फीसदी बच्चे उक्त वाक्य का अर्थ भी समझते हैं।
• कक्षा -८ के स्तर पर पढ़ने वाले कुल बच्चों में ६०.२ फीसदी बच्चे अंग्रेजी के सरल वाक्य पढ़ पाते हैं। त्रिपुरा के छोड़कर सभी उत्तर पूर्वी राज्यों, गोवा, हिमाचल प्रदेश और केरल में कक्षा- ८ में पढ़ रहे कुल विद्यार्थियों में ८० फीसदी की तादाद ना सिर्फ अंग्रेजी में लिखे वाक्य धड़ल्ले से पढ़ लेती है बल्कि उसके मायने भी समझती है।

हर कक्षा के ट्यूशन पढ़ने वाले बच्चों की तादाद में इजाफा
• राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो साल २००७ से २००८ के बीच ट्यूशन फड़ने वाले बच्चों की तादाद बढ़ी है और ऐसा हर कक्षा के विद्यार्थी के साथ देखने में आया। यह तथ्य सरकारी और निजी दोनों तरह के स्कूल के बच्चों पर लागू होती है। सिर्फ कर्नाटक और केरल में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के मामले में ट्यूशन पढ़ने के इस चलन में किंचित गिरावट देखने में आई।
• जहां तक सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का सवाल है, ट्यूशन पढ़ने का रुझान कक्षाओं की बढ़ती के साथ बढ़ोतरी करता नजर आया। पहली की कक्षा के १७.१ फीसदी छात्र ट्यूशन पढ़ते पाये गए तो आठवीं कक्षा के ३०.८ फीसदी छात्र।
•जो बच्चे प्राइवेट स्कूलों में जाते हैं उनमें पहली कक्षा में पढ़ने वाले कम से कम २३.३ फीसदी छात्र ट्यूशन पढ़ते पाये गए जबकि कक्षा- ४ के मामले में यही आंकड़ा बढ़कर २९.८ फीसदी तक पहुंचता है। .
• ट्यूशन पढ़ने की सर्वाधिक प्रवृति पश्चिम बंगाल के छात्रों में नजर आई। यहां सरकारी स्कूल की पहली कक्षा में पढ़ रहे ५० फीसदी बच्चे ट्यूशन पढ़ते हैं और यही तादाद कक्षा ८ तक जाते-जाते ९० फीसदी तक पहुंच जाती है। बिहार और ओड़िसा में भी ट्यूशन पढने वाले बच्चों की तादाद बहुत ज्यादा ( कक्षा-१ में एक तिहाई तो कक्षा -८ में ५० फीसदी) है।

कुछ राज्यों में बच्चों की स्कूल-उपस्थिति में सुधार की जरुरत
• तीन सालों (2005, 2007 और 2009) के आंक़ड़ों की तुलना से संकेत मिलते हैं कि विभिन्न राज्यों में स्कूल उपस्थिति के मामले में पर्याप्त अंतर है।बिहार जैसे राज्यों में हमारी टीम ने अपने दौरे के दौरान पाया कि जिन बच्चों ने स्कूल में दाखिला लिया है उनमें सिर्फ ६० फीसदी ही स्कूल आये हैं जबकि दक्षिण के राज्यों में में बच्चों की स्कूल उपस्थिति का आंकड़ा ९० फीसदी का था। इसके अतिरिक्त राजस्थान, उत्तरप्रदेश, झारखंड, ओडिसा और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में बच्चों की स्कूल उपस्थिति को बढ़ाने की दिशा में प्रयास किये जाने की जरुरत है। अधिकांश राज्यों में हमारी पर्यवेक्षक टीम ने पाया कि दौरे के दिन कुल नियुक्त शिक्षकों में से ९० फीसदी स्कूल में उपस्थित थे।

दो या अधिक कक्षा के विद्यार्थियों का पढ़ाई के लिए एक साथ बैठने का रुझान व्यापक  
• साल २००७ और २००९ के सर्वेक्षण के दौरान पर्येवक्षकों से कहा गया कि अगर कक्षा-२ और ४ के विद्यार्थियों को एक साथ करके किसी अन्य कक्षा के साथ बैठाकर पढाया जाता हो तो वे इस बात की अपने सर्वेक्षण में निशानदेही करें।दोनों ही सालों में यह घटना व्यापक स्तर पर पायी गई। अखिल भारतीय स्तर पर देखें तो कक्षा-२ और ४ के ५० फीसद विद्यार्थियों को एक साथ करके किसी अन्य कक्षा के साथ बैठाकर पढाने की घटना सामने आई।

शौचालयों की संख्या में बढ़ोतरी और पेयजल की सुविधाओं में सुधार
• अखिल भारतीय स्तर के आंकड़ों का संकेत है कि शौचालय और पेयजल की व्यवस्था से हीन विद्यालयों के चलन में कमी आई है। ७५ फीसदी सरकारी प्राथमिक विद्यालयों और अपर प्राइमरी कहे जाने वाले ८१ फीसदी विद्यालयों में पेयजल की सुविधा उपलब्ध है। सरकारी विद्यालयों में हर १० विद्यालय में ४ विद्यालय ऐसे थे जहां लड़कियों के लिए अलग से शौचालय की व्यवस्था नहीं थी। अपर प्राइमरी स्कूल के मामले में यह संख्या २६ फीसदी तक है। लगभग १२-१५ फीसदी शौचालय(लड़कियों के लिए) बंद पाये गए जबकि ३०-४० फीसदी ऐसी अवस्था में थे कि उनका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता था।

पिछले वित्तीय वर्ष (स्कूलों के लिए लागू) में बहुत से विद्यालयों को अनुदान नहीं मिला-
• अनुदान के मामले में स्कूलों में राज्यवार पर्याप्त अंतर देखने में आया। नगालैंड में हमारी टीम जितने स्कूलों पर पर्येवक्षण के लिए गई उनमें ९० फीसदी को अनुदान हासिल हुआ था जबकि झारखंड ओड़िसा और मध्यप्रदेश में ऐसे विद्यालयों की तादाद (साल 2008-2009) ६० फीसदी या उससे भी कम थी ।
 
भारत में शिक्षा-एक नजर

    * युवा (१५–२४ साल) साक्षरता दर २०००-२००७*,  पुरुष ८७
    * युवा (१५–२४ साल) साक्षरता दर, २०००-२००७*, महिला ७७
    * प्रति सौ व्यक्तियों पर फोन, (साल २००६) -१५
    * प्रति सौ व्यक्तियों पर इंटरनेट-यूजर की संख्या, साल(२००६)-११
    * प्राइमरी स्कूल में नामांकन का अनुपात (साल २०००-२००७)-सकल, पुरुष ९०
    * प्राइमरी स्कूल में नामांकन का अनुपात (साल २०००-२००७)-सकल, स्त्री ८७
    * प्राथमिक विद्यालय में उपस्थिति का अनुपात (२०००-२००७)-निवल, पुरुष, ८५
    * प्राथमिक विद्यालय में उपस्थिति का अनुपात (२०००-२००७)-निवल, स्त्री ८१
    * माध्यमिक विद्यालय में नामांकन- अनुपात, २०००-२००७, पुरूष ५९
    * माध्यमिक विद्यालय में नामांकन- अनुपात, २०००-२००७, स्त्री ४९
    * माध्यमिक विद्यालय में उपस्थिति का अनुपात (२०००-२००७)-निवल, पुरुष ५९
    * माध्यमिक विद्यालय में उपस्थिति का अनुपात (२०००-२००७)-निवल, स्त्री ४९
    * नोट: नामांकन अनुपात का अर्थ होता है कि किसी विशिष्ट शिक्षा स्तर पर दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या कितनी है। इसमें दाखिला लेने वाले विद्यार्थी की उम्र का आकलन नहीं किया जाता।
 

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