शिक्षा

शिक्षा

What's Inside

स्वयंसेवी संस्था असर(एएसईआर) द्वारा प्रस्तुत एनुअल स्टेटस् ऑव एजुकेशन रिपोर्ट २००८ के अनुसार-
http://asercentre.org/asersurvey/aser08/pdfdata/aser08nati
onal.pdf

  • स्कूल वंचित बच्चों की तादाद में कमी आ रही है और इस दिशा में बिहार ने अच्छी प्रगति की है.राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो ७-१० साल के आयु वर्ग के बच्चों में स्कूल-वंचितों की संख्या २.७ फीसदी है जबकि ११-१४ आयु वर्ग में ६.३ फीसदी बच्चे स्कूल वंचित हैं।
  • साल २००७ और २००८ के बीच ११-१४ साल के आयु वर्ग की लड़कियों में स्कूल वंचितों की तादाद में कोई खास बदलाव नहीं आया और इस आयु वर्ग की लड़कियों की ७.३ फीसदी संख्या २००८ में स्कूल वंचित है।
  • साल २००७ के बाद से अधिकतर राज्यों में स्कूल वंचित बच्चों की संख्या में कमी आयी है। यूपी और राजस्थान इसके अपवाद हैं। .
  • बिहार में स्कूल वंचित बच्चों(६-१४ साल) की संख्या में चार सालों(२००५-२००८) में कमी आयी है। चार साल पहले ऐसे बच्चों की तादाद १३.१ फीसदी थी जो घटकर ५.७ फीसदी हो गई है। इस अवधि में स्कूल वंचित लड़कियों(११-१४ साल) की संख्या २०.१ फीसदी से घटकर ८.८ फीसदी हो गई है।


प्राइवेट स्कूलों में दाखिला बढ़ रहा है

  • साल २००५ में प्राइवेट स्कूलों में जाने वाले बच्चों की तादाद राष्ट्रीय स्तर पर १६.४ फीसदी थी जो साल २००८ में बढ़कर २२.५ फीसदी हो गई। अगर साल २००५ को आधार मानें तो प्राइवेट स्कूलों में नाम लिखवाने की घटना में ३७.२ फीसदी का इजाफा हुआ। कर्नाटक, उत्तरप्रदेश और राजस्थान में यह बात खास रुप से नोट की जा सकती है।
  • साल २००८ में प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले लड़कों की तुलना में लड़कियों की तादाद २० फीसदी कम थी। यह बात ७-१० और ११-१४ यानी दोनों ही आयु वर्ग पर लागू होती है।
  • केरल और गोवा में स्कूल जाने वाले बच्चों की कुल संख्या का ५० फीसदी प्राइवेट स्कूलों में शिक्षा हासिल कर रहा है। डिस्ट्रिक्ट इन्फॉरमेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन की सूचना के मुताबिक इन राज्यों में ७० फीसदी प्राइवेट स्कूलों को सरकारी अनुदान मिलता है।
  • नगालैंड, पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश और राजस्थान में ३२ से ४२ फीसदी बच्चे प्राइवेट स्कूलों में जाते हैं। डिस्ट्रिक्ट इन्फॉरमेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन की सूचना से पता चलता है कि इन राज्यो में अधिकतर प्राइवेट स्कूलों को सरकारी अनुदान नहीं मिलता।
  • मध्यप्रदेश और छ्तीसगढ़ में स्कूली बच्चों में पाठ-वाचन की क्षमता में खास प्रगति हुई है।
  • छ्त्तीसगढ़ में स्कूली बच्चों में पाठ वाचन की क्षमता में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है। साल २००७ में यहां तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले महज ३१ फीसदी छात्र पहली कक्षा की पुस्तक पढ़ पाते थे लेकिन २००८ में ऐसे विद्यार्थियों की संख्या ७० फीसदी हो गई।साल २००७ में पांचवीं क्लास के ५८ फीसदी विद्यार्थी दूसरी क्लास की किताबों की भाषा को पढ-समझ पाते थे जबकि साल २००८ में ऐसे विद्यार्थियों की संख्या ७५ फीसदी हो गई।
  • मध्यप्रदेश में साल २००६ और २००७ की तुलना में २००८ में बच्चों के पाठ-बोध की क्षमता में अच्छी बढ़त हुई है। यहां सरकारी स्कूलों की पांचवीं क्लास में पढ़ने वाले ८६ फीसदी बच्चे कक्षा-२  की किताबों की भाषा पढ़-समझ लेते हैं । इस मामले में मध्यप्रदेश असर के मूल्यांकन के लिहाज से बाकी राज्यों से बेहतर है। मिसाल के लिए केरल और हिमाचल प्रदेश में सरकारी स्कूलों की पांचवीं जमात में पढ़ रहे महज ७३-७४ फीसदी बच्चों की भाषाई क्षमता ऐसी थी कि वे कक्षा-२ की पुस्तकों को पढ़-समझ सकें।
  • मध्यप्रदेश, केरल, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और हिमाचल प्रदेश के स्कूली बच्चों की भाषायी क्षमता बाकी राज्यों के स्कूलों बच्चों की तुलना में बेहतर है। इन राज्यों में पहली कक्षा में पढ़ रहे लगभग ८५ फीसदी बच्चे वर्णों को पहचान लेते हैं और कक्षा-२ की किताबें पढ़-समझ लेने वाले बच्चों (पांचवीं क्लास में पढ़ने वाले) की संख्या भी ७५ फीसदी से ज्यादा है।
  • मध्यप्रदेश ने इस दिशा में तेज गति से प्रगति दो चरणों में की । मध्यप्रदेश को पहली बढ़त साल २००६ में हासिल हुई और दूसरी साल २००८ में।
  • कर्नाटक और उड़ीसा में दूसरी से चौथी जमात तक के छात्रों की पाठ-वाचन की क्षमता में लगातार बेहतरी हुई है। जांच-परीक्षा के परिणामों से पता चलता है कि इन राज्यों में छात्रों की पाठ-वाचन क्षमता में पांच से छह फीसदी का इजाफा हुआ है।


छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में छात्रों की गणितीय क्षमता में भी बढ़ोतरी हुई है-

  • असर की जांच परीक्षा से पता चलता है कि मध्यप्रदेश और छ्त्तीसगढ़ में पिछले एक साल में छात्रों की गणित की योग्यता में बेहतरी प्रगति हुई है। दोनों ही राज्यों में पहली कक्षा के ९१ फीसदी से ज्यादा विद्यार्थी एक से नौ तक के अंकों को पहचान पाने में सफल रहे। हालांकि केरल में ऐसे बच्चों की तादाद ९६ फीसदी है लेकिन साक्षरता के मामले में देश में सबसे आगे रहने वाले यह राज्य तीसरी जमात के बच्चों की गणितीय योग्यता के मामले में मध्यप्रदेश और छ्तीसगढ़ से पीछे है।
  • साल २००७ में मध्यप्रदेश में तीसरी जमात के ६१.३ फीसदी बच्चे घटाव के सरल प्रश्न हल कर लेते थे जबकि २००८ में ऐसे बच्चों की तादाद बढ़कर ७२.२ फीसदी हो गई। केरल में ऐसे बच्चों की तादाद ६१.४ थी।
  • साल २००८ में मध्यप्रदेश में पांचवी कक्षा के ७८.२ फीसदी बच्चे किसी संख्या में किसी संख्या से ठीक-ठीक भाग देने में सक्षम थे। यह आंकड़ा पूरे देश के हिसाब से सबसे ज्यादा है। कई अन्य राज्यों में यह आंकड़ा ६० फीसदी का है। मिसाल के लिए हिमाचलप्रदेश, छत्तीसगढ़ , मणिपुर और गोवा का नाम लिया जा सकता है। .
  • छत्तीसगढ़ में भी बच्चों की गणित करने की क्षमता में बेहतर प्रगति हुई है। साल २००८ में यहां कक्षा-२ के ७७ फीसदी बच्चे एक से सौ तक के अंकों को पहचानने में सफल रहे। साल २००७ में कक्षा-२ के छात्रों के लिए यही आंकड़ा ३७ फीसदी का था। ठीक इसी तरह साल २००७ में यहां कक्षा-३ के २१ फीसदी बच्चे घटाव के प्रश्नों को ठीक ठीक हल कर पाते थे जबकि साल २००८ में ६३ फीसदी बच्चे यह गणित करने में सफल रहे।
  • समय का हिसाब
  • देश में कक्षा पांच में पढ़ने वाले ६१ फीसदी बच्चे घड़ी में देखकर ठीक-ठीक समय बता सकते हैं।
  • यूपी, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश और गुजरात में कक्षा-५ के महज ५० फीसदी छात्र घड़ी में देखकर ठीक-ठीक समय बता पाये। बिहार, झारखंड, उड़ीसा, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, पंजाब और उत्तराखंड जैसे राज्यों में यह आंकड़ा  राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है।
  • मध्यप्रदेश, केरल, छ्त्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में छात्रों में गणित और भाषायी योग्यता बाकी राज्यों के छात्रों की तुलना में ज्यादा थी और इन राज्यों में कक्षा-५ के ७५ फीसदी से ज्यादा बच्चों ने घड़ी में देखकर सही समय बताया।
असर के सर्वेक्षण की कुछ और महत्वपूर्ण बातें-

  • ९२ फीसदी ग्रामीण बस्तयों के एक किलोमीटर के दायरे में प्राइमरी स्कूल मौजूद है। ६७ फीसदी गांवों में सरकारी मिडिल स्कूल है और ३३.८ फीसदी गांवों में सरकारी हाईस्कूल मौजूद हैं। देश के ४५ फीसदी गांवों में प्राइवेट स्कूल भी हैं। .
  • देश के ५८ फीसदी गांवों में एसटीडी बूथ हैं जबकि ४८ फीसदी ग्रामीण परिवारों के पास कोई सेलफोन या लैंडलाइन कनेक्शन है। 
  • सर्वेक्षण में जिन घरों का मुआयना किया गया उसमें ६५ फीसदी घरों में बिजली का कनेक्शन लगा था।
  • देश के ७१ फीसदी गांवों का पक्की सड़क के सहारे बाहरी इलाके से संपर्क है। इस मामले में पीछे रहने वाले राज्यों के नाम हैं-असम (यहां महज ३२ फीसदी गांव पक्की सड़क से जुड़े हैं), पश्चिम बंगाल (५३ फीसदी) और मध्यप्रदेश (५८ फीसदी) ।

Rural Experts

Related Articles

 

Write Comments

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Video Archives

Archives

share on Facebook
Twitter
RSS
Feedback
Read Later