शिक्षा

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एनुअल स्टेटस् ऑव एजुकेशन रिपोर्ट(ASER) 2011 के मुख्य तथ्य http://pratham.org/images/Aser-2011-report.pdf,

 

भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में नामांकनों की संख्या में तेज बढ़त

 

·         ग्रामीण भारत में 6-14 साल की उम्र के 96.7% बच्चे स्कूलों में नामांकित हैं। साल 2010 से इस संख्या में खूब तेज बढ़त हुई है।

 

·         साल 2006 में जिन राज्यों में 11-14 साल की उम्र की स्कूल-वंचित लड़कियों की संख्या ज्यादा(10 फीसदी से अधिक) थी, उन राज्यों ने लड़कियों के स्कूली दाखिले के मामले में अच्छी प्रगति की है। मिसाल के लिए बिहार में साल 2006 में स्कूल वंचितों की तादाद 17.6% थी जो साल 2011 में घटकर 4.3% रह गयी। राजस्थान में साल 2006 में यह संख्या 18.9% थी जो साल 2011 में घटकर 8.9% पर आ गई है। ठीक ऐसे ही यूपी के मामले में यह संख्या साल 2006 में 11.1% थी जो 2011 में घटकर 9.7% रह गई है।

 

·         पाँच साल की उम्र वाले बच्चों की बड़ी संख्या फिलहाल स्कूलों में नामांकित है। पाँच साल की उम्र के स्कूल-दाखिल बच्चों की संख्या अखिल भारतीय स्तर पर साल 2011 में 57.8% है। राज्यवार इस आंकड़े में बड़ी भिन्नता है। नगालैंड में यह तादाद 87.1% है तो कर्नाटक में 18.8%

 

अधिकतर राज्यों में निजी स्कूलों में दाखिले का चलन बढ़ा है-

 

·         6-14 साल की उम्र वाले बच्चों के मामले में राष्ट्रीय स्तर पर निजी स्कूलों में दाखिले का चलन साल दर साल बढ़ रहा है।साल 2006 में अगर निजी स्कूलों में इस आयुवर्ग के 18.7% बच्चे निजी स्कूलों में नामांकित थे तो साल 2011 में 25.6%। बिहार को छोड़कर बाकी राज्यों में यह रुझान जारी है।

 

·         उत्तराखंड, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, केरल, मणिपुर और मेधालय में गुजरे पाँच सालों में निजी स्कूलों में दाखिले के मामले में प्रतिशत पैमाने पर 10 अंकों की बढ़ोतरी हुई है।

 

·         ASER 2011 के आंकड़ों के अनुसार हरियाणा, उत्तरप्रदेश, नगालैंड, मेघालय, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, राजस्थान, उत्तराखंड,महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश के ग्रामीण इलाकों में 30-50 फीसद बच्चे निजी श्रेणी के स्कूलों में नामांकित हैं।

 

पठन की बुनियादी क्षमता के मामले में कई राज्यों में कमी के रुझान हैं-

 

·         राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो उत्तर भारत के कई राज्यों में पठन की योग्यता के मामले में गिरावट आई है। अखिल भारतीय स्तर पर देखें तो साल 2010 में ऐसे बच्चों की तादाद 53.7% थी जो Std V में थे लेकिन Std 2 की किताबों को बढ़ सकते थे। साल 2011 में ऐसे बच्चों की तादाद घटकर 48.2% हो गई है। दक्षिण भारत के राज्यों में ऐसी गिरावट के रुझान नहीं हैं।

 

·         इस मामले में कुछ राज्यों से अच्छी खबर भी है। गुजरात,पंजाब और तमिलनाडु कक्षा 2 की किताबों को पढ़-समझ सकने की योग्यता रखने वाले कक्षा पाँच में दाखिल विधार्थियों का प्रतिशत 2010 की तुलना में 2011 में बढ़ा है। पूर्वोत्तर के कई राज्यों में इस मामले में सकारात्मक रुझान हैं।कर्नाटक और आंध्रप्रदेश में इस मामले में आंकड़े में कोई तबदीली नहीं आई है।

अधिकतर राज्यों में गणित करने की क्षमता के मामले में गिरावट के रुझान हैं-

 

·          गणित करने की बुनियादी क्षमता की जांच के मामले में ASER 2011 के आकलन कहते हैं कि इसमें गिरावट आई है।  मिसाल के लिए, साल 2010 में कक्षा 3 के 36.3% विद्यार्थी दो अंकों के घटाव का गणित (जिसमें हासिल लेना पड़ता हो) सफलता पूर्वक करते पाये गए जबकि साल 2011 में ऐसे विद्यार्थियों की संख्या घटकर 29.9% पर आ गई है। साल 2010 में इसी स्तर के घटाव का गणित करने वाले कक्षा पाँच के विद्यार्थियों की संख्या राष्ट्रीय स्तर पर 70.9% थी जो साल 2010 में 61.0% पर आ गई है।.

 

·         गणित कर सकने की क्षमता में कमी का यह रुझान सभी राज्यों में देखा जा सकता है। सिर्फ आंध्रप्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु में साल 2010 के मुकाबले 2011 में आंकड़े में इजाफा हुआ है। पूर्वोत्तर के कई राज्यों में इस मामले में सकारात्मक रुझान देखने को मिले जबकि गुजरात में 2010 के मुकाबले 2011 में साधारण गणित कर सकने की क्षमता में कोई बदलाव नहीं आया है।

स्कूलों के सर्वेक्षण के आधार पर उनके बारे में तैयार किए गए कुछ निष्कर्ष-

 

बच्चों की उपस्थिति घटी है-

 

·         अखिल भारतीय स्तर पर साल 2007 में कक्षाओं में बच्चों की उपस्थिति 73.4% थी जो साल 2011 में घटकर 70.9% पर आ गई है( ग्रामीण भारत के प्राथमिक विद्यालयों में)

 

·         कुछ राज्यों में कक्षाओं में बच्चों की उपस्थिति में भारी गिरावट आई है, मिसाल के लिए बिहार में प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों की उपस्थिति साल 2007 में 59.0% थी जो साल 2011 में घटकर 50.0% पर आ गई। मध्यप्रदेश में साल 2007 में यह आंकड़ा 67.0% का था जो साल 2011 में घटकर 54.5% पर आ गया जबकि उत्तरप्रदेश में 64.4% (2007) से घटकर 57.3% (2011) पर।

 

कक्षा 2 और कक्षा 4 के आधे से अधिक विद्यार्थी एक साथ किसी अन्य कक्षा में बैठते हैं-

·         स्कूलों के सर्वेक्षण के दौरान ASER ने अपना ध्यान कक्षा 2 और 4 के विद्यार्थियों पर केंद्रित किया और जानना चाहा कि इन कक्षाओं के विद्यार्थी कहां बैठते हैं।

 

·         राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो, ग्रामीण भारत के प्राथमिक विद्यालयों में जितनी भी कक्षाएं लगती हैं उसमें 50 फीसदी से ज्यादा मामलों में एक से ज्यादा कक्षा के विद्यार्थी बैठाए जाते हैं। मिसाल के लिए अखिल भारतीय स्तर पर कक्षा 2 के 58.3% विद्यार्थी प्राथमिक विद्यालयों में किसी अन्य कक्षा के साथ बैठाए जाते हैं। कक्षा-4 के लिए विद्यार्थियों का यह आंकड़ा 53% का है।

 

·         स्कूलों को अनुदान की राशि मिलती है, लेकिन समय पर नहीं।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अनुपालन से संबंधित निष्कर्ष

 

शिक्षक-छात्र अनुपात और कक्षा-शिक्षक अनुपात के मामले में आंकड़ों में ज्यादा बदलाब नहीं

 

·         छात्र-शिक्षक अनुपात के मामले में अखिल भारतीय स्तर पर शिक्षा के अधिकार अधिनियम के मानकों के अनुपालन करने वाले स्कूलों की संख्या आनुपातिक तौर पर सुधरी है मगर यह सुधार बड़ा कम है। इस मामले में शिक्षा का अधिकार अधिनियम के मानक का पालन करने वाले स्कूलों की तादाद साल 2010 में 38.9% थी तो साल 2011 में 40.7% फीसदी। साल 2011 में कर्नाटक में इस मामले में 94.1% फीसदी स्कूल मानक का पालन करते मिले जबकि जम्मू-कश्मीर, नगालैंड और मणिपुर में ऐसे स्कूलों की तादाद 80% से ज्यादा थी।

 

·         साल 2010 में प्रति शिक्षक एक क्लासरुम की मौजूदगी अखिल भारतीय स्तर पर 76.2% स्कूलों में थी जो साल 2011 में घटकर 74.3% स्कूलों में रह गई है। मिजोरम में 94.8% स्कूल प्रति शिक्षक एक क्लासरुम के मानक का पालन कर रहे हैं जबकि पंजाब, उत्तराखंड, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र में ऐसे स्कूलों की तादाद 80 फीसदी से ज्यादा है।

भवन, खेल के मैदान,चहारदीवारी और पेयजल के मामले में ज्यादा बदलाव नहीं-

·         साल 2011 में अखिल भारतीय स्तर पर ऐसे स्कूलों का अनुपात ज्यादा नहीं बदला जहां कार्यालय-सह-स्टोररुम की व्यवस्था हो। यह आंकड़ा 74% पर स्थिर है। ठीक इसी तरह सर्वेक्षण के दौरान जिन स्कूलों का मौका-मुआयना किया गया उनमें कुल 62 फीसदी में साल 2010 में भी खेल के मैदान थे और 2011 में भी इतने ही स्कूलों में यह सुविधा पायी गई। चहारदीवारी युक्त स्कूलों की संख्या में बढ़ोतरी(साल 2010 में 50.9% तो साल 2011 में 54.1%) है।

 

·         राष्ट्रीयस्तर पर साल 2010 के सर्वेक्षण में पेयजल की सुविधा से हीन विद्यालयों की संख्या 17.0% थी और साल 2011 में 16.6% ऐसे विद्यालय जहां पेयजल की सुविधा(इस्तेमाल करने लायक) हो, साल 2010 में तकरीबन 73 फीसदी थे तो साल 2011 में भी कमोबेश इतने ही। इस मामले में केरल का रिकार्ड( 93.8% स्कूलों में इस्तेमाल कर सकने लायक पेयजल सुविधा) सबसे अच्छा पाया गया।

 

बालिकाओं के लिए शौचालय की व्यवस्था बेहतर हुई है-

 

·         साल 2010 में ऐसे विद्यालयों की तादाद 31.2% थी जहां बालिकाओं के लिए अलग से शौचालय की सुविधा नहीं थी। साल 2011 में यह तादाद घटकर 22.6% पर आ गई है। बालिकाओं के लिए अलग से बने ऐसे शौचालय जो उपयोग करने लायक हों, पिछले साल की तुलना में बढ़े हैं( साल 2010 में ऐसे शौचालय वाले स्कूलों की तादाद  32.9% थी तो साल 2011 में 43.8%

 

स्कूलों में पुस्तकालय की संख्या बढ़ी है और उनका इस्तेमाल करने वाले विद्यार्थियों की भी-

·         साल 2010 में पुस्तकालय वंचित विद्यालयों की संख्या 37.5% थी जो साल 2011 में घटकर 28.6% पर आ गई है वहीं साल 2010 में कुल 37.9% विद्यालयों में पिछले साल विद्यार्थी पुस्तकालय की सुविधा का लाभ उठा रहे थे जबकि अब 2011 में ऐसे स्कूलों की संख्या  42.3% पर जा पहुंची है।

 
 
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