सवाल सेहत का

सवाल सेहत का

वॉलेंटेरी हैल्थ एसोशिएशन ऑफ इंडिया,नई दिल्ली द्वारा प्रस्तुत गवर्नेंस ऑव द हैल्थ सेक्टर इंडिया-हैज द स्टेट एबडिकेटेड इटस् रोल? नामक दस्तावेज(२००८) के अनुसार-

  • इस रिपोर्ट में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में मची मौजूदा गड़बड़ का जायजा लिया गया है और निपटने के रास्ते सुझाये गये हैं। रिपोर्ट का मुख्य जोर सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में सरकारी धन के निवेश और स्वास्थ्य व्यवस्था को सुचारु रुप से चलाने के तौर तरीकों पर दिया गया है।
  • रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के विभिन्न हिस्सों के बीच सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के कामकाज और उनकी प्रभावकारिता में बड़ा अन्तर है। देश में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की दशा दयनीय है और अंतर्राष्ट्रीय पैमाने पर देखें तो स्वास्थ्य के मद में प्रति व्यक्ति खर्च देश में कम है और अलग-अलग राज्यों का स्तर इस मामले में अलग-अलग है।
  • केरल,  महाराष्ट्र, हिमाचलप्रदेश और तमिलनाडु में देश की १८.८ फीसदी जनसंख्या निवास करती है और यहां स्वास्थ्य सूचकांक मंझोली आमदनी वाले विकसित देशों मसलन वेनेजुएला, अर्जेन्टीना और सऊदी अरब के बराबर है। दूसरी तरफ बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, उड़ीसा और असम जैसे राज्य है जहां देश की ४३ फीसदी से ज्याजा जनसंख्या निवास करती है और इन राज्यों में स्वास्थ्य का सूचकांक सूड़ान, नाइजीरिया और म्यांमार जैसे कम आमदनी वाले देशों तथा अफ्रीका के सबसे गरीब कहे जाने वाले देशों जैसी दयनीय स्थिति का बयान करता है।
  • जिन राज्यों में स्वास्थ्य सूचकांक की दशा दयनीय है उन राज्यों स्वास्थ्य व्यवस्था पर सरकारी खर्चा भी कम है। उत्तरप्रदेश में सरकार प्रत्येक व्यक्ति के स्वास्थ्य पर सरकार सालाना महज ८४ रुपये खर्च करती है यानी व्यक्ति के कुल स्वास्थ्य व्यय का लगभग साढ़े सात प्रतिशत।
  • डॉक्टरों की संख्या कम होना खुद में एक बड़ी समस्या है। देश में एक हजार की आबादी पर महज ०.६ एमबीबीएस डॉक्टर उपलब्ध हैं। दूसरे ये डाक्टर दक्षिण के राज्यों अथवा धनी राज्यों में ज्यादा हैं। पंजाब में यूपी की तुलना में पांच गुना ज्यादा एमबीबीएस डाक्टर हैं। ठीक इसी तरह डाक्टरों की अधिकतर मौजूदगी ग्रामीण के बजाय शहरी इलाकों में है।
  • राज्यवार अगर मेडिकल कॉलेज की मौजूदगी देखें तो राज्यों के बीच इस मामले में काफी अन्तर मिलेगा। दक्षिण के कुल राज्यों में देश के ६३ फीसदी मेडिकल कॉलेज और ६७ फीसदी सीटें हैं। चिकित्सकों की संख्या में खास कमी बीमारु कहे जाने वाले राज्यों के अतिरिक्त झारखंड, छ्तीसगढ़, पूर्वोत्तर के राज्य, उड़ीसा और हरियाणा में है। .
  • सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के अन्तर्गत जो चिकित्सा सेवा मुहैया करायी जाती है वह गुणवत्ता के पैमाने पर खरा नहीं उतरती ।डॉक्टर, नर्स, दंत चिकित्सक तथा अन्य चिकित्साकर्मियों के लिए बनाये गए विधायी परिषद सुचारु रुप से काम नहीं कर रहे। इस कारण गरीब जनता निजी क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवा लेने के लिए बाध्य है।गरीब राज्यों के निर्धन लोग सरकारी स्वास्थ्य सेवा की मौजूदगी प्रयाप्त ना होने के कारण निजी क्षेत्र की सेवा लेने के लिए मजबूर हैं। इस तरह गरीब व्यक्ति को बीमार पड़ने की दशा में अगर अस्पताल में भरती करने की नौबत आती है तो उसकी आमदनी (जो पहले ही बहुत कम है) का एक बड़ा हिस्सा इसी में खर्च होता है। रिपोर्ट में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के आंकड़े के हवाले के हवाले से कहा गया है कि बिहार और उत्तरप्रदेश में बिहार में रोग के गंभीर होने की दशा में जिन व्यक्तियों को अस्पताल में दाखिल होना पड़ता है उसमें से एक तिहाई लोग सिर्फ स्वास्थ्य के मद में होने वाले खर्च के कारण उन्हे गरीबी रेखा के नीचे जाना पड़ेगा।
  • दवाइयों के दाम में तेजी गति से बढ़ोतरी हुई है। मरीज को उपचार के क्रम में अपनी खर्च का ७५ फीसदी हिस्सा औसतन दवाइयों की खरीद पर व्यय करना पड़ता है। उड़ीसा में यह आंकड़ा ९० फीसदी का है और राजस्थान, बिहार तथा यूपी में इससे थोड़ा ही कम । कुछ राज्यों में दवाइयों की खरीद पर रोगियों को ६१ फीसदी से कम खर्च करना पडता है जिससे संकेत मिलते हैं कि इन राज्यों में स्वास्थ्य सेवा बाकी राज्यों की तुलना में ज्यादा अच्छी है।
  • दवाइयों के दाम बढ़ने के कई कारण हैं। इनमें प्रमुख हैं- नये पेटेंट कानून, दवा निर्माताओं के ऊपर कानूनों का उचित तरीके से लागू ना होना और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक दवाओं का बाजार में प्रचलित होना।
  • ग्रामीण स्वास्थ्य योजना को असरदार तरीके से लागू करने के मामले में सबसे पीछे रहने वाले राज्यों के नाम हैं-यूपी, झारखंड और असम।

नीचे के आरेख से जाहिर होता है कि अमेरिका, चीन और ब्राजील की तुलना में भारत में लोगों को स्वास्थ्य सेवा हासिल करने के लिए अपनी जेब से कहीं ज्यादा रकम खर्च करनी पड़ती हैः
साल २००५ में स्वास्थ्य के मद में खर्च ( जीडीपी में हिस्से के रुप में)
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स्रोत-:वर्ल्ड हैल्थ रिपोर्ट, ड्ब्ल्यूएचओ, २००८

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रस्तुत प्राइमरी हैल्थ केयर-नाऊ मोर दैन एवर नामक रिपोर्ट के अनुसार-

  • सबसे धनी और सबसे गरीब मुल्कों के बीच आयु-संभाविता (लाइफ-एक्सपेंटेंसी) के मामले में अन्तर ४० साल का है। अनुमान के मुताबिक इस साल (२००८)  १३ करोड़ ६० लाख महिलाएं प्रसूति होंगी और इनमें ५ करोड़ ८० लाख को प्रसव के समय या उसके बाद भी कोई चिकित्सीय सहायता नहीं मिल पाएगी। इस तरह नवजात शिशु और जन्मदाता मां की जान को खतरा होगा। .
  • विश्व के फलक पर देखें तो किसी देश में स्वास्थ्य के मद में प्रति व्यक्ति सालाना सरकारी खर्चा २० डॉलर का है तो किसी देश में ६००० डॉलर का। कम या फिर मंझोले दर्जे की आमदनी वाले देशों में निवार करने वाली ५.६ अरब आबादी बीमार पड़ने पर कुल खर्चे का आधा अपनी जेब से  देने के लिए मजबूर है।
  • साल १९७८ में जितने लोगों को स्वास्थ्य सेवा हासिल हो पाती थी और जितने लोग उपचार के बाद स्वास्थ्य लाभ कर लेते थे आज उतने लोगों को भी यह नसीब नहीं है।
  • स्वास्थ्य सेवा को सुधारने, बीमारियों से लड़ने और आयु संभाविता बढ़ाने  की दिशा में बड़ी प्रगति हो रही है लेकिन विश्व भर के नागरिक मौजूदा स्वास्थ्य व्यवस्था से असंतुष्ट हैं और उनकी अंसुतुष्टी को टाला नहीं जा सकता क्योंकि हर साल १० करोड़ की तादाद में लोग सिर्फ स्वास्थ्य सेवा पर खर्चे के कारण गरीबी के चंगुल में पड़ जाते हैं। लाखों लोग ऐसे हैं जिन्हें स्वास्थ्य सेवा हासिल ही नहीं होती।
  • स्वास्थ्य सेवाओं का ज्यादा जोर बीमार को उपचार मुहैया कराने पर है और इस क्रम में लोगों को सेहतमंद बनाने की दिशा में किए जा रहे प्रयास खास नहीं हो पाते जबकि अगर रोगों की रोकथाम और लोगों को सेहतमंद बनाने पर जोर दिया जाय तो बीमार पड़ने पर उपचार के मद में होने वाले खर्चे में वैश्विक स्तर पर ७० फीसदी की कमी आएगी। थोड़े में कहें तो स्वास्थ्य सेवाओं में बरताव के स्तर पर गैर-बराबरी है, आपसी तालमेल का अभाव है और ये सेवाएं कारगर नहीं हैं।
  • प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने का मतलब होता है घर से लेकर अस्पताल तक हर स्तर पर व्यक्ति को स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराना और इसमें जितना जोर निदान पर होता है उतना ही जोर उन स्थितियों को तैयार करने पर कि लोग बीमारी से बचे रहें। .
  • स्वास्थ्य सेवा में तभी बराबरी का मूल्य माना जाएगा जब हरेक व्यक्ति को उसकी जरुरत के मुताबित स्वास्थ्य सेवा हासिल हो सके भले ही स्वास्थ्य सेवाओं को खरीदने की उसकी ताकत चाहे जितनी हो। अगर ऐसा नहीं हो पाता तो दो व्यक्तियों की जीवन संभाविता में अन्तर बना रहेगा। ब्राजील ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के निर्देशों के अनुसार सबको स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने की दिशा में प्रयास किए हैं और वहां ७० फीसदी आबादी को अब ये सुविधा हासिल हो चुकी है।
  • स्वास्थ्य सेवा लोकोन्मुखी होनी चाहिए और उसमें लोगों की जरुरतों का ध्यान रखा जाना चाहिए। स्वास्थ्य सेवाओं को समुदाय की जीवन शैली से जोड़कर देखने की जरुरत है। इस्लामी गणराज्य ईरान १७ हजार हैल्थ हाऊस चल रहे हैं और एक हैल्थ हाऊस का जिम्मा १५०० लोगों की देखभाल का है। हैल्थ हाऊसों की इस व्यवस्था से ईरान में बाल मृत्यु दर में तेजी से कमी आयी है। वहां १९९० में आयु संभाविता ६३ साल थी जो २००६ में बढ़कर ७१ साल हो गई। क्यूबा में पॉलीक्लीनिक की व्यवस्था के कारण वहां आयु संभाविता ७८ साल है जो विश्व के किसी भी विकासशील देश से ज्यादा है।
Recommendations of the Commission on Social Determinants of Health
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Source: 2008 World Health Report, WHO



 




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