सवाल सेहत का

सवाल सेहत का

इंटरनेशनल सेव द चिल्ड्रेन(यूके) द्वारा प्रस्तुत [insie]द नेक्स्ट रिवाल्यूशन- गीविंग एवरी चाईल्ड द चान्स टू सरवाईव( 2009) नामक दस्तावेज के अनुसार-
http://www.savethechildren.in/custom/recent-publication/Ev
eryonereport%281%29.pdf

-- दुनिया में बाल-मृत्यु की जितनी घटनाएं होती हैं उसमें 50 फीसदी यानी तादाद में आधी घटनाएं मात्र छह देशों भारत, नाईजीरिया, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑव कांगो, ईथोपिया, पाकिस्तान और चीन में घटती हैं।

-- जिस शिशु को ज्नम के बाद शुरुआती छह महीने में स्तनपान कराया गया हो उसके न्यूमोनिया से काल-कवलित होने की आशंका स्तनपान से वंचित शिशु की तुलना में 15 गुनी कम होती है।

-- विश्व स्वास्थ्य संगठन के आकलन के अनुसार कुल 57 देश ऐसे हैं जहां स्वास्थ्यकर्मियों का गंभीर रुप से अभाव है। इनमें एक देश भारत भी है जहां 20 लाख 60 हजार स्वास्थ्यकर्मियों की कमी है। 57 देशों में से 36 देश अफ्रीका के हैं।

-- विश्व में बाल-मृत्यु की कुल तादाद में 28% हिस्सा साफ-सफाई की कमी और संदूषित पेयजल से होने वाली मौतों का है।

--- विश्वबैंक के आंकड़ों के अनुसार वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण 200,000400,000 की अतिरिक्त सालाना तादाद में 2015 तक बाल-मृत्यु हो सकती है।

--साल 2008 में 80 लाख 80 हजार बच्चों (पाँच साल से कम उम्र के) की मृत्यु हुई।

-- बाल और मातृ-मृत्युगामिता से संबंधित सहस्राब्दि विकास लक्ष्य(साल 2015) को पूरा करने के लिए $3645 अरब अतिरिक्त रकम की आवश्यकता है। यह रकम उतनी ही है जितनी विश्व भर में उपभोक्ता बोतलबंद पानी पर साल भर में खर्च करते हैं।

-- पाँच साल की उम्र पूरी होने से पहले हर साल तकरीबन 90 लाख बच्चों की मृत्यु होती है। इसका अर्थ हुआ हर सेकेंड तीन बच्चों की मृत्यु। उन बच्चों में 40 लाख बच्चे ऐसे हैं जिनकी मृत्यु जन्म के पहले महीने में ही हो जाती है। अन्य 30 लाख बच्चों की मृत्यु जन्म के एक हफ्ते के अंदर होती है, जिसमें 20 लाख बच्चे ऐसे हैं जो जन्म के पहले दिन ही काल-कवलित होते हैं।

-- जन्म के पहले पाँच सालों में काल-कवलित होने वाले बच्चों में 97% फीसदी बच्चे निम्न या मध्य आयवर्ग वाले देशों के हैं।उन देशों में भी काल-कवलित होने वाले सर्वाधिक बच्चे हाशिए के समाजों से होते हैं।

-- अफगानिस्तान में पाँच बच्चे में से एक की मृत्यु उसके पांचवें जन्मदिन से पहले हो जाती है। उपसहारीय अफ्रीकी देशों में सात में से एक बच्चा जन्म के पांचवे साल से पहले मृत्यु का ग्रास बनता है।

-- बच्चों की मृत्यु की इस अत्यधिक तादाद की व्याख्या मुख्य रुप से तीन स्तरों पर की जाती है-

1. पाँच साल से कम उम्र में मरने वाले बच्चों में 90 फीसदी मामले ऐसे हैं जहां कारण के तौर पर बस कुछ ही बीमारियां मौजूद होती हैं। न्यूमोनिया, खसरा और एचआईवी-एड्स् ऐसी ही बीमारियां हैं, साथ ही इसमें प्रसवकालीन जटिलताओं और परिस्थितियों का भी योगदान होता है। प्रसवकालीन या प्रसवोपरांत मौजूद हालात खासतौर पर बच्चों की मृत्यु के लिए जिम्मेदार हैं। नवजात शिशुओं की जितनी संख्या विश्वभर में काल-कवलित होती है उसमें 86 फीसदी मामले ऐसे हैं जिसमें कारक होता है गंभीर संक्रमण, श्वांसरोध तथा असामयिक प्रसव। ऐसे मामलों में पर्याप्त चिकित्सीय इंतजाम द्वारा बच्चों को मृत्यु से बचाया जा सकता है।

2. जरुरी स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव, इन सुविधाओं के मौजूद होने के बावजूद माता या शिशु का सुविधाओं से वंचित रहना, प्रसति स्त्री तथा नवजात शिशुओं का गंभीर रुप से कुपोषण का शिकार होना, स्वच्छ पेयजल और साफ-सफाई से वंचित रहना, जननि-स्वास्थ्य-कर्म के बारे में जानकारी का अभाव तथा गर्भनिरोधकों की कमी जैसे कारणों से बाल-मृत्यु की आशंका ज्यादा बढ़ती है।

3. बालमृत्यु ऐसी घटना नहीं जिसपर काबू नहीं पाया जा सके। अधिकतर मामलों में बाल-मृत्यु की घटना के पीछे राजनीतिक फैसलों और नीतियों का हाथ होता है। इसके कुछ कारण पर्यावरणगत और सांस्कृतिक भी हैं। गरीबी, असमानता, महिलाओं और बालिकाओं के प्रति भेदभाव भरा व्यवहार ये सब कारक भी बाल-मृत्यु के लिए जिम्मेदार होते हैं।

-- प्रशासन की लापरवाही, हिंसात्मक संघर्ष तथा वातावरणीय प्रदूषण बच्चे के जीवन-सक्षम हो सकने की परिस्थिति पर नकारात्मक असर डालते हैं। अध्ययन में पाया गया है कि जिन 10 देशों में बाल-मृत्यु की संख्या सबसे ज्यादा है उनमें 8 देश ऐसे हैं जहां किसी ना किसी तरह का हिंसात्मक संघर्ष चल रहा है और जो राजनीतिक अस्थिरता के शिकार हैं।

-- विश्वबैंक का आकलन है कि साल 2009-2015 के बीच हर साल औसत से 200,000 से 400,000 बच्चे ज्यादा मरेंगे और इसकी वजह होगी वित्तीय-संकट तथा आर्थिक-मंदी। स्वाईन फ्लू का खतरा वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ सकता है और इसका असर भी बाल-मृत्यु पर पड़ेगा।




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