सवाल सेहत का

सवाल सेहत का

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रस्तुत प्रीवेंटिंग डीजीज थ्रू हैल्दी एन्वायर्नमेंट- टुआर्डस् ऐन् एस्टीमेट ऑव एन्वायर्नमेंट बर्डेन ऑव डीजीज नामक दस्तावेज के अनुसार- 

http://www.who.int/quantifying_ehimpacts/publications/prev
entingdisease.pdf



-  वैश्विक स्तर पर बीमारियों के बोझ( एक स्वस्थ व्यक्ति के जीवन-वर्ष की हानि) में तकरीबन 24 फीसदी हिस्सा उन बीमारियों का है जिसके कारक वातावरणीय हैं। इसी तरह वैश्विक स्तर पर बीमारियों से होने वाली असामयिक मौतों में 23 फीसदी हिस्सा वातावरणीय प्रदूषण से होने वाली बीमारियों का है।

-  विश्व-स्वास्थ्य संगठन ने कुल 102 बड़ी बीमारियों को साल 2004 के वर्ल्ड हैल्थ रिपोर्ट में एक श्रेणी में रखा था। संगठन ने अपनी रिपोर्ट में पाया कि इसमें 85 बीमारियां ऐसी हैं जिनका होने में वातावरणीय कारक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

-  वैश्विक स्तर पर देखें तो प्रति व्यक्ति स्वस्थ जीवन-आयु-वर्ष की हानि के मामले में वातावरणीय कारकों के कारण उत्पन्न होने वाली बीमारियों का असर बच्चों पर कहीं ज्यादा(बाकी आबादी की तुलना में 5 गुना) है। डायरिया, मलेरिया और श्वसन रोगों के कारक वातावरणीय हैं और इन बीमारियों से 0-5 साल के आयुवर्ग के बच्चों की भारी संख्या में मृत्यु होती है।

-  विकासशील देशों में 0-5 साल की उम्र के बच्चों की मृत्यु की कुल तादाद में 26 फीसदी हिस्सा डायरिया, मलेरिया और श्वसन रोग से होने वाली बीमारियों का है।

-  विकासशील देशों में 0-14 साल के आयुवर्ग में बीमारियों से जितने बच्चों की मृत्यु होती है, उसमें 36 फीसदी मृत्यु की घटनाओं में मुख्य वजह वातावरणीय कारकों से उत्पन्न होने वाली बीमारियां हैं।

-  वातावरणीय कारकों से होने वाली बीमारियों के बोझ में क्षेत्रवार विभिन्नता को लक्ष्य किया गया है। इसका एक बड़ा कारण स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता में विभिन्नता और वातावरण में पाया जाने वाला गुणात्मक अन्तर है। मिसाल के लिए विकासशील क्षेत्रों में वातावरणीय कारणों से होने वाली बीमारियां अगर मृत्यु की 25 फीसदी मामलों में जिम्मेदार हैं तो विकसित क्षेत्रों में यही संख्या 17 फीसदी है।

-  स्वस्थ आयु-वर्ष की हानि के मामले में जिन बीमारियों का असर सबसे ज्यादा है उनके नाम हैं- डायरिया, मलेरिया, फेफड़े के निचले हिस्से में होने वाले श्वसन रोग और अयाचित दुर्घटनावश लगने वाले चोट-चपेट।

-  डायरिया- डायरिया के 94% फीसदी मामलों में संदूषित पानी, साफ-सफाई की कमी और अस्वास्थ्यकर रहन-सहन जिम्मेदार है।

-  फेफड़े के निचले हिस्से में होने वाले रोग- इसका बड़ा कारण घरेलू जलावन से उत्पन्न धुआं और धूम्रपान जन्य धुआं है। विकसित देशों में फेफड़े के निचले हिस्से में होने वाली बीमारियों में 20 फीसदी मामले वातावरणीय कारकों से उत्पन्न होते हैं, विकासशील देशों में यह तादाद 42 फीसदी है।

-  अयाचित दुर्घटना- इसके अन्तर्गत कार्यस्थल पर लगने वाली चोट-चपेट, रेडियोधर्मी विकिरण और औद्योगिक-उत्पादन के क्रम में होने वाली दुर्घटना शामिल है। दुर्घटना के 44% फीसदी मामलों में कारक वातावरणजन्य पाये गए हैं।

-  मलेरिया-  भूमि के उपयोग, निर्वनीकरण, जल-संसाधनों के प्रबंधन, बसाहट की जगहों के चयन और आवासस्थल की बनावट से संबंधित नीतियों का गहरा असर मलेरिया जनित बोझ से है। मलेरिया के 42 फीसदी मामलों में उपर्युक्त कारक काम करते हैं।

-  वातावरणीय कारणों से होने वाली मौतों में पारपथ का ना होना, साईकिल सवारों के लिए सड़क पर यातायात व्यवस्था का अभाव या फिर पैदल यात्रियों के लिए कोई व्यवस्था का ना होना भी महत्वपूर्ण कारक है। दुर्घटनाओं से होने वाली जीवन-वर्ष की हानि में 40 फीसदी हिस्सा इस श्रेणी की दुर्घटनाओं का है।

-  वातावरणीय कारकों से प्रतिव्यक्ति स्वस्थ आयु-वर्ष की हानि के मामले विकसित देशों की तुलना में विकासशील देशों में 15 गुना ज्यादा हैं। वातावरणीय कारकों से उत्पन्न डायरिया और श्वसन रोग के मामले में .ह अन्तर कुछेक विकासशील देशों में 120 से 150 गुना तक ज्यादा है।

-  वातावरणीय कारकों से उत्पन्न कार्डियोवास्कुलर रोगों से विकसित विकासशील देशों में प्रतिव्यक्ति स्वस्थ आयु-वर्ष की हानि विकसित देशों की तुलना में 7 गुना ज्यादा होती है। कैंसर के मामले में यह अन्तर 4 गुना का है।  

 




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