Resource centre on India's rural distress
 
 

सवाल सेहत का

 

 खास बात

    सिर्फ 10 फीसदी भारतीयों के पास हेल्थ इंश्योरेन्स है और यह बीमा भी उनकी सेहत की जरुरतों के हिसाब से पर्याप्त नहीं है। ***
•    अस्पताल में भर्ती भारतीय को अपनी सालाना आमदनी का 58 फीसदी इस मद में व्यय करना पड़ता है।***
•    तकरीबन 25 फीसदी भारतीय सिर्फ अस्पताली खर्चे के कारण गरीबी रेखा से नीचे हैं। ***
•    सेहत के मद में होने वाले खर्चे का सवाल बड़ा चिन्ताजनक है। सालाना 10 करोड़ लोग सेहत पर होने वाले जेबी खर्च के कारण गरीबी के दुश्च्चक्र में फंसते हैं। लाखों लोगों को कोई चिकित्सीय देखभाल या सेवा हासिल नहीं है।#
•    भारत में अब भी बच्चों और व्यस्कों में एनीमिया और कुपोषण की परिघटना व्यापक रुप से मौजूद है। *
•    भारत में शिशु मृत्यु दर लगातार घट रही है। साल 1998-99 में इसकी तादाद प्रति हजार जन्म पर 68 थी जो साल 2005-06  में घटकर 57 हो गई। *
•    नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-3 में दो बेटियों वाली(मगर पुत्रवंचित) 62 फीसदी मातओं ने कहा कि उन्हें और बच्चे नहीं चाहिए। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-2 में ऐसी माताओं की तादाद 47 फीसदी थी। *
•    नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-3(साल 2005-06) में पाया गया कि 20-24 आयुवर्ग की कुल 45 फीसदी महिलाओं का ब्याह 18 साल की वैधानिक उम्र से पहले हुआ। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-2(साल 1998-99) में ऐसी महिलाओं की तादाद 50 फीसदी थी।*
•    केरल महाराष्ट्र हिमाचलप्रदेश और तमिलनाडु में देश की कुल आबादी का 18.8 फीसदी हिस्सा निवास करता है। ये राज्य स्वास्थ्य निर्देशांकों के पैमाने पर अपेक्षाकृत ज्यादा विकसित मध्यवर्ती आमदनी वाले देशों मसलन वेनेजुएला, अर्जेटाइना और सऊदी अरब के समतुल्य हैं। **

* नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-3(साल 2005-06) http://www.nfhsindia.org/nfhs3.html

**रिपोर्ट ऑव द इन्डिपेंडेन्ट कमीशन ऑन डेवलपमेंट एंड हेल्थ इन इंडिया(2008)

 *** स्वास्थ्य एवं परिवारकल्याण मंत्रालय http://mohfw.nic.in/NRHM/Documents/Mission_Document.pdf

# 2008 वर्ल्ड हेल्य रिपोर्ट प्राइमरी हेल्थ केयर नाऊ मोर दैन एवर, डब्ल्यू एच ओ


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संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा प्रकाशित [inside]ट्रेन्डस् इन मेटरनल मोर्टालिटी 1990 टू 2013[/inside] नामक रिपोर्ट के अनुसार-

http://www.im4change.org/siteadmin/http://www.im4change.org/siteadmin/tinymce///uploaded/Trends%20in%20Maternal%20Mortality%201990%20to%202013.pdf


 
भारतीय परिदृश्य
• साल 1990 में भारत में मातृ मृत्यु अनुपात(एमएमआर-मैटरनल मोरटालिटी रेशियो) 560 (प्रति 100000 जीवित शिशुओं के जन्म पर) था , साल 1995 में यह घटकर 460 हुआ, साल 2000 में यह अनुपात प्रति 1 लाख जीवित शिशुओं के जन्म पर 370 माताओं का था, साल 2005 में 280 तथा साल 2013 के दौरान यह अनुपात प्रति 1 लाख जीवित शिशुओं के जन्म पर 190 माताओं का था।

• भारत की तुलना में (एमएमआर: 190 प्रति 1लाख जीवित शिशुओं के जन्म पर) ब्राजील (एमएमआर: 69) और चीन (एमएमआर: 32) ने मातृ-मृत्यु की घटनाओं को कम करने में बेहतरीन प्रदर्शन किया है।

• एक भारतीय महिला के लिए आजीवन प्रसवकालीन कारणों से मृत्यु का शिकार होने की आशंका( 15 वर्ष की महिला के बारे में यह आशंका कि वह बच्चे को जन्म देते वक्त जान गंवा देगी) 190 में 1 की है जबकि चीनी महिला के लिए यह आशंका 1800 मामलों में 1 का तथा ब्राजील की महिला के मामले में यह आशंका 780 महिलाओं में 1 की है।

•अगर देशस्तर पर देखें तो विश्व में एक साल में जितनी महिलाओं ने प्रसवकालीन कारणों से जान गंवायी उसमें एक तिहाई महिलाएं सिर्फ दो देशों भारत(17 प्रतिशत- कुल 50 हजार) और नाइजीरिया(14 प्रतिशत- कुल 40 हजार) की थीं।
 
• प्रजनन-योग्य उम्र में पहुंची महिलाओं में मातृत्व जनित कारणों से मृत्यु को प्राप्त होने वाली महिलाओं की संख्या भारत में 6.7 प्रतिशत है जबकि चीन में 1.6 प्रतिशत और ब्राजील में 2.8 प्रतिशत।

• साल 2013 में मातृत्व जनित कारणों से मृत्यु को प्राप्त होने वाली 58 फीसदी महिलाएं इन दस देशों से हैं-: भारत (50000, 17%); नाइजीरिया (40000, 14%); कांगो (21000, 7%); ईथोपिया (13000, 4%); इंडोनेशिया (8800, 3%); पाकिस्तान (7900, 3%); तंजानिया (7900, 3%); केन्या (6300, 2%); चीन (5900, 2%); युगांडा (5900, 2%).

• भारत में मातृ मृत्यु दर 1990 से 2013 के बीच 65 प्रतिशत घटा है।

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[inside]यूनिसेफ द्वारा प्रस्तुत कमिटिंग टू चाइल्ड सरवाइवल- अ प्रामिस रिन्यूड, प्रोग्रेस रिपोर्ट-2012[/inside] नामक दस्तावेज के अनुसार- http://www.unicef.org/media/files/APR_Progress_Report_2012_final.pdf

 

- विश्व में पाँच साल से कम उम्र के तकरीबन 19,000 बच्चे प्रति दिन मृत्यु के शिकार होते हैं।

- पाँच साल से कम उम्र में मृत्यु का शिकार होने वाले बच्चों की संख्या को सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों के अनुसार 2.5%,सालाना की दर से घटाना है, यह दर मौजूदा परिस्थितियों में अपर्याप्त साबित हो रही है।

- भारत में बीते वर्ष( 2011) पाँच साल से कम उम्र के 10 लाख 70 हजार बच्चों की मृत्यु हुई। यह संख्या विश्व के देशों में सर्वाधिक है। यह संख्या पाँच साल से कम उम्र में मृत्यु का शिकार हुए कुल बच्चों(विश्व) की संख्या का 24 फीसदी है।

- पाँच साल से कम उम्र के जो बच्चे बीते साल(2011) मृत्यु का शिकार हुए उनकी कुल तादाद का एक तिहाई हिस्सा सिर्फ भारत और नाइजीरिया से है।

- रिपोर्ट के अनुसार पाँच साल से कम की उम्र में मृत्यु के शिकार होने वाले कुल बच्चों में 50 फीसदी सिर्फ पाँच देशों- भारत, नाइजीरिया, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑव कांगो, पाकिस्तान और चीन से हैं।

- चीन में बीते साल पाँच साल से कम उम्र के 2.49 लाख बच्चे मृत्यु का शिकार हुए, जबकि इथोपिया में 1.94 लाख और बांग्लादेश तथा इंडोनेशिया में 1.34 लाख। युगांडा में इस आयु वर्ग के कुल 1.31 लाख बच्चे मृत्यु का शिकार हुए जबकि अफगानिस्तान में 1.28 लाख। सर्वाधिक संख्या में बाल-मृत्यु वाले देशों में युगांडा और अफगानिस्तान का स्थान 9 वां और 10 वां है, भारत का पहला।

- साल 2011 में पाँच साल से कम उम्र में मृत्यु का शिकार होने वाले कुल बच्चों का 49 फीसदी हिस्सी उप-सहारीय अफ्रीकी देशों का है जबकि इस मामले में दक्षिण एशिया की हिस्सेदारी 33 फीसदी की है। शेष विश्व का हिस्सा इस मामले में साल 1990 में 32% का था जो दो दशक बाद घटकर 18% रह गया है।

- पाँच साल से कम उम्र के जो बच्चे बीते साल(2011) मृत्यु का शिकार हुए उनकी कुल तादाद का एक तिहाई हिस्सा सिर्फ भारत और नाइजीरिया से है।

- निमोनिया या फिर डायरिया से हाने वाली कुल वैश्विक बाल-मृत्यु का 50 फीसदी से ज्यादा हिस्सा सिर्फ चार देशों- भारत( 10 लाख 70 हजार) , नाइजीरिया( 7 लाख 56 हजार) , डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑव कांगो( 4 लाख 65 हजार) और पाकिस्तान( 3 लाख 52 हजार) में केंद्रित है।

- सिगापुर में बाल-मृत्यु की दर सर्वाधिक कम यानी 2.6 रही जबकि स्लोवेनिया और स्वीडन की इससे थोड़ी ही पीछे( दोनों देशों में 2.8)

- रिपोर्ट के अनुसार पाँच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु का एक बड़ा कारण निमोनिया है। साल 2011 में वैश्विक स्तर पर पाँच साल कम उम्र के जितने बच्चे मृत्यु का शिकार हुए उनमें 18 फीसदी मामलों में मृत्यु का कारण निमोनिया रहा। निमोनिया से मृत्यु का शिकार होने वाले ज्यादातर बच्चे उपसहारीय अफ्रीकी देशों और दक्षिण एशिया के थे।

- वैश्विक स्तर पर बाल-मृत्यु के पाँच अग्रणी कारणों में शामिल हैं- निमोनिया (18 फीसदी); निर्धारित अवधि से पहले जन्म होने के कारण उत्पन्न जटिलताएं (14 फीसदी); डायरिया (11 फीसदी) और मलेरिया (7 फीसदी)

- रिपोर्ट के अनुसार साल 2011 में पाँच साल से कम उम्र के जितने बच्चों की मृत्यु हुए उसमें एक तिहाई मौतों का कारण कुपोषण रहा।

- यूनिसेफ की इस रिपोर्ट के अनुसार डायरिया का एक बड़ा कारण खुले में शौच करना है। विश्व में अब भी 1.1 विलियन आबादी खुले में शौच करने को बाध्य है।

- डायरिया जनित मृत्यु का एक कारण साफ-सफाई की कमी है। विश्व में 2.5 बिलियन आबादी साफ-सफाई की परिवर्धित सुविधा से वंचित है इस तादाद का 50 फीसदी हिस्सा सिर्फ चीन और भारत में है। विश्व में 78 करोड़ लोगों को साफ पेयजल उपलब्ध नहीं है।

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[inside]विश्व स्वास्थ्य संगठन(WHO) के ग्लोबल रिपोर्ट: मोर्टालिटी अट्रीब्युटेबल टू टोबैको(2012)[/inside] नामक दस्तावेज के अनुसार

 
वैश्विक स्तर पर 30 साल या उससे अधिक की आयु में मृत्यु को प्राप्त होने वाले लोगों में तंबाकूजन्य कारणों से मृत्यु को प्राप्त होने वाले लोगों की संख्या 12% है जबकि भारत में 16% और पाकिस्तान में 17% और बांग्लादेश में 31%

भारत में गैर-संक्रामक रोगों से होने वाली मृत्यु-दर [1096 प्रति 100,000 आबादी पर] संक्रामक रोगों से होने वाली मृत्यु-दर के 3.3 गुना[336 प्रति 100,000 आबादी पर].ज्यादा है। गैर-संक्रामक रोगों से होने वाली मृत्यु में तंबाकूजन्य पदार्थों के सेवन से होने वाली मृत्यु के मामले 9% है जबकि संक्रामक रोगों से होने वाली मृत्यु में तंबाकूजन्य पदार्थों के सेवन से होने वाली मृत्यु के मामले 2%

भारत में पुरुषों में तंबाकूजन्य मृत्यु-दर 206 [ 30 साल और उससे अधिक आयु के प्रति 100,000 पुरुषों में] है जबकि महिलाओं में 13 [ 30 साल और उससे अधिक आयु की प्रति 100,000 महिलाओं में]. तंबाकूजन्य कारणों से होने वाली मृत्यु का अनुपात भारत के पुरुषों में 12% तथा महिलाओं के बीच 1% है।   

जहां तक गैर संक्रामक रोगों से होने वाली मौतों का प्रश्न है- इसमें ह्रदय रोगों से होने वाली मौतों की संख्या प्रति 100,000 व्यक्तियों (30 साल और इससे अधिक उम्र के) में 329 है, इसमें 5 फीसदी मौतों के मामले में कारक तंबाकू का सेवन है। श्वांसनली और फेफड़े के कैंसर से प्रति 100,000 व्यक्तियों के बीच 16 व्यक्ति मृत्यु का शिकार होते हैं और इसमें 58 फीसदी मामलों में मृत्यु का कारण तंबाकू का सेवन है।.

जहां तक संक्रामक रोगों से होने वाली मृत्यु का प्रश्न है- भारत में निचली श्वांसनली के रोगों से होने वाली मौतों में 5 फीसदी मौतें तंबाकूजन्य पदार्थों के सेवन से होती हैं जबकि यक्ष्मा(टीबी) से होने वाली मौतों में 4 फीसदी मौतों का कारण तंबाकूजन्य पदार्थ हैं।. 

फेफड़े के कैंसर से विश्व में जितने लोग मौत का शिकार होते हैं उसमें 71 फीसदी मामले तंबाकूजन्य पदार्थों के सेवन से होने वाले फेफड़े के कैंसर के होते हैं। असाध्य बीमारियों से विश्व में जितने लोग मृत्यु का शिकार होते हैं उसमें 42% फीसदी मामले तंबाकूजन्य पदार्थ के सेवन से होने वाली बीमारियों के हैं।.

धूम्रपान से प्रति वर्ष विश्व में 50 लाख लोगों की मृत्यु होती है जबकि तकरीबन 600,000 लोग पैसिव स्मोकिंग के कारण मृत्यु के शिकार होते हैं।

अनुमानों के अनुसार ऐसी आशंका व्यक्त की गई है कि अगले दो दशकों में तंबाकूजन्य पदार्थों के सेवन से दुनिया में तकरीबन 80 लाख लोग मृत्यु का शिकार होंगे जिसमें सर्वाधिक संख्या(80 फीसदी) निम्न और मध्यवर्ती आमदनों वाले देशों के लोगों की होगी।

यदि प्रभावकारी कदम नहीं उठाये गए तो 21 वीं सदी में तंबाकूजन्य पदार्थों के सेवन से तकरीबन 1 अरब लोगों की मृत्यु होगी। एडस-एचआईवी संक्रमण, टीबी और मलेरिया को एक साथ मिलाकर देखें तो इनके कारण जितने लोगों की मृत्यु होती है उससे कहीं ज्यादा लोगों की मृत्यु तंबाकूजन्य पदार्थों के सेवन से होती है।.
 
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विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा वायुप्रदूषण संबंधी नए आंकड़ों के अनुसार-

http://www.who.int/mediacentre/news/releases/2011/air_pollution_20110926/en/index.html

 

·     91 देशों के 1100 शहरों में 100 000 निवासियों के सेहत संबंधी मामलों के अध्ययन के आधार पर विश्वस्वास्थ्य संगठन का ताजा आकलन (2011-26 सितंबर) कहता है कि शहरों में वायुप्रदूषण का स्तर पहले की तुलना में बड़ा खतरनाक हो उठा है।

 

·    विश्व-स्वास्थ्य संगठन का आकलन है कि प्रतिवर्ष 20 लाख लोगों की मृत्यु इनडोर और आऊटडोर वायुप्रदूषण के कारण उत्पन्न सूक्ष्मकणों के श्वसन से होती है। ये सूक्ष्म कण  PM10 कहलाते हैं यानी इनका आकार 10 माईक्रोमीटर से कम होता है और श्वसन के जरिए ये कण रक्त में मिल जाते हैं। रक्त में मिलकर ये कण हृदयाघात, कैंसर, अस्थमा और कई अन्य श्वसनरोगों के कारक बनते हैं।

 

·   विश्वस्वास्थ्य संगठन के निर्देशों के अनुसार PM10 की मौजूदगी वायु में 20 माईक्रोग्राम प्रतिक्यूबिक (µg/m3)  मीटर होनी चाहिए लेकिन संगठन के ताजा आंकड़ों के अनुसार PM10 कणों की मौजूदगी कई शहरों 300 µg/m3 तक पहुंच गई है।

·   अध्ययन के अनुसार पीएम-10 कणों की मौजूदगी शहरों में आम परिघटना बन चली है और इसका मुख्य स्रोत ऊर्जासंयंत्र तथा मोटरवाहन हैं।

 

·     अधिकतर शहरों की वृहत्तर आबादी विश्वस्वास्थ्य संगठन के वायुप्रदूषण संबंधी मानक (20 µg/m3) से कहीं ज्यादा मात्रा में पीएम-10 कणों को श्वसन के जरिए अपने ग्रहण कर रही है।

 

·  विश्व स्वास्थ्य संगठन के निर्देशक( पब्लिक हैल्थ एंड एन्वायर्नमेंट) डाक्टर मारिया नीरा के अनुसार- " अगर हम वातावरणीय कारकों का पर्याप्त प्रबंधन कर सकें तो श्वसन रोग तथा कैंसर से होने वाली असामयिक मृत्यु की घटनाओं में बड़े पैमाने पर कमी की जा सकती है। पूरी दुनिया में शहरों में वायु धुएं, फैक्ट्री जनित उत्सर्जन और ऊर्जासंयंत्रों के कारण नाना पदार्थों से घनीभूत हो रही है। कई शहरों में वायु की गुणवत्ता बहाल करने के नियम नहीं बनाये गए है। जहां ये नियम बनाये गए हैं वहां भी क्रियान्वयन बड़ा कमजोर है और राष्ट्रीय मानक विश्वस्वास्थ्य संगठन के मानकों से मेल नहीं खाते। "

 

·   यदि पीएम-10 कणों की औसत सालाना मात्रा 70 µg/m3 से घटकर 20 µg/m3 पर आ जाय तो वायुप्रदूषण से होने वाली मृत्यु की तादाद में 15 फीसदी की कमी की जा सकेगी।

 

·   विकसित और विकासशील, दोनों ही श्रेणियों के देशों में शहरी क्षेत्रों में आऊटडोर वायुप्रदूषण की बड़ी वजह मोटरवाहन, छोटी श्रेणी के मैन्युफैक्चरर्स, बायोमॉस और कोयले का प्रज्जवलन तथा ईंधन के रुप में कोयला का इस्तेमाल करने वाले ऊर्जा संयंत्र हैं।

·    साल 2008 में शहरी इलाकों में प्रदूषण के कारण विश्वभर में 10 लाख 34 हजार लोग असामयिक मृत्यु के शिकार हुए। अगर विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों( वायुप्रदूषण से संबंधित क्वालिटी गाईडलाईन- PM10=20μg/m3 and PM2.5=10 ) का पालन किया गया होता तो इसमें से 10 लाख 90 हजार जिन्दगियों को बचाया जा सकता था।

 

·   साल 2004 में शहरी क्षेत्रों में आऊटडोर वायु-प्रदूषण से 10 लाख 15 हजार लोगों की मृत्यु हुई। इसकी तुलना में साल 2008 में आऊटडोर वायु-प्रदूषण से मरने वालों की तादाद में 16 फीसदी का इजाफा हुआ है।

·     इस बढोतरी का कारण हाल के सालों में वायुप्रदूषण में होने वाली वृद्धि और शहरी क्षेत्रों का बढ़ना है।

 

·     दुनिया में वातावरणीय कारणों से होने वाली बीमारियों का हिस्सा 23% फीसदी है।

 

·     हर साल 20लाख लोग दुनिया में जलावन जनित धुएं से होने वाली बीमारी के कारण मरते हैं।

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इंटरनेशनल सेव द चिल्ड्रेन(यूके) द्वारा प्रस्तुत [insie]द नेक्स्ट रिवाल्यूशन- गीविंग एवरी चाईल्ड द चान्स टू सरवाईव[/inside]( 2009) नामक दस्तावेज के अनुसार-
http://www.savethechildren.in/custom/recent-publication/Everyonereport%281%29.pdf

-- दुनिया में बाल-मृत्यु की जितनी घटनाएं होती हैं उसमें 50 फीसदी यानी तादाद में आधी घटनाएं मात्र छह देशों भारत, नाईजीरिया, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑव कांगो, ईथोपिया, पाकिस्तान और चीन में घटती हैं।

-- जिस शिशु को ज्नम के बाद शुरुआती छह महीने में स्तनपान कराया गया हो उसके न्यूमोनिया से काल-कवलित होने की आशंका स्तनपान से वंचित शिशु की तुलना में 15 गुनी कम होती है।

-- विश्व स्वास्थ्य संगठन के आकलन के अनुसार कुल 57 देश ऐसे हैं जहां स्वास्थ्यकर्मियों का गंभीर रुप से अभाव है। इनमें एक देश भारत भी है जहां 20 लाख 60 हजार स्वास्थ्यकर्मियों की कमी है। 57 देशों में से 36 देश अफ्रीका के हैं।

-- विश्व में बाल-मृत्यु की कुल तादाद में 28% हिस्सा साफ-सफाई की कमी और संदूषित पेयजल से होने वाली मौतों का है।

--- विश्वबैंक के आंकड़ों के अनुसार वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण 200,000400,000 की अतिरिक्त सालाना तादाद में 2015 तक बाल-मृत्यु हो सकती है।

--साल 2008 में 80 लाख 80 हजार बच्चों (पाँच साल से कम उम्र के) की मृत्यु हुई।

-- बाल और मातृ-मृत्युगामिता से संबंधित सहस्राब्दि विकास लक्ष्य(साल 2015) को पूरा करने के लिए $3645 अरब अतिरिक्त रकम की आवश्यकता है। यह रकम उतनी ही है जितनी विश्व भर में उपभोक्ता बोतलबंद पानी पर साल भर में खर्च करते हैं।

-- पाँच साल की उम्र पूरी होने से पहले हर साल तकरीबन 90 लाख बच्चों की मृत्यु होती है। इसका अर्थ हुआ हर सेकेंड तीन बच्चों की मृत्यु। उन बच्चों में 40 लाख बच्चे ऐसे हैं जिनकी मृत्यु जन्म के पहले महीने में ही हो जाती है। अन्य 30 लाख बच्चों की मृत्यु जन्म के एक हफ्ते के अंदर होती है, जिसमें 20 लाख बच्चे ऐसे हैं जो जन्म के पहले दिन ही काल-कवलित होते हैं।

-- जन्म के पहले पाँच सालों में काल-कवलित होने वाले बच्चों में 97% फीसदी बच्चे निम्न या मध्य आयवर्ग वाले देशों के हैं।उन देशों में भी काल-कवलित होने वाले सर्वाधिक बच्चे हाशिए के समाजों से होते हैं।

-- अफगानिस्तान में पाँच बच्चे में से एक की मृत्यु उसके पांचवें जन्मदिन से पहले हो जाती है। उपसहारीय अफ्रीकी देशों में सात में से एक बच्चा जन्म के पांचवे साल से पहले मृत्यु का ग्रास बनता है।

-- बच्चों की मृत्यु की इस अत्यधिक तादाद की व्याख्या मुख्य रुप से तीन स्तरों पर की जाती है-

1. पाँच साल से कम उम्र में मरने वाले बच्चों में 90 फीसदी मामले ऐसे हैं जहां कारण के तौर पर बस कुछ ही बीमारियां मौजूद होती हैं। न्यूमोनिया, खसरा और एचआईवी-एड्स् ऐसी ही बीमारियां हैं, साथ ही इसमें प्रसवकालीन जटिलताओं और परिस्थितियों का भी योगदान होता है। प्रसवकालीन या प्रसवोपरांत मौजूद हालात खासतौर पर बच्चों की मृत्यु के लिए जिम्मेदार हैं। नवजात शिशुओं की जितनी संख्या विश्वभर में काल-कवलित होती है उसमें 86 फीसदी मामले ऐसे हैं जिसमें कारक होता है गंभीर संक्रमण, श्वांसरोध तथा असामयिक प्रसव। ऐसे मामलों में पर्याप्त चिकित्सीय इंतजाम द्वारा बच्चों को मृत्यु से बचाया जा सकता है।

2. जरुरी स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव, इन सुविधाओं के मौजूद होने के बावजूद माता या शिशु का सुविधाओं से वंचित रहना, प्रसति स्त्री तथा नवजात शिशुओं का गंभीर रुप से कुपोषण का शिकार होना, स्वच्छ पेयजल और साफ-सफाई से वंचित रहना, जननि-स्वास्थ्य-कर्म के बारे में जानकारी का अभाव तथा गर्भनिरोधकों की कमी जैसे कारणों से बाल-मृत्यु की आशंका ज्यादा बढ़ती है।

3. बालमृत्यु ऐसी घटना नहीं जिसपर काबू नहीं पाया जा सके। अधिकतर मामलों में बाल-मृत्यु की घटना के पीछे राजनीतिक फैसलों और नीतियों का हाथ होता है। इसके कुछ कारण पर्यावरणगत और सांस्कृतिक भी हैं। गरीबी, असमानता, महिलाओं और बालिकाओं के प्रति भेदभाव भरा व्यवहार ये सब कारक भी बाल-मृत्यु के लिए जिम्मेदार होते हैं।

-- प्रशासन की लापरवाही, हिंसात्मक संघर्ष तथा वातावरणीय प्रदूषण बच्चे के जीवन-सक्षम हो सकने की परिस्थिति पर नकारात्मक असर डालते हैं। अध्ययन में पाया गया है कि जिन 10 देशों में बाल-मृत्यु की संख्या सबसे ज्यादा है उनमें 8 देश ऐसे हैं जहां किसी ना किसी तरह का हिंसात्मक संघर्ष चल रहा है और जो राजनीतिक अस्थिरता के शिकार हैं।

-- विश्वबैंक का आकलन है कि साल 2009-2015 के बीच हर साल औसत से 200,000 से 400,000 बच्चे ज्यादा मरेंगे और इसकी वजह होगी वित्तीय-संकट तथा आर्थिक-मंदी। स्वाईन फ्लू का खतरा वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ सकता है और इसका असर भी बाल-मृत्यु पर पड़ेगा।

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विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रस्तुत प्रीवेंटिंग डीजीज थ्रू हैल्दी एन्वायर्नमेंट- टुआर्डस् ऐन् एस्टीमेट ऑव एन्वायर्नमेंट बर्डेन ऑव डीजीज नामक दस्तावेज के अनुसार- 

http://www.who.int/quantifying_ehimpacts/publications/preventingdisease.pdf



-  वैश्विक स्तर पर बीमारियों के बोझ( एक स्वस्थ व्यक्ति के जीवन-वर्ष की हानि) में तकरीबन 24 फीसदी हिस्सा उन बीमारियों का है जिसके कारक वातावरणीय हैं। इसी तरह वैश्विक स्तर पर बीमारियों से होने वाली असामयिक मौतों में 23 फीसदी हिस्सा वातावरणीय प्रदूषण से होने वाली बीमारियों का है।

-  विश्व-स्वास्थ्य संगठन ने कुल 102 बड़ी बीमारियों को साल 2004 के वर्ल्ड हैल्थ रिपोर्ट में एक श्रेणी में रखा था। संगठन ने अपनी रिपोर्ट में पाया कि इसमें 85 बीमारियां ऐसी हैं जिनका होने में वातावरणीय कारक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

-  वैश्विक स्तर पर देखें तो प्रति व्यक्ति स्वस्थ जीवन-आयु-वर्ष की हानि के मामले में वातावरणीय कारकों के कारण उत्पन्न होने वाली बीमारियों का असर बच्चों पर कहीं ज्यादा(बाकी आबादी की तुलना में 5 गुना) है। डायरिया, मलेरिया और श्वसन रोगों के कारक वातावरणीय हैं और इन बीमारियों से 0-5 साल के आयुवर्ग के बच्चों की भारी संख्या में मृत्यु होती है।

-  विकासशील देशों में 0-5 साल की उम्र के बच्चों की मृत्यु की कुल तादाद में 26 फीसदी हिस्सा डायरिया, मलेरिया और श्वसन रोग से होने वाली बीमारियों का है।

-  विकासशील देशों में 0-14 साल के आयुवर्ग में बीमारियों से जितने बच्चों की मृत्यु होती है, उसमें 36 फीसदी मृत्यु की घटनाओं में मुख्य वजह वातावरणीय कारकों से उत्पन्न होने वाली बीमारियां हैं।

-  वातावरणीय कारकों से होने वाली बीमारियों के बोझ में क्षेत्रवार विभिन्नता को लक्ष्य किया गया है। इसका एक बड़ा कारण स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता में विभिन्नता और वातावरण में पाया जाने वाला गुणात्मक अन्तर है। मिसाल के लिए विकासशील क्षेत्रों में वातावरणीय कारणों से होने वाली बीमारियां अगर मृत्यु की 25 फीसदी मामलों में जिम्मेदार हैं तो विकसित क्षेत्रों में यही संख्या 17 फीसदी है।

-  स्वस्थ आयु-वर्ष की हानि के मामले में जिन बीमारियों का असर सबसे ज्यादा है उनके नाम हैं- डायरिया, मलेरिया, फेफड़े के निचले हिस्से में होने वाले श्वसन रोग और अयाचित दुर्घटनावश लगने वाले चोट-चपेट।

-  डायरिया- डायरिया के 94% फीसदी मामलों में संदूषित पानी, साफ-सफाई की कमी और अस्वास्थ्यकर रहन-सहन जिम्मेदार है।

-  फेफड़े के निचले हिस्से में होने वाले रोग- इसका बड़ा कारण घरेलू जलावन से उत्पन्न धुआं और धूम्रपान जन्य धुआं है। विकसित देशों में फेफड़े के निचले हिस्से में होने वाली बीमारियों में 20 फीसदी मामले वातावरणीय कारकों से उत्पन्न होते हैं, विकासशील देशों में यह तादाद 42 फीसदी है।

-  अयाचित दुर्घटना- इसके अन्तर्गत कार्यस्थल पर लगने वाली चोट-चपेट, रेडियोधर्मी विकिरण और औद्योगिक-उत्पादन के क्रम में होने वाली दुर्घटना शामिल है। दुर्घटना के 44% फीसदी मामलों में कारक वातावरणजन्य पाये गए हैं।

-  मलेरिया-  भूमि के उपयोग, निर्वनीकरण, जल-संसाधनों के प्रबंधन, बसाहट की जगहों के चयन और आवासस्थल की बनावट से संबंधित नीतियों का गहरा असर मलेरिया जनित बोझ से है। मलेरिया के 42 फीसदी मामलों में उपर्युक्त कारक काम करते हैं।

-  वातावरणीय कारणों से होने वाली मौतों में पारपथ का ना होना, साईकिल सवारों के लिए सड़क पर यातायात व्यवस्था का अभाव या फिर पैदल यात्रियों के लिए कोई व्यवस्था का ना होना भी महत्वपूर्ण कारक है। दुर्घटनाओं से होने वाली जीवन-वर्ष की हानि में 40 फीसदी हिस्सा इस श्रेणी की दुर्घटनाओं का है।

-  वातावरणीय कारकों से प्रतिव्यक्ति स्वस्थ आयु-वर्ष की हानि के मामले विकसित देशों की तुलना में विकासशील देशों में 15 गुना ज्यादा हैं। वातावरणीय कारकों से उत्पन्न डायरिया और श्वसन रोग के मामले में .ह अन्तर कुछेक विकासशील देशों में 120 से 150 गुना तक ज्यादा है।

-  वातावरणीय कारकों से उत्पन्न कार्डियोवास्कुलर रोगों से विकसित विकासशील देशों में प्रतिव्यक्ति स्वस्थ आयु-वर्ष की हानि विकसित देशों की तुलना में 7 गुना ज्यादा होती है। कैंसर के मामले में यह अन्तर 4 गुना का है।  

 

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[inside]विमेन ऑन द फ्रन्ट लाइनस् ऑव हेल्थकेयर, स्टेट ऑव द वर्ल्डस् मदर[/inside] २०१० नामक दस्तावेज के अनुसार, http://www.savethechildren.in/files/SOWM2010_FullReport_email.pdf:
 

प्रति वर्ष विकासशील देशों में ५ करोड़ महिलाओं का प्रसव बगैर किसी प्रशिक्षित चिकित्सीय पेशेवर की देखभाल के होता है। विकासशील देशों में हर साल ८० लाख ८० हजार नवजात शिशु या बच्चे उन बीमारियों से मरते हैं जिनके उपचार सहज ही संभव है।


• विश्वस्तर पर देखें तो कुल ५७ देश ऐसे हैं जहां स्वास्थ्यकर्मियों की भारी कमी है। इसका आशय यह है कि इन देशों में १० हजार व्यक्तियों के लिए न्यूनतम जरुरी (२३ चिकित्सक, नर्स और धाय(मिडवाईफ)) चिकित्साकर्मियों की संख्या भी मौजूद नहीं है। उपरोक्त कुल ५७ देशों में ३६ देश उपसहारीय अफ्रीका में हैं। इन देशों में उपरोक्त कमी को पूरा करने के लिए २० लाख ४० हजार चिकित्साकर्मियों की जरुरत पड़ेगी।

• उपरोक्त कुल ५७ देशों में ३६ देश उपसहारीय अफ्रीका में हैं और इन देशों में विश्व की आबादी का कुल १२ फीसदी हिस्सा निवास करता है। इन्हीं देशों के बारे में एक तथ्य यह भी है कि विश्व में होने वाली बीमारियों का ३६ फीसदी हिस्सा इन्हीं के माथे है जबकि विश्व में मौजूद स्वास्थ्यकर्मियों का कुल ३ फीसदी हिस्सा इन देशों में मौजूद है।दक्षिण और पूर्वी एशिया में विश्व में मौजूद स्वास्थ्यकर्मियों का १२ फीसदी हिस्सा उपलब्ध है जबकि दुनिया के इस हिस्से में विश्व की बीमारियों का २९ फीसदी हिस्सा घटित होता है।

• जहां तक कुल शिशु मृत्यु का सवाल है, उसमें 41 फीसदी नवजात शिशु होते हैं जो जन्म के एक महीने के अंदर कालकवलित होते हैं।

• विकासशील देशों में जननि और नवजात दोनों को चिकित्सीय देखरेख बहुत कम उपलब्ध है। इस वजह से शिशु और मातृ-मृत्यु का ९९ फीसदी घटनाएं इन्हीं देशों में होती हैं।

• यदि सारी स्त्रियों और बच्चों को जरुरी चिकित्सीय देखरेख का पूरा पैकेज हासिल हो तो विश्व में सालाना ढाई लाख महिलाओं और साढ़े ५० लाख बच्चों की जिन्दगी बचायी जा सकती है।

• हर साल ८० लाख ८० हजार बच्चे ५ साल की उम्र पूरी करने से पहले मर जाते हैं।

• गर्भावस्था या प्रसवकालीन जटिलताओं के कारण हर साल  343,000 महिलाओं की मृत्यु होती है।
• सेहत से संबंधित सहस्राब्दी विकास लक्ष्य को पूरा करने और मानव जीवन को बचाने के लिए विकासशील देशो में अभी ४० लाख ३० हजार स्वास्थ्यकर्मियों की और जरुरत है।

• ग्याहरवें एनुअल मदर्स इन्डेक्स से १६० देशों (४३ विकसित ऍर ११७ विकासशील देश) में माताओं की स्थितियों को सूचीबद्ध किया गया है। इससे पता चलता है कि किन देशों में माताओं की स्थिति बेहतर और किन देशों में चकित्सीय देखभाल के लिहाज से बदतर है।

• इस सूची में न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया सहित योरीपीय देश अग्रणी है जबकि उपसहारीय अफ्रीकी देश सर्वाधिक पिछड़े।  
 
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[inside]रोईंग डेंजर ऑव नान-कम्युनिकेबल डिजीज- एक्टिंग नाऊ टू रिवर्स कोर्स[/inside](सितंबर 2011, वर्ल्ड बैंक) नामक दस्तावेज के अनुसार, http://siteresources.worldbank.org/HEALTHNUTRITIONANDPOPULATION/Resources/Peer-Reviewed-Publications/WBDeepeningCrisis.pdf:  

 

  • हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह, श्वास-रोग जैसी गैर-संक्रामक बीमारियों का खतरा निम्न और मध्यवर्ती आय वर्ग वाले देशों में बढ़ रहा है।.

 

  • उपसहारीय अफ्रीकी देशों में साल 2030 तक बीमारियों से काल-कवलित होने वाले कुल लोगों में 46 फीसदी गैर-संक्रामक बीमारियों के शिकार होंगे जबकि इन देशों में गैर-संक्रामक बीमारियों से होने वाली मौत की तादाद 2008 में 28 फीसदी थी। दक्षिण एशिया में गैर-संक्रामक बीमारियों से होने वाली मृत्यु की संख्या (कुल मृत्युसंख्या में) इसी अवधि में प्रतिशत पैमाने पर 51 से बढ़कर 72 फीसदी पर पहुंच जाएगी। इन मौतों में से कम से कम 30 फीसदी मामले ऐसे हैं जिन्हें उपचार के बदौलत रोका जा सकता है। दूसरी तरफ निम्न आयवर्ग में गिने जाने वाले देशों में एचआईवी , मलेरिया, टीबी जैसे संक्रामक रोगों का जोर बढ़ेगा।

 

 

  • निम्न और मध्य आयवर्ग में आने वाले देशों में गैर-संक्रामक बीमारियों का बोझ अर्थव्यवस्था, चिकित्सा-व्यवस्था , पारिवारिक और व्यक्तिगत लिहाज से बहुत ज्यादा है। ऐसे कई देशों में गैर-संक्रामक बीमारियां कम उम्र के लोगों को भी हो रही हैं और इस कारण बीमारी की अवधि में बढ़ोतरी हो रही है साथ ही कम उम्र में मृत्यु का शिकार होने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ी है। इसका दुष्परिणाम उत्पादकता पर पड़ रहा है।.

 

  • विकासशील देशों में गैर-संक्रामक रोगों का बड़ा कारण अरामतलब जीवनशैली, जीवन के पहले 1000 दिनों में कुपोषण का शिकार होना तथा अस्वास्थ्यकर भोजन( जैसे नमक, चीन और तेल-घी का ज्यादा इस्तेमाल) है। तंबाकू का सेवन और प्रदूषण का भी इन बीमारियों के कारण साबित हो रहे हैं।

 

  • साक्ष्यों से पता चलता है कि गैर-संक्रामक बीमारियों का बोझ आधा किया जा सकता है बशर्ते स्वास्थ्य-व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त हो और बीमारियों से बचने के बारे में प्रभावकारी कार्यक्रम लागू किए जायें। तंबाकू सेवन को हतोत्साहित करना मसलन उसपर कराधान ऊँचा रखना तथा नमक-चीनी का कम सेवन एवम् अप्रसंस्कृत खाद्य-पदार्थों के इस्तेमाल को हतोत्साहित करना इसका एक कारगर उपाय है।

 

  • साल 2030 तक मध्य आयवर्ग में आने वाले देशों में कैंसर की तादाद 70 फीसदी तक बढ़ सकती है और निम्न आयवर्ग वाले देशों में यह इजाफा 82 फीसदी तक हो सकता है।

 

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  • दक्षिण एशिया में बीमारियों से होने वाली मौतों का एक बड़ा कारण कार्डियोवास्कुलर रोग हैं।दक्षिण एशिया में प्रथम हार्ट-अटैक औसतन 53 साल की उम्र के लोगों को होता है जबकि शेष विश्व में इसकी औसत उम्र 59 साल है।

 

  • एक हाल के अध्ययन में बताया गया है कि भारत में गैर-संक्रामक रोगों का असर क्या पड़ता है। इस अध्ययन के अनुसार अगर भारत से गैर-संक्रामक रोगों को खत्म कर दिया गया होता तो भारत की 2004 की जीडीपी 4 से 10 फीसदी ज्यादा होती।.

 

  • साल 1995-1996 से 2004 के बीच गैर-संक्रामक रोगों के उपचार पर लोगों की जेब से होने वाले खर्च में 15 फीसदी का इजाफा हुआ है। 2004 में गैर-संक्रामक रोगों के उपचार पर लोगों ने अपनी जेब से 47 फीसदी खर्च किया जबकि पहले यही संख्या 32 फीसदी की थी।इसके अतिरक्त इस खर्चे का 40 फीसदी हिस्सा उधार के रुप में जुटाना पडा या फिर जेवर-जमीन आदि चीजें बेचकर।
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[inside]राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण यानी नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे[/inside](एमएफएचएस)-३ (२००५-०६) के अनुसार-(http://pib.nic.in/release/release.asp?relid=31835

एनएफएचएस-३ के आकलन के मुताबिक महिलाओं में पोषण की दशा उतार पर है। 

  • एनएफएचएस-३ के आकलन के अनुसार भारत में प्रजनन-स्वास्थ्य की स्थिति पहले की तुलना में थोड़ी बहुत सुधरी है। महिलाएं पहले की तुलना में कम संतान की मां बन रही हैं और शिशु मृत्यु दर भी १९९८-९९ के एनएफएचएस सर्वे की तुलना में घटा है।
  • व्यस्कों और बच्चों में एनीमिया(खून में लौह-तत्व की कमी) और कुपोषण का प्रसार अब भी बहुत ज्यादा है। हालांकि यह तथ्य यहां असंगत जान पड़ सकता है मगर सर्वेक्षण में पाया गया कि शहरों में अधिकतर व्यस्क- (खासकर महिलाएं) सात साल पहले हुए सर्वेक्षण की तुलना में या तो सामान्य से ज्यादा वजन के हैं या फिर मोटे हैं।

परिवार नियोजन की तस्वीर

  • एनएफएचएस-२ के बाद से जनन-दर में लगातार कमी आयी है और यह २.९ शिशु से घटकर २.७ शिशु के औसत पर चली आयी है। जनन-दर दस राज्यो में (इनमें अधिकतर दक्षिण भारत के हैं) रिप्लेसमेंट लेबल या फिर रिप्लेसमेंट लेबल से नीचे चला आया है। रिप्लेसमेंट लेबल- जनन-दर का वह स्तर जब एक पीढ़ी अपनी परवर्ती पीढ़ी का स्थान लेती है। विकसित देशों में प्रति महिला यह दर २.१ शिशु की है लेकिन जिन देशों में शिशु और बाल मृत्यु दर ज्यादा है वहां २.१ से ज्यादा का औसत लिया जाता है। ज्यादा जानकारी के लिए देखें-http://www.ncbi.nlm.nih.gov/pubmed/7834459) 
  • जनन-दर में कमी की दिशा में एक बाधा यह है कि एक बड़ी आबादी के भीतर नर-शिशु जनने के लिए ललक बनी हुई है। एनएफएचएस -३ में दो लड़कियों(और कोई लड़का नहीं) की मां बन चुकी ६२ फीसदी महिलाओं ने कहा कि वे अब और संतान पैदा करना नहीं चाहतीं जबकि एनएफएचएस-२ में महज ४२ फीसदी महिलाओं ने यह बात कही थी।
  • गर्भनिरोधकों के बढते चलन के कारण जनन-दर में कमी आयी है। ऐसा पहली बार हुआ है कि देश में आधी से ज्यादा नवविवाहित महिलाएं गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल कर रही हैं। एनएफएचएस-२ के दौरान ४३ फीसदी महिलाएं गर्भनिरोधक के आधुनिक साधनों का इस्तेमाल कर रही थीं जबकि एनएफएचएस-३ में ४९ फीसदी महिलाएं। 
  • विवाह की औसत आयु में बढ़ोत्तरी हुई है-जनन दर में कमी का यह भी एक कारण है। सात साल पहले यानी एनएफएचएस -२ के दौरान पता चला थी कि २०-२४ की उम्र वाली ५० फीसदी महिलाओं का ब्याह १८ साल से कम उम्र में हुआ जबकि एनएफएचएस-३ के दौरान यह आंकड़ा घटकर ४५ फीसदी पर जा पहुंचा। विवाह की औसत आयु में इजाफा होने के कारण पिछले सात सालों में पहले प्रसव की औसत आयु में भी ६ महीने की (१९.८ साल) बढो़तरी हुई है. 


आधी से ज्यादा महिलाओं की गर्भावस्था और प्रसव के दौरान समुचित चिकित्सीय देखभाल नहीं होती।

  • गर्भावस्था के दौरान चिकित्सीय देखभाल के मामले में गांव और शहर की महिलाओं के बीच काफी अन्तर है। शहर की ७४ फीसदी महिलाओं को प्रसव से पहले कम से कम तीन दफे की अनिवार्य डॉक्टरी देखभाल हासिल होती है जबकि ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं के लिए यह आंकड़ा ४३ फीसदी का है। ऐन प्रसव के समय किसी प्रशिक्षित व्यक्ति की सहायता मिलने की घटना में पिछले सात सालों में ४३ फीसदी के मुकाबले ४९ फीसदी का इजाफा हुआ है।लेकिन यहां भी शहर और गांव की महिलाओं के बीच अंतर स्पष्ट है। एनएफएचसी-३ के दौरान पाया गया कि सिर्फ ग्रामीण इलाके में सिर्फ ३९ फीसदी महिलाओं को प्रसव के दौरान किसी प्रशिक्षित व्यक्ति की सहायता मिल पाती है जबकि शहरी इलाके में ७५ फीसदी महिलाओं को यह सहायता हासिल होती है। 
  • पिछले सात सालों के दौरान अस्पताल में प्रसव करने की तादाद ३४ फीसदी से बढ़कर ४१ फीसदी हो गई है लेकिन अधिकांश महिलाएं अब भी घर में प्रसव करने को मजबूर हैं। प्रसूतियों में सिर्फ एक तिहाई को प्रसव के दो दिन के अंदर प्रसवोपरांत दी जाने वाली मेडिकल देखभाल हासिल हो पायी।

शिशु-मृत्यु दर में कमी आयी है लेकिन पूर्ण टीकाकरण कवरेज में कोई खास प्रगति नहीं हुई है।

  • शिशु-मृत्यु दर में लगातार कमी आ रही है। साल १९९८-९९ में प्रति हाजार नवजात शिशुओं में ६८ शिशु काल कवलित हुए जबकि साल २००५-०६ में ५७ नवजात शिशु।
  • बिहार,  गोवा,  हरियाणा,  जम्मू-कश्मीर, मेघालय, उड़ीसा, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु और उत्तरप्रदेश में शिशु-मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी आयी है।
  • सात साल पहले १२-१३ महीने के नवजात शिशुओं में महज ४४ फीसदी को सभी रोग-प्रतिरोधी टीके लगाने में सफलता मिली थी लेकिन एनएफएचएस-३ के दौरान यह आंकड़ा बढकर ४४ फीसदी हो गया। 
  • डीपीटी के टीके को छोड़कर अन्य सभी टीकों को लगाने की घटना में अच्छी बढो़तरी हुई है। डीपीटी का टीका लगाने की घटना में एनएफएचएस-२ और एनएफएचएस-३ के बीच की अवधि में कोई खास प्रगति नहीं हुई है।
  • पोलियो टीकाकरण अभियान के अन्तर्गत पोलियो की दवा पिलाने का दायरा बढ़ा है फिर भी १२-१३ महीने के लगभग एक चौथाई शिशुओं शिशुओं को दवा पिलाने के मामले में तीन खुराक के मानक का पालन नहीं किया जा सका है। 
  • टीकाकरण करने की घटना में हुई प्रगति को राज्यवार देखें तो उनके बीच बहुत ज्यादा का अंतर मिलेगा। ११ राज्य ऐसे हैं जहां पूर्ण टीकाकरण के अभियान में कमी आयी है क्योंकि इन राज्यों में डीपीटी का टीका और पोलियो की खुराक देने के मामले में खास प्रगति नहीं हो पायी है। 
  • इस सिलसिले में सबसे ज्यादा गिरावट महाराष्ट्र, मिजोरम, आंध्रप्रदेश और पंजाब में देखने में आयी। दूसरी तरफ पूर्ण टीकाकरण की दिशा में बिहार, छ्तीसगढ़, झारखंड, सिक्किम और पश्चिम बंगाल में अच्छी प्रगति हुई है। पूर्ण टीकाकरण की दिशा में असम, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, मध्यप्रदेश, मेघालय और  उत्तरांचल में भी एनएफएचएस-२ के मुकाबले एनएफएचएस-३ में उल्लेखनीय प्रगति देखने में आयी। 
  • बच्चों में डायरिया अब भी एक बड़ी चुनौती है। हालांकि एक बड़ी संख्या में माताएं ओआरएस घोल (ओरल डीहाईड्रेशन साल्टस्) के बारे में जानती हैं लेकिन डायरिया की स्थिति में मात्र ५८ फीसदी बच्चों को ही किसी चिकित्सा केंद्र में ले जाया गया। सात साल पहले यह आंकड़ा ६५ फीसदी का था।


साल १९९१ से २००५-०६ के बीच डिस्पेंसरी, अस्पताल (प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सहित) , डाक्टर और नर्सिग कर्मचारियों की संख्या में बढो़तरी हुई है। इसे नीचे दी गई सारणी में देखा जा सकता है।  

स्वास्थ्य सुविधाएं-एक नजर

  1991
 2005/2006
 SC/PHC/CHC (March 2006)  57353  171567
 Dispensaries and Hospitals (all) (1.4.2006)  23555  32156
 Nursing Personnel (2005)  143887  1481270
 Doctors (Modern System) (2005)  268700  660801

स्रोत-इकॉनॉमिक सर्वे २००७-०८
http://indiabudget.nic.in/es2007-08/chapt2008/chap106.pdf

 

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[inside]स्वास्थ्य एवम् परिवार कल्याण मंत्रालय के दस्तावेज के अनुसार[/inside]-
(
http://mohfw.nic.in/NRHM/Documents/Mission_Document.pdf

  • साल १९९० में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा पर जीडीपी का १.३ फीसद खर्च किया गया था जो साल १९९९ में घटकर ०.९ फीसदी पर पहुंच गया। स्वास्थ्य के मद में केंद्रीय बजट में १.३ फीसदी का आबंटन है ।
  • केंद्र सरकार सार्वजनिक स्वास्थ्य के मद में होने वाले खर्चे का १५ फीसदी वहन करती है जबकि राज्यों की हिस्सेदारी इस खर्चे में ८५ फीसदी की है। 
  • पोषाहार संबंधी स्वास्थ्य कार्यक्रम और परिवार कल्याण संबंधी कार्यक्रमों में जमीनी स्तर पर तालमेल बहुत कम है।
  • स्वास्थ्य कार्यक्रमों में जवाबदारी की कमी है। वे ज्यादा प्रभावकारी सिद्ध नहीं हो रहे . 
  • पेयजल, साफ-सफाई और पोषाहार के कार्यक्रमों में आपसी तालमेल का अभाव है।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य के मामले में क्षेत्रीय स्तर पर विषमताएं मिलती हैं। 
  • बढ़ती हुई आबादी में स्थिरता लाना अब सभी एक बड़ी चुनौती है।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य की निदानकारी सेवाएं गरीबों की पक्षधर नहीं हैं। देश की सर्वाधिक गरीब आबादी पर अगर सरकार स्वास्थ्य के मद में १ ऱुपये खर्च करती है तो ३ रुपये अमीर आबादी वाले हिस्से पर। 
  • केवल १० फीसदी भारतीयों के पास एक ना एक तरह का स्वास्थ्य बीमा है और ये बीमा भी उनकी जरुरतों के अनुकूल नहीं है। 
  • अस्पताल में भरती भारतीय अपनी कुल सालाना आमदनी का लगभग ५८ फीसदी स्वास्थ्य सेवा हासिल करने के लिए खर्च कर डालते हैं।
  • अस्पताल में भरती होने पर लगभग ४० फीसदी भारतीय लोगों को या तो कर्ज या उदार लेना पड़ता है या अपनी संपत्ति बेचनी या रेहन रखनी पड़ती है। 
  • अस्पताल में भरती होने पर खर्च इतना ज्यादा आता है कि लगभग २५ फीसदी भारतीय मात्र इसी कारण गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं।

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वॉलेंटेरी हैल्थ एसोशिएशन ऑफ इंडिया,नई दिल्ली द्वारा प्रस्तुत [inside]गवर्नेंस ऑव द हैल्थ सेक्टर इंडिया-हैज द स्टेट एबडिकेटेड इटस् रोल?[/inside] नामक दस्तावेज(२००८) के अनुसार-

  • इस रिपोर्ट में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में मची मौजूदा गड़बड़ का जायजा लिया गया है और निपटने के रास्ते सुझाये गये हैं। रिपोर्ट का मुख्य जोर सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में सरकारी धन के निवेश और स्वास्थ्य व्यवस्था को सुचारु रुप से चलाने के तौर तरीकों पर दिया गया है।
  • रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के विभिन्न हिस्सों के बीच सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के कामकाज और उनकी प्रभावकारिता में बड़ा अन्तर है। देश में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की दशा दयनीय है और अंतर्राष्ट्रीय पैमाने पर देखें तो स्वास्थ्य के मद में प्रति व्यक्ति खर्च देश में कम है और अलग-अलग राज्यों का स्तर इस मामले में अलग-अलग है।
  • केरल,  महाराष्ट्र, हिमाचलप्रदेश और तमिलनाडु में देश की १८.८ फीसदी जनसंख्या निवास करती है और यहां स्वास्थ्य सूचकांक मंझोली आमदनी वाले विकसित देशों मसलन वेनेजुएला, अर्जेन्टीना और सऊदी अरब के बराबर है। दूसरी तरफ बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, उड़ीसा और असम जैसे राज्य है जहां देश की ४३ फीसदी से ज्याजा जनसंख्या निवास करती है और इन राज्यों में स्वास्थ्य का सूचकांक सूड़ान, नाइजीरिया और म्यांमार जैसे कम आमदनी वाले देशों तथा अफ्रीका के सबसे गरीब कहे जाने वाले देशों जैसी दयनीय स्थिति का बयान करता है।
  • जिन राज्यों में स्वास्थ्य सूचकांक की दशा दयनीय है उन राज्यों स्वास्थ्य व्यवस्था पर सरकारी खर्चा भी कम है। उत्तरप्रदेश में सरकार प्रत्येक व्यक्ति के स्वास्थ्य पर सरकार सालाना महज ८४ रुपये खर्च करती है यानी व्यक्ति के कुल स्वास्थ्य व्यय का लगभग साढ़े सात प्रतिशत।
  • डॉक्टरों की संख्या कम होना खुद में एक बड़ी समस्या है। देश में एक हजार की आबादी पर महज ०.६ एमबीबीएस डॉक्टर उपलब्ध हैं। दूसरे ये डाक्टर दक्षिण के राज्यों अथवा धनी राज्यों में ज्यादा हैं। पंजाब में यूपी की तुलना में पांच गुना ज्यादा एमबीबीएस डाक्टर हैं। ठीक इसी तरह डाक्टरों की अधिकतर मौजूदगी ग्रामीण के बजाय शहरी इलाकों में है।
  • राज्यवार अगर मेडिकल कॉलेज की मौजूदगी देखें तो राज्यों के बीच इस मामले में काफी अन्तर मिलेगा। दक्षिण के कुल राज्यों में देश के ६३ फीसदी मेडिकल कॉलेज और ६७ फीसदी सीटें हैं। चिकित्सकों की संख्या में खास कमी बीमारु कहे जाने वाले राज्यों के अतिरिक्त झारखंड, छ्तीसगढ़, पूर्वोत्तर के राज्य, उड़ीसा और हरियाणा में है। .
  • सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के अन्तर्गत जो चिकित्सा सेवा मुहैया करायी जाती है वह गुणवत्ता के पैमाने पर खरा नहीं उतरती ।डॉक्टर, नर्स, दंत चिकित्सक तथा अन्य चिकित्साकर्मियों के लिए बनाये गए विधायी परिषद सुचारु रुप से काम नहीं कर रहे। इस कारण गरीब जनता निजी क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवा लेने के लिए बाध्य है।गरीब राज्यों के निर्धन लोग सरकारी स्वास्थ्य सेवा की मौजूदगी प्रयाप्त ना होने के कारण निजी क्षेत्र की सेवा लेने के लिए मजबूर हैं। इस तरह गरीब व्यक्ति को बीमार पड़ने की दशा में अगर अस्पताल में भरती करने की नौबत आती है तो उसकी आमदनी (जो पहले ही बहुत कम है) का एक बड़ा हिस्सा इसी में खर्च होता है। रिपोर्ट में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के आंकड़े के हवाले के हवाले से कहा गया है कि बिहार और उत्तरप्रदेश में बिहार में रोग के गंभीर होने की दशा में जिन व्यक्तियों को अस्पताल में दाखिल होना पड़ता है उसमें से एक तिहाई लोग सिर्फ स्वास्थ्य के मद में होने वाले खर्च के कारण उन्हे गरीबी रेखा के नीचे जाना पड़ेगा।
  • दवाइयों के दाम में तेजी गति से बढ़ोतरी हुई है। मरीज को उपचार के क्रम में अपनी खर्च का ७५ फीसदी हिस्सा औसतन दवाइयों की खरीद पर व्यय करना पड़ता है। उड़ीसा में यह आंकड़ा ९० फीसदी का है और राजस्थान, बिहार तथा यूपी में इससे थोड़ा ही कम । कुछ राज्यों में दवाइयों की खरीद पर रोगियों को ६१ फीसदी से कम खर्च करना पडता है जिससे संकेत मिलते हैं कि इन राज्यों में स्वास्थ्य सेवा बाकी राज्यों की तुलना में ज्यादा अच्छी है।
  • दवाइयों के दाम बढ़ने के कई कारण हैं। इनमें प्रमुख हैं- नये पेटेंट कानून, दवा निर्माताओं के ऊपर कानूनों का उचित तरीके से लागू ना होना और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक दवाओं का बाजार में प्रचलित होना।
  • ग्रामीण स्वास्थ्य योजना को असरदार तरीके से लागू करने के मामले में सबसे पीछे रहने वाले राज्यों के नाम हैं-यूपी, झारखंड और असम।

नीचे के आरेख से जाहिर होता है कि अमेरिका, चीन और ब्राजील की तुलना में भारत में लोगों को स्वास्थ्य सेवा हासिल करने के लिए अपनी जेब से कहीं ज्यादा रकम खर्च करनी पड़ती हैः
साल २००५ में स्वास्थ्य के मद में खर्च ( जीडीपी में हिस्से के रुप में)
graf2

स्रोत-:वर्ल्ड हैल्थ रिपोर्ट, ड्ब्ल्यूएचओ, २००८

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रस्तुत प्राइमरी हैल्थ केयर-नाऊ मोर दैन एवर नामक रिपोर्ट के अनुसार-

  • सबसे धनी और सबसे गरीब मुल्कों के बीच आयु-संभाविता (लाइफ-एक्सपेंटेंसी) के मामले में अन्तर ४० साल का है। अनुमान के मुताबिक इस साल (२००८)  १३ करोड़ ६० लाख महिलाएं प्रसूति होंगी और इनमें ५ करोड़ ८० लाख को प्रसव के समय या उसके बाद भी कोई चिकित्सीय सहायता नहीं मिल पाएगी। इस तरह नवजात शिशु और जन्मदाता मां की जान को खतरा होगा। .
  • विश्व के फलक पर देखें तो किसी देश में स्वास्थ्य के मद में प्रति व्यक्ति सालाना सरकारी खर्चा २० डॉलर का है तो किसी देश में ६००० डॉलर का। कम या फिर मंझोले दर्जे की आमदनी वाले देशों में निवार करने वाली ५.६ अरब आबादी बीमार पड़ने पर कुल खर्चे का आधा अपनी जेब से  देने के लिए मजबूर है।
  • साल १९७८ में जितने लोगों को स्वास्थ्य सेवा हासिल हो पाती थी और जितने लोग उपचार के बाद स्वास्थ्य लाभ कर लेते थे आज उतने लोगों को भी यह नसीब नहीं है।
  • स्वास्थ्य सेवा को सुधारने, बीमारियों से लड़ने और आयु संभाविता बढ़ाने  की दिशा में बड़ी प्रगति हो रही है लेकिन विश्व भर के नागरिक मौजूदा स्वास्थ्य व्यवस्था से असंतुष्ट हैं और उनकी अंसुतुष्टी को टाला नहीं जा सकता क्योंकि हर साल १० करोड़ की तादाद में लोग सिर्फ स्वास्थ्य सेवा पर खर्चे के कारण गरीबी के चंगुल में पड़ जाते हैं। लाखों लोग ऐसे हैं जिन्हें स्वास्थ्य सेवा हासिल ही नहीं होती।
  • स्वास्थ्य सेवाओं का ज्यादा जोर बीमार को उपचार मुहैया कराने पर है और इस क्रम में लोगों को सेहतमंद बनाने की दिशा में किए जा रहे प्रयास खास नहीं हो पाते जबकि अगर रोगों की रोकथाम और लोगों को सेहतमंद बनाने पर जोर दिया जाय तो बीमार पड़ने पर उपचार के मद में होने वाले खर्चे में वैश्विक स्तर पर ७० फीसदी की कमी आएगी। थोड़े में कहें तो स्वास्थ्य सेवाओं में बरताव के स्तर पर गैर-बराबरी है, आपसी तालमेल का अभाव है और ये सेवाएं कारगर नहीं हैं।
  • प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने का मतलब होता है घर से लेकर अस्पताल तक हर स्तर पर व्यक्ति को स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराना और इसमें जितना जोर निदान पर होता है उतना ही जोर उन स्थितियों को तैयार करने पर कि लोग बीमारी से बचे रहें। .
  • स्वास्थ्य सेवा में तभी बराबरी का मूल्य माना जाएगा जब हरेक व्यक्ति को उसकी जरुरत के मुताबित स्वास्थ्य सेवा हासिल हो सके भले ही स्वास्थ्य सेवाओं को खरीदने की उसकी ताकत चाहे जितनी हो। अगर ऐसा नहीं हो पाता तो दो व्यक्तियों की जीवन संभाविता में अन्तर बना रहेगा। ब्राजील ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के निर्देशों के अनुसार सबको स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने की दिशा में प्रयास किए हैं और वहां ७० फीसदी आबादी को अब ये सुविधा हासिल हो चुकी है।
  • स्वास्थ्य सेवा लोकोन्मुखी होनी चाहिए और उसमें लोगों की जरुरतों का ध्यान रखा जाना चाहिए। स्वास्थ्य सेवाओं को समुदाय की जीवन शैली से जोड़कर देखने की जरुरत है। इस्लामी गणराज्य ईरान १७ हजार हैल्थ हाऊस चल रहे हैं और एक हैल्थ हाऊस का जिम्मा १५०० लोगों की देखभाल का है। हैल्थ हाऊसों की इस व्यवस्था से ईरान में बाल मृत्यु दर में तेजी से कमी आयी है। वहां १९९० में आयु संभाविता ६३ साल थी जो २००६ में बढ़कर ७१ साल हो गई। क्यूबा में पॉलीक्लीनिक की व्यवस्था के कारण वहां आयु संभाविता ७८ साल है जो विश्व के किसी भी विकासशील देश से ज्यादा है।
Recommendations of the Commission on Social Determinants of Health
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Source: 2008 World Health Report, WHO