Resource centre on India's rural distress
 
 

सार्वजनिक वितरण प्रणाली

वित्त मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत[inside]इकॉनॉमिक सर्वे 2015-16[/inside] के खंड 1 और खंड 2 के तथ्यों के अनुसार :

http://indiabudget.nic.in/es2015-16/echapter-vol1.pdf

http://indiabudget.nic.in/es2015-16/echapter-vol2.pdf 

 

• साल 2014-15 में खाद्यान्न(गेहूं और चावल) का उपार्जन 56.9 मिलियन टन से बढ़कर 60.2 मिलियन टन हो गया है जबकि पीडीएस के माध्यम से खाद्यान्न का ऑफटेक 59.8 मिलियन टन से घटकर 55.9 मिलियन टन हो गया है. खाद्यान्न का उपार्जन बढ़ने के बावजूद ऑफटेक का घटना खाद्यान्न की समय पर उपलब्धता के अभाव तथा खाद्यान्न की गुणवत्ता में कमी की तरफ इशारा करता है. 

 

•  देश में 2005-06 में खाद्य सब्सिडी 23071 करोड़ रुपये थी जो 2015-16 में बढ़कर 1,05,509.41 करोड़ रुपये हो गई. भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन, उच्च प्रशासनिक लागत तथा कालाबाजारी के कारण पीडीएस पर होने वाले खर्चे में इजाफा हुआ है..

 

•  कमीशन ऑफ एग्रीकल्चरल कॉस्ट फॉर प्राइसेज की रिपोर्ट के अनुसार उपार्जन, वितरण तथा भंडारण, हाल के सालों में उपार्जन की बढ़ी हुई मात्रा तथा खाद्यान्न की आर्थिक लागत और केंद्रीय इश्यू प्राइस(निर्गमित मूल्य) के बीच बढ़ते अंतराल के कारण खाद्य सब्सिडी में ज्यादा इजाफा हुआ है. 

 

• इकॉनॉमिक सर्वे 2015-16 के तथ्यों से पता चलता है कि 2011-12 से लगातार न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि हुई है.

 

• साल 2014-15 से 2015-16 के बीच सामान्य श्रेणी के धान तथा ग्रेड ए श्रेणी के धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य में 3.7 प्रतिशत और 3.6 प्रतिशत की बढ़त हुई है. इस अवधि में गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य में 5.2 प्रतिशत की बढ़त हुई है. 

 

•  आर्थिक सर्वे में कहा गया है कि एमएसपी / उपार्जन आधारित मौजूदा पीडीएस प्रणाली की जगह डीबीटी प्रणाली लाना ठीक रहेगा, साथ ही बाजार को घरेलू तौर पर और आयात के लिए पूरी तरह खोलना उचित कहलाएगा.

 

•  आर्थिक सर्वे के अनुसार ज्यादातर राज्यों में पीडीएस अब डिजिटलीकृत हो चुका है. पीडीएस प्रणाली में आपूर्ति की कड़ी से जुड़े एजेंट अपने हितों के बाधित होने की सूरत में जनधन, आधार तथा मोबाइल फोन के समन्वय से चलने वाली वितरण प्रणाली को आघात पहुंचा सकते हैं. सार्वजनिक वितरण प्रणाली की दुकानों में बायोमीट्रिक सत्यापन के जरिए काम करने वाली प्वाइंट ऑफ सेल मशीन लगाने की दिशा में मिली कम सफलता इस बात का संकेत करती है. 

 

• प्वाइंट ऑफ सेल मशीन के जरिए लाभार्थी अपनी अंगुली की बायोमीट्रिक पहचान कराते हैं और सत्यापित होने पर उन्हें अनुदानित मूल्य का अनाज दिया जाता है. यह प्रयोग आंध्रप्रदेश के कृष्णा जिले में सफल साबित हुआ है, कालाबाजारी में कमी आई है. 

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•  गरीब जन के उपभोग-बस्ते में किरोसिन के उपभोग का हिस्सा मात्र एक प्रतिशत होता है, पीडीएस के जरिए दिए जा रहे किरोसिन के 50 प्रतिशत हिस्सा का उपभोग अपेक्षाकृत संपन्न जन कर रहे हैं यानी किरोसिन पर दी जाने वाली सब्सिडी का 50 प्रतिशत सपन्न तबके के हिस्से में जा रहा है.

 

• पंजाब और हरियाणा में धान और गेहूं की खेती करने वाले सभी किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य से संबंधित नीति के प्रति आगाह हैं लेकिन दलहन की खेती करने वाले बहुत कम ही किसान जानते हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की नीति दलहनी फसलों के लिए भी है. गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्रप्रदेश तथा झारखंड में 50 प्रतिशत या इससे कम ही किसानों ने कहा कि उन्हें धान या गेहूं के लिए जारी न्यूनतम समर्थन मूल्य की नीति की जानकारी है.

 

•  न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खाद्यान्न की सरकारी खरीद में धान, गेहूं तथा गन्ना पर विशेष बल है, यहां तक कि दलहन और तेलहन की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीद को भी तवज्जो नहीं दी जाती. इस वजह से धान और गेहूं का अतिरिक्त भंडारण तो तय सीमा से ज्यादा हो जाता है लेकिन भरपूर आयात के बावजूद दलहन और तेलहन के दामों पर नियंत्रण रख पाना मुश्किल हो जाता है.  

 

• ज्यादातर राज्यों में अधिकतर फसलों की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य पर नहीं होती. इससे संकेत मिलता है कि किसान अतिरिक्त फसलों की उपज को स्थानीय खरीदारों को या तो एमएसपी से ज्यादा मूल्य पर या फिर कम मूल्य पर बेच रहे हैं. अगर विकल्प ना होने की स्थिति में किसान कम मूल्य पर उपज बेच रहे हैं तो फिर इससे संकेत मिलता है क्षेत्रीय स्तर पर खेती से होने वाली आमदनी में अन्तर पैदा हो रहा है. 

 

 

नेशनल सैंपल सर्वे के 68 वें दौर की गणना पर आधारित रिपोर्ट:  [inside]पीडीएस एंड अदर सोर्सेज ऑफ हाऊसहोल्ड कंजप्शन, 2011-12 ( जून 2015 में प्रकाशित)[/inside], के तथ्यों के अनुसार:

http://mospi.nic.in/Mospi_New/upload/report_565_26june2015.pdf 

• साल 2011-12 में चावल के उपभोग में पीडीएस की हिस्सेदारी ग्रामीण इलाके में लगभग 27.9% तथा शहरी अंचल में 19.6% थी। गेहू या आटे की खपत में पीडीएस की हिस्सेदारी ग्रामीण अंचल में 17.3% तथा शहरी अंचल में 10.1% थी।

---  ग्रामीण क्षेत्रों में चीनी की खपत में पीडीएस के जरिए हुई खरीदारी का हिस्सा 15.8% तथा शहरी क्षेत्र में 10.3% है। दूसरी तरफ मिट्टी के तेल की खपत के मामले में पीडीएस से हुई खरीदारी का हिस्सा ग्रामीण अंचलों में 80.8% तथा शहरी क्षेत्र में 58.1% है।

चावल:  राज्यवार पीडीएस का उपयोग

•  राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो ग्रामीण अंचल के तकरीबन 46 प्रतिशत तथा शहरी अंचल के तकरीबन 23 प्रतिशत परिवारों ने कहा कि उन्होंने बीते 30 दिनों के भीतर सरकारी राशन दुकान से चावल की खरीद की है।

•  जिन राज्यों के ग्रामीण अंचलों में सरकारी राशन दुकान से चावल की खरीद बहुत ज्यादा हुई उनके नाम हैं तमिलनाडु (89% परिवार),  आंध्रप्रदेश (87% परिवार), केरल (78% परिवार) तथा कर्नाटक (75% परिवार).

•  चावल की खपत में पीडीएस के मार्फत हुई खरीददारी का हिस्सा सबसे ज्यादा तमिलनाडु ( ग्रामीण: 53%,  शहरी: 43%) का रहा। इसके बाद कर्नाटक ( ग्रामीण: 45%,  शहरी: 25%), छत्तीसगढ़ ( ग्रामीण: 38%,  शहरी: 30%),  केरल ( ग्रामीण: 36%,  शहरी: 30%)  तथा आंध्रप्रदेश ( ग्रामीण: 33%,  शहरी: 22%) का स्थान है।.

---  पश्चिम बंगाल जहां चावल मुख्य आहार है, पीडीएस के मार्फत हुई खरीदारी का हिस्सा बहुत कम (ग्रामीण: 10%,  शहरी: 6%) है.

गेहूं/ आटा:  विभिन्न राज्यों में पीडीएस के जरिए उपभोग

• राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो ग्रामीण अंचल के तकरीबन 34 प्रतिशत तथा शहरी अंचल के तकरीबन 19 प्रतिशत परिवारों ने कहा कि उन्होंने बीते 30 दिनों के भीतर सरकारी राशन दुकान से चावल की खरीद की है।

• महाराष्ट्र(40 प्रतिशत), मध्यप्रदेश(36 प्रतिशत) तथा गुजरात (32 प्रतिशत) के ग्रामीण अंचलों में पीडीएस के जरिए गेहूं या आटे की खरीद करने वाले परिवारों की संख्या अन्य राज्यों की तुलना में बहुत ज्यादा है।

•  मध्य प्रदेश के शहरी अंचल के तकरीबन 23 प्रतिशत परिवारों ने पीडीएस के मार्फत अपना मुख्य खाद्याहार गेहूं हासिल किया।

चीनी:  राज्यवार पीडीएस के जरिए उपभोग

• चीनी की खपत में पीडीएस के मार्फत हुई खरीददारी का हिस्सा सबसे ज्यादा तमिलनाडु ( ग्रामीण: 90%,  शहरी: 77%) का रहा। इसके बाद आंध्रप्रदेश ( ग्रामीण: 82%,  शहरी: 42%), असम ( ग्रामीण: 71%,  शहरी: 41%),  छत्तीसगढ़ ( ग्रामीण: 66%,  शहरी: 36%)  तथा कर्नाटक ( ग्रामीण: 67%,  शहरी: 27%) का स्थान है।.

•  पंजाब, झारखंड, बिहार राजस्थान तथा महाराष्ट्र और गुजरात के शहरी इलाकों में चीनी के उपभोग में पीडीएस के मार्फत हुई खरीद का हिस्सा बहुत कम (0-5% परिवार) है,  यही बात हरियाणा, उत्तरप्रदेश तथा पश्चिम बंगाल के शहरी इलाकों (5-10% परिवार) के बारे में कही जा सकती है। .

मिट्टी का तेल: राज्यवार पीडीएस के जरिए उपभोग

•  राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो 76 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों तथा 30 प्रतिशत शहरी परिवारों ने मिट्टी तेल की खरीद के प्रमुख स्रोत के रुप में पीडीएस प्रणाली का उपभोग किया जबकि 22 प्रतिशत ग्रामीण तथा 16 प्रतिशत शहरी परिवारों ने कहा कि उन्होंने मिट्टी की तेल की खरीद पीडीएस से एतर माध्यम से की।

•  पंजाब और हरियाणा को छोड़कर अन्य सभी बड़े राज्यों में  पीडीएस के जरिए मिट्टी का तेल खरीदने वाले ग्रामीण परिवारों की तादाद 62 प्रतिशत से 91 प्रतिशत के बीच तथा शहरी परिवारों की तादाद 10 प्रतिशत से लेकर 59 प्रतिशत के बीच है।

•  पश्चिम बंगाल के शहरी और ग्रामीण दोनों ही अंचलों में पीडीएस के जरिए मिट्टी का तेल खरीदने वाले परिवारों की तादाद बहुत ज्यादा(91% ग्रामीण, 59% शहरी) है,  इसके बाद बिहार (88% ग्रामीण, 53% शहरी), तथा छत्तीसगढ़ (86% ग्रामीण, 48% शहरी) का स्थान है.

 परिवारों के बीच विभिन्न प्रकार के राशनकार्डों का वितरण

 •राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो 5% ग्रामीण परिवारों के पास अंत्योदय राशनकार्ड हैं,  38% ग्रामीण परिवारों के पास बीपीएल श्रेणी के कार्ड हैं, 42% ग्रामीण परिवारों के पास अंत्योदय तथा बीपीएल श्रेणी से इतर श्रेणी के कार्ड हैं जबकि 14 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास किसी भी प्रकार का राशनकार्ड नहीं है।

•  शहरी परिवारों में 2 प्रतिशत के पास अंत्योदय कार्ड है, 16 प्रतिशत के पास बीपीएल श्रेणी का कार्ड है, 50 प्रतिशत शहरी परिवारों के पास अन्य श्रेणी के कार्ड हैं जबकि 33 प्रतिशत शहरी परिवारों के पास कोई कार्ड नहीं है।

•  देश के ग्रामीण अंचलों में दिहाड़ी मजदूरी करने वाले खेतिहर तथा गैर-खेतिहर परिवारों में अंत्योदय कार्डधारियों की संख्या सबसे ज्यादा यानी 7 प्रतिशत है। नियमित आमदनी वाले परिवारों में अंत्योदय कार्डधारियों की संख्या 3 प्रतिशत है.  दिहाड़ी मजदूरी करने वाले खेतिहर परिवारों में 56 प्रतिशत के पास बीपीएल श्रेणी के कार्ड हैं।

•  देश के ग्रामीण अंचल में 8 प्रतिशत एससी श्रेणी के परिवारों के अंत्योदय कार्ड है जबकि एसटी श्रेणी के 7 प्रतिशत परिवारों के पास अंत्योदय श्रेणी का कार्ड है.  ग्रामीण अंचल में बीपीएल कार्डधारी एसटी परिवारों की तादाद 49 प्रतिशत है जबकि एससी परिवारों की तादाद 47 प्रतिशत.

• देश के शहरी अंचल में 3 प्रतिशत एससी और एसटी परिवारों के पास और 2 प्रतिशत ओबीसी श्रेणी के परिवारों के पास अंत्योदय कार्ड है. तकरीबन 20 फीसदी एसटी, एससी तथा ओबीसी परिवारों के पास शहरी अंचलों में बीपीएल श्रेणी का कार्ड है लेकिन अन्य जातीय समूहों में शामिल परिवारों में केवल 8 फीसदी के पास बीपीएल कार्ड है.

•एसटी श्रेणी के सर्वाधिक शहरी परिवारों (41%) किसी भी किस्म का राशनकार्ड नहीं है.

•  आंध्रप्रदेश के शहरी और ग्रामीण दोनों ही अंचलों में बीपीएल कार्डधारी परिवारों की संख्या अपेक्षाकृत ज्यादा (85%  ग्रामीण, 49%  शहरी) है,  इसके बाद  बीपीएल कार्डधारियों की उच्च तादाद के मामले में कर्नाटक (64% ग्रामीण, 29% शहरी)  तथा छत्तीसगढ़ (59%  ग्रामीण, 33%  शहरी) का स्थान है. 

 

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[inside]राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण द्वारा प्रस्तुत नवीनतम गणना( 66 वां दौर- जुलाई 2009 से जून 2010)[/inside] के अनुसार सार्वजनिक वितरण प्रणाली(पीडीएस) से खरीद-खपत के मामले में नए रुझान इस प्रकार हैं-

http://mospi.nic.in/Mospi_New/upload/nss_report_545.pdf

 

 

--2009-10 मे चावल की खपत में पीडीएस खरीद का हिस्सा ग्रामीण क्षेत्र में करीब 23.5% था ( यानि प्रतिव्यक्ति 6 किलोग्राम में 1.41 किलोग्राम) जबकि शहरी क्षेत्र में इसी अवधि में चावल की खपत में पीडीएस खरीद का हिस्सा 18 फीसदी( प्रतिव्यक्ति 4.52 किलोग्राम में 0.81 किलोग्राम) था। साल 2004-05 में चावल की खपत में पीडीएस हिस्सा ग्रामीण क्षेत्र में 13 फीसदी और शहरी क्षेत्र में करीब 11 फीसदी था।

 

--2009-10 में गेहूं/आटा की खपत में पीडीएस का हिस्सा ग्रामीण क्षेत्र में करीब 14.6 फीसदी(प्रतिव्यक्ति 4.24 किलोग्राम में 0.62 किलोग्राम) और यह 2004-05 के मुकाबले दोगुना है। शहरी क्षेत्र में साल 2009-10 में  गेहूं/आटा की खपत में पीडीएस का हिस्सा 9 फीसदी था जबकि साल 2004-05 में शहरी क्षेत्र के लिए यही आंकड़ा महज 3.8 फीसदी का था।

 

--साल 2009-10 में चीनी की खपत में पीडीएस खरीद का हिस्सा ग्रामीण क्षेत्र के लिए 14.7 फीसदी था जबकि साल 2004-05 में 9.6 फीसदी। शहरी क्षेत्र में यही आंकड़ा साल 2009-10 के लिए 10.3 फीसदी और साल 2004-05 के लिए 6.6 फीसदी था।

 

--साल 2009-10 में किरोसिन की खपत में पीडीएस खरीद का हिस्सा ग्रामीण क्षेत्र में 86.3 फीसदी था एवं शहरी क्षेत्र में 63.6 फीसदी। साल 2004-05 के लिए यही आंकड़ा ग्रामीण क्षेत्र के लिए 9 फीसदी और शहरी क्षेत्र के लिए 7 फीसदी है।

 

--साल 2009-10 में ग्रामीण क्षेत्र के तकरीबन 39 फीसदी लोगों ने कहा कि बीते तीस दिन की अवधि के भीतर उन्होंने पीडीएस से चावल लेकर उसका उपभोग किया है जबकि साल 2004-05 में ग्रामीण क्षेत्र में ऐसा कहने वाले लोगों की संख्या 24.4 फीसदी थी। ठीक इसी तरह शहरी क्षेत्र के लिए यह आंकड़ा साल 2004-05 में 13 फीसदी लोगों का था जो साल 2009-10 में बढ़कर 20.5 फीसदी हो गया।

 

--साल 2009-10 में ग्रामीण क्षेत्र के तकरीबन 27.6 फीसदी लोगों ने कहा कि बीते तीस दिन की अवधि के भीतर उन्होंने पीडीएस से गेहूं या आटा लेकर उसका उपभोग किया है जबकि साल 2004-05 में ग्रामीण क्षेत्र में ऐसा कहने वाले लोगों की संख्या 11 फीसदी थी। ठीक इसी तरह शहरी क्षेत्र के लिए यह आंकड़ा साल 2004-05 में 5.8  फीसदी लोगों का था जो साल 2009-10 में बढ़कर 17.6 फीसदी हो गया।

 

--साल 2009-10 में ग्रामीण क्षेत्र के तकरीबन 28 फीसदी लोगों ने कहा कि बीते तीस दिन की अवधि के भीतर उन्होंने पीडीएस से चीनी लेकर उसका उपभोग किया है जबकि साल 2004-05 में ग्रामीण क्षेत्र में ऐसा कहने वाले लोगों की संख्या 16 फीसदी थी। ठीक इसी तरह शहरी क्षेत्र के लिए यह आंकड़ा साल 2004-05 में 11.5 फीसदी लोगों का था जो साल 2009-10 में बढ़कर 18.7 फीसदी हो गया।

 

--साल 2009-10 में ग्रामीण क्षेत्र के तकरीबन 82 फीसदी लोगों ने कहा कि बीते तीस दिन की अवधि के भीतर उन्होंने पीडीएस से मिट्टी का तेल लेकर उसका उपभोग किया है जबकि साल 2004-05 में ग्रामीण क्षेत्र में ऐसा कहने वाले लोगों की संख्या 73 फीसदी थी।  शहरी क्षेत्र के लिए यह आंकड़ा दोनों ही अवधियों के लिए 33 फीसदी पर बना रहा। शहरी के क्षेत्र के 15 फीसदी और ग्रामीण क्षेत्र के 18 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्होंने मिट्टी का तेल पीडीएस से ना लेकर अन्य स्रोतों से लिया।

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  [inside]नेशनल सैम्पल सर्वे (राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण) द्वारा प्रस्तुत ६१ दौर के आकलन (जुलाई २००४-जून २००५) पर आधारित आकलन [/indide]- पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम एंड अदर सोर्सेज ऑव हाऊस होल्ड कंज्मप्शन नामक दस्तावेज के अनुसार

 

  • ८१ फीसदी ग्रामीण परिवारों और ६७ फीसदी शहरी परिवारों के पास राशन कार्ड है। बीपीएल कार्ड २६.५ फीसदी ग्रामीण परिवारों और १०.५ फीसदी शहरी परिवारों को हासिल है। अंत्योदय योजना के अंतर्गत दिया जाने वाला कार्ड एक फीसदी से भी कम ग्रामीण और शहरी परिवारों को हासिल है।  
  • आंध्रप्रदेश में बीपीएल कार्डधारियों की संख्या (शहरी-२७ फीसदी,ग्रामीण ५४ फीसदी) राष्ट्रीय औसत की तुलना में दोगुनी है। कर्नाटक और उड़ीसा के ग्रामीण इलाके में बीपीएल कार्डधारियों का अनुपात ४० फीसदी है। केरल के शहरी इलाके में २० फीसदी परिवारों के बीपीएल कार्ड है।
  • ग्रामीण इलाके में अनुसूचित जनजाति  के ५ फीसदी, अनुसूचित जाति के ४.५ फीसदी तथा अन्य पिछड़ा वर्ग सहित बाकी वर्गों के २ फीसदी परिवारों के पास अंत्योदय कार्ड है।ग्रामीण इलाकों में अनुसूचित जाति के ४० फीसदी, अनुसूचित जनजाति के ३५ फीसदी, अन्य पिछड़ा वर्ग के २५ फीसदी तथा बाकी वर्गों के १७ फीसदी परिवारों के पास बीपीएल कार्ड है। बहरहाल, शहरी इलाके में सबसे ज्यादा बीपीएल कार्ड अनुसूचित जाति के परिवारों के पास हैं। शहरी इलाके में अनुसूचित जाति के १७ फीसदी परिवारों के पास बीपीएल कार्ड हैं जबकि शहरी इलाके के  अनुसूचित जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के १४ फीसदी परिवारों के पास बीपीएल कार्ड हैं। देश के शहरी इलाके में अनुसूचित जाति और जनजाति के १ फीसदी परिवारों के पास अंत्योदय कार्ड है जबकि बाकी वर्गों के १ फीसदी से कम परिवारों के पास अंत्योदय कार्ड है।  
  • देश के ग्रामीण इलाकों ४३ फीसदी कृषि-मजदूर परिवारों के पास बीपीएल कार्ड हैं जबकि खेती से अलग मजदूरी करने वाले ३५ फीसदी परिवारों के पास बीपीएल कार्ड है।
  • ०.०१ हेक्टेयर से कम जमीन की मल्कियत वाले ५१ फीसदी परिवारों के पास राशन कार्ड नहीं है। एक हेक्टेयर और उससे ज्यादा जमीन की मल्कियत वाले ७७-८७ फीसदी परिवारों के पास एक ना एक तरह का राशन कार्ड है। एक से दो हेक्टेयर और आधे से एक हेक्टेयर वाले वर्ग के ८६ फीसदी यानी सर्वाधिक परिवारों के पास किसी ना किसी तरह का राशन कार्ड है।  जहां तक गरीब तबके के लिए जारी किये जाने वाले राशन कार्ड का सवाल है, सर्वाधिक बीपीएल कार्ड (३२ फीसदी) और अंत्योदय कार्ड (४ फीसदी) ०.०१-०.४१ हेक्टेयर जमीन की मिल्कियत वाले परिवारों के पास थे। 
  • सर्वेक्षण के लिए प्रति व्यक्ति मासिक खर्च को आधार बनाकर क्रमवार १२ श्रेणियां बनायी गई थीं। ग्रामीण इलाके में प्रति व्यक्ति मासिक खर्चे के आधार पर सबसे ज्यादा खर्च करने वाली श्रेणी में ५ फीसदी आबादी थी। इस श्रेणी के ११ फीसदी परिवारों के पास बीपीएल कार्ड थे। इससे नीचे की श्रेणी में आने वाले कुल ५ फीसदी ग्रामीण आबादी में १४ फीसदी परिवारों के पास बीपीएल कार्ड थे। मासिक खर्चे के आधार पर क्रमवार बनायी गई श्रेणी की तीसरे पादान पर १० फीसदी ग्रामीण आबादी थी और इस वर्ग के १८ फीसदी परिवारों के पास बीपीएल कार्ड थे।
  • जिन राज्यों में पीडीएस (पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम-सार्वजनिक वितरण प्रणाली) के अन्तर्गत मुहैया कराये जाने वाले चावल की खपत सबसे ज्यादा थी उनके नाम हैं- तमिलनाडु (यहां ७९ फीसदी ग्रामीण और ४८ फीसदी शहरी परिवारों में पीडीएस से हासिल चावल की खपत थी), आंध्रप्रदेश ( ग्रामीण ६२ फीसदी,शहरी ३१ फीसदी),कर्नाटक (ग्रामीण ५९ फीसदी, शहरी २१ फीसदी) और केरल (ग्रामीण ३५ फीसदी,शहरी २३ फीसदी)। यहां तक की महाराष्ट्र और गुजरात जहां चावल भोजन की आदतों में खास शुमार नहीं है वहां भी पीडीएस से प्राप्त चावल की खपत क्रमशः ३२ फीसदी और २८ फीसदी परिवारों में होती है।दूसरी तरफ, पीडीएस से हासिल चावल की खपत पश्चिम बंगाल (१३ फीसदी ग्रामीण और ५ फीसदी शहरी), असम (९ फीसदी ग्रामीण और २ फीसदी शहरी) और बिहार( १ फीसदी ग्रामीण और २ फीसदी शहरी) में बहुत कम है।
  • पीडीएस से प्राप्त गेहूं या आटे की खपत के मामले में कर्नाटक ( ४६ फीसदी ग्रामीण, १५ फीसदी शहरी), गुजरात (२९ फीसदी ग्रामीण परिवार) , महाराष्ट्र (२६ फीसदी) और मध्यप्रदेश (ग्रामीण २० फीसदी, शहरी १० फीसदी) आगे हैं।
  • पीडीएस से प्राप्त चीनी की सर्वाधिक खपत वाले राज्यों के नाम हैं- तमिलनाडु (६५ फीसदी ग्रामीण परिवार और ६४ फीसदी शहरी परिवार), असम (४० फीसदी ग्रामीण और १६ फीसदी शहरी) और आंध्रप्रदेश (ग्रामीण ३६ फीसदी, शहरी १५ फीसदी)। दूसरी तरफ पंजाब, हरियाणा, बिहार और झारखंड जैसे राज्य हैं जहां पीडीएस से प्राप्त चीनी की खपत ग्रामीण और शहरी, दोनों ही इलाकों के १ फीसदी परिवार भी नहीं करते।यही हाल उड़ीसा और उत्तरप्रदेश का है जहां पीडीएस से प्राप्त चीनी का इस्तेमाल २ फीसदी परिवार करते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो पीडीएस से प्राप्त चीनी का इस्तेमाल १६ फीसदी ग्रामीण और १२ फीसदी शहरी परिवार करते हैं।
  • पंजाब और हरियाणा को छोड़ दें तो बाकी सभी बड़े राज्यों के ग्रामीण इलाकों में ५५ फीसदी से ज्यादा परिवार पीडीएस से प्राप्त किरोसिन तेल का इस्तेमाल करते हैं। पश्चिम बंगाल में तो ९१ फीसदी ग्रामीण और ६० फीसदी शहरी परिवार पीडीएस से प्राप्त किरोसिन तेल का इस्तेमाल करते हैं।
  • पीडीएस से मुहैया कराये जाने वाली चार प्रमुख चीजों(चावल, गेहूं,चीनी और किरोसिन) में किरोसिन की खपत सबसे ज्यादा है। पीडीएस से मुहैया करायी गई इन चार चीजों की खपत को एक साथ जोड़ दें तो इसमें किरोसिन तेल की खपत का हिस्सा ७७ फीसदी(गांवों में) और ५७ फीसदी(शहरों में) आता है।पीडीएस से मुहैया करायी गई चार बड़ी चीजों में एक चावल के लिए यह आंकड़ा गांवों और शहरों के लिए क्रमशः १३ फीसदी और ११ फीसदी का आता है जबकि गेहूं के मामले में क्रमशः ७ फीसदी और ४ फीसदी।
  • बीपीएल और अंत्योदय कार्डधारी परिवार पीडीएस से प्राप्त होने वाली चीजों पर तुलनात्मक रुप से ज्यादा निर्भर हैं। गेंहूं की खपत के मामले में यह स्थिति सबसे ज्यादा साफ तरीके से उभरती है। बीपीएल और अंत्योदय कार्डधारी परिवार रोजाना के भोजन के लिए जरुरी कुल गेंहूं का २८ फीसदी हिस्सा पीडीएस से प्राप्त करते हैं। यह बात शहर और गांव दोनों ही जगहों के परिवारों पर लागू होती है जबकि कुल आबादी के लिहाज से देखें तो गेंहूं की कुल खपत का ७ फीसदी और ४ फीसदी हिस्सा क्रमशः गांवों और शहरों में पीडीएस से हासिल होता है। बीपीएल और अंत्योदय कार्डधारी चावल और चीनी के लिए भी कुल आबादी की तुलना में पीडीएस पर ज्यादा निर्भर हैं। गांवों में पीडीएस से प्राप्त चावल और गेंहूं पर बीपीएल और अंत्योदय कार्डधारी लोगों की निर्भरता सामान्य आबादी की तुलना में दोगुनी और शहरों में तीन गुनी है।
  • साल २००४-०५ में लगभग २२ फीसदी ग्रामीण परिवारों के बच्चे मिड डे मील योजना से लाभान्वित हुए। समेकित बाल विकास परियोजना(आईसीडीएस) से ५.७ फीसदी ग्रामीण परिवारों के बच्चे लाभान्वित हुए। फूड-फ‌ार-वर्क योजना से महज २.७ फीसदी परिवारों को लाभ मिला जबकि बुजुर्गों के लाब के लिए चलायी गई अन्नपूर्णा योजना से महज ०.९ फीसदी ग्रामीण परिवार लाभान्वित हुए।  भारत के शहरी इलाके में ८ फीसदी परिवारों के बच्चे मिड डे मील योजना से लाभान्वित हुए जबकि समेकिल बाल विकास परियोजना से १.८ फीसदी परिवारों के बच्चे। केवल ०.२ फीसदी शहरी परिवार अन्नपूर्णा योजना से और ०.१ फीसदी परिवार फूड फार वर्क योजना से लाभान्वित हुए।
  • अगर ग्रामीण इलाके के परिवारों का विभाजन पेशागत आधार पर करें तो जाहिर होगा कि आजीविका के लिए शारीरिक श्रम (खेत-मजदूर या फिर अन्य प्रकार की मजदूरी करने वाले मेहनतकश) पर निर्भर रहने वाले परिवार पीडीएस के अन्तर्गत चलायी जा रही योजनाओं से आनुपातिक तौर पर ज्यादा लाभान्वित हो रहे हैं। ठीक इसी तरह शहरों में दिहाड़ी मजदूरी करने वाले परिवार के लोगों की पीडीएस के अन्तर्गत चलायी जा रही योजनाओं पर निर्भरता ज्यादा है।
  • भारत के ग्रामीण और शहरी इलाके में अनुसूचित जनजाति के परिवार फूड फॉर वर्क योजना से आपेक्षिक रुप से ज्यादा लाभान्वित हुए हैं। इस सामाजिक वर्ग के लोगों को समेकित बाल विकास योजना के अन्तर्गत भी अन्य वर्गों की तुलना में ज्यादा लाभ पहुंचा है।
  • ०.४० हेक्टेयर से ज्यादा जमीन की मिल्कियत वाले वाले परिवारों की तादाद लाभार्थियों में ०.४० हेक्टेयर से कम जमीन की मिल्कियत वाले लोगों की तुलना में अधिक है।बतौर लाभार्थी मिड डे मील योजना और फूड फॉर वर्क योजना में ०.४१ हेक्टेयर से १.०० हेक्टेयर जमीन की मिल्कियत वाले समूह के लोगों की संख्या बाकी समूहों की तुलना में ज्यादा है।
  • प्रति व्यक्ति मासिक खर्चे के आधार पर श्रेणी क्रम में तैयार किए गए १२ समूहों में ऊपर के पहले चार समूहों के अन्तर्गत आने वाले ग्रामीण परिवारों में समेकित बाल विकास योजना से लाभान्वित होने वाले परिवारों की तादाद २ से ४ फीसदी है। .
  • अधिकांश राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मिड डे मील योजना से १० फीसदी से ज्यादा ग्रामीण परिवार लाभान्वित हुए हैं। १२ बड़े राज्यों में इस योजना से लाभान्वित होने वाले ग्रामीण परिवारों की तादाद १८ फीसदी से लेकर ३३ फीसदी तक है।
  • बडे राज्यों में फूड फॉर वर्क योजना से लाभान्वित होने वाले ग्रामीण परिवारों में सर्वाधिक संख्या राजस्थान (१२ फीसदी) और उड़ीसा (८ फीसदी) के ग्रामीण परिवारों की है। 
  • ग्रामीण भारत में जितनी मात्रा में दूध की खपत होती है उसका ६२ फीसदी हिस्सा घरेलू उत्पाद के तौर पर हासिल होता है जबकि गेंहू-आटा और चावल के मामले में यह आंकड़ा ४० फीसदी और ३० फीसदी का है।

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[inside]ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के दस्तावेज के अनुसार[/inside]-
http://planningcommission.gov.in/plans/planrel/fiveyr/11th/11_v2/11v2_ch4.pdf

  • समाज के सभी वर्गों के लोगों को खाद्य सुरक्षा प्रदान करने के लिहाज से पीडीएस सरकार द्वारा चलायी जा रही सबसे बड़ी योजना है। पीडीएस के अन्तर्गत चलायी जा रही उचित मूल्य की राशन दुकानों की संख्या देश में ४ लाख ८९ हजार है।
  • पीडीएस के अन्तर्गत भारतीय खाद्य निगम के मुख्य वितरण केंद्र तक खाद्यान्न को पहुंचाने और उसके उपार्जन का जिम्मा केंद्र सरकार का है। गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों की पहचान करना, राशन कार्ड के वितरण की व्यवस्था करना तथा समाज के कमजोर तबकों को उचित मूल्य की दुकानों के जरिए खाद्यान्न मुहैया कराने का जिम्मा राज्य सरकारों का है। पीडीएस समाज के कमजोर तबकों को खाद्यान्न मुहैया कराने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाया है। अगर पी़डीएस इस काम में सफल रहता तो पिछले दो दशकों से खाद्यान्न के उपभोग में लगातार कमी नहीं आ रही होती।
  • पीडीएस के कामकाज में सुधार करने के लिए जून १९९७ में उसे टीपीडीएस (टारगेटेड पब्लिक डिस्ट्रब्यूशन ) का रुप दिया गया । टीपीडीएस का लक्ष्य गरीब परिवारों की पहचान करना और उन्हें तयशुदा खाद्यन्न अनुदानित मूल्य पर मुहैया कराना है । टीडीपीएस के अन्तर्गत निर्धनतर और निर्धनतम परिवारों को अत्यंत अनुदानित मूल्य पर खाद्यान्न मुहैया कराया जाता है। गरीबी रेखा से ऊपर रहने वाले परिवारों को भी टीडीपीएस में खाद्यान्न मुहैया कराया जाता है लेकिन इसके मूल्य पर अनुदान कम होता है। टीडीपीएस के अन्तर्गत अंत्योदय कार्डधारी परिवारों को पहले १० किलो ग्राम अनाज प्रति महीने दिया गया फिर अप्रैल २००२ से इसे बढ़ाकर ३५ किलोग्राम अनाज प्रति महीना कर दिया गया।
  • अलग-अलग अध्ययनों से पता चलता है कि टीडीपीएस में कुछ खामियां है, मसलन- निर्धनतम परिवारों की पहचान ठीक तरीके नहीं हो पायी है, उचित मूल्य की दुकानें कारगर नहीं है, खाद्यान्न के दामों में स्थिरता नहीं लायी जा सकी है और टीडीपीएस के अन्तर्गत मुहैया कराये जाने वाले खाद्यान्न को लाभार्थियों तक पहुंचाने के क्रम में उसका एक हिस्सा दूसरे हाथों में चला जाता है।
कितना कारगर रहा है टीडीपीएस ?

  • केवल २२.७ फीसदी उचित मूल्य की दुकानें कुल लागत पूंजी पर १२ फीसदी लौटा पाने में सफल हो पा रही हैं ।
  • हिमाचल प्रदेश,तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल को छोड़ दें तो गरीबी रेखा से ऊपर के परिवारों द्वारा टीडीपीएस के तहत लिए जाने वाले खाद्यान्न की मात्रा नगण्य है। .
  • पश्चिम बंगाल, केरल, हिमाचल प्रदेश और तमिलनाडु में बीपीएल कार्डधारियों की टीडीपीएस पर निर्भरता अधिक है। 
  • सर्व-सुलभ पीडीएस की तुलना में टीडीपीएस पर गरीबों की निर्भरता अपेक्षाकृत ज्यादा है।
  • टीडीपीएस के अन्तर्गत कार्ड का वितरण उचित रीति से नहीं हो सका है। झूठहा कार्ड बनाने की घटनाएं आम हैं।
  • गरीब परिवारों की पहचान ठीक तरह से ना हो पाने के कारण बड़ी संख्या में गरीब परिवार टीडीपीएस से बाहर रह गए हैं आकलन के मुताबिक सिर्फ ५७ फीसदी गरीब परिवारों को टीडीपीएस की सुरक्षा हासिल हो पायी है।
  • आंध्रप्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु में गरीब परिवारों की पहचान में गड़बड़ी की घटनाएं ज्यादा हुई हैं। इसका मतलब यह हुआ कि इन राज्यों में गरीबी रेखा से ऊपर आने वाले कुछ लोगों को टीडीपीएस के तहत अनुदानित मूल्य पर राशन मुहैया कराया जा रहा है।
  • टीडीपीएस के तहत मुहैया कराये जा रहे राशन की सम्पूर्ण मात्रा उसके लक्षित ग्राहक तक नहीं पहुंच पाते, कुछ बीच में ही दूसरे हाथों में चली जाती है। अलग अलग प्रांतो में इस घटना के प्रतिशत में अन्तर है। बिहार और पंजाब में टीडीपीएस की ७५ फीसदी सामग्री दूसरे हाथों में जाती है तो हरियाणा और  उत्तरप्रदेश में ५० से ७५ फीसदी। 
  • अवांछित हाथों में टीडीपीएस का खाद्यान्न पहुंचने का मतलब है कि जो बीपीएल परिवार इसके असली हकदार हैं उन्हें टीडीपीएस के अन्तर्गत अनुदानित मूल्य पर वांछित मात्रा से कहीं कम खाद्यान्न हासिल हो रहा है। अनुमान के मुताबिक साल २००३-०४ में बीपीएल परिवारों के लिए केंद्रीय कोटे से एख करोड़ एकतालिस लाख टन खाद्यान्न भेजा गया लेकिन बीपीएल परिवारों के हाथ आया केवल ६१ लाख टन जबकि ८० लाख टन अनाज लक्षित ग्राहकों के हाथ में नहीं पहुंचा।
  • अनाज के गलत हाथों में जाने के कारण सरकार को वांछित मात्रा मुहैया कराने में ज्यादा खर्च करना पड़ता है।गरीब परिवारों को एक किलाग्राम अनाज मुहैया कराने के लिए केंद्रीय कोष से सरकार को २.३२ किलोग्राम अनाज देना पड़ा।
  • साल २००३-०४ में टीडीपीएस के तहत ७२५८ करोड़ रुपयों का अनुदान दिया गया लेकिन महज ४१२३ करोड़ रुपये का ही अनुदान बीपीएल परिवारों के हाथ आया। बाकी रकम का अनुदान ग्राहक तक ना पहुंच कर आपूर्ति-तंत्र से जुड़ी विभिन्न एजेंसियों के बीच बंट गया।