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नेशनल सैम्पल सर्वे (राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण) द्वारा प्रस्तुत ६१ दौर के आकलन (जुलाई २००४-जून २००५) पर आधारित पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम एंड अदर सोर्सेज ऑव हाऊस होल्ड कंज्मप्शन नामक दस्तावेज के अनुसार-
- ८१ फीसदी ग्रामीण परिवारों और ६७ फीसदी शहरी परिवारों के पास राशन कार्ड है। बीपीएल कार्ड २६.५ फीसदी ग्रामीण परिवारों और १०.५ फीसदी शहरी परिवारों को हासिल है। अंत्योदय योजना के अंतर्गत दिया जाने वाला कार्ड एक फीसदी से भी कम ग्रामीण और शहरी परिवारों को हासिल है।
- आंध्रप्रदेश में बीपीएल कार्डधारियों की संख्या (शहरी-२७ फीसदी,ग्रामीण ५४ फीसदी) राष्ट्रीय औसत की तुलना में दोगुनी है। कर्नाटक और उड़ीसा के ग्रामीण इलाके में बीपीएल कार्डधारियों का अनुपात ४० फीसदी है। केरल के शहरी इलाके में २० फीसदी परिवारों के बीपीएल कार्ड है।
- ग्रामीण इलाके में अनुसूचित जनजाति के ५ फीसदी, अनुसूचित जाति के ४.५ फीसदी तथा अन्य पिछड़ा वर्ग सहित बाकी वर्गों के २ फीसदी परिवारों के पास अंत्योदय कार्ड है।ग्रामीण इलाकों में अनुसूचित जाति के ४० फीसदी, अनुसूचित जनजाति के ३५ फीसदी, अन्य पिछड़ा वर्ग के २५ फीसदी तथा बाकी वर्गों के १७ फीसदी परिवारों के पास बीपीएल कार्ड है। बहरहाल, शहरी इलाके में सबसे ज्यादा बीपीएल कार्ड अनुसूचित जाति के परिवारों के पास हैं। शहरी इलाके में अनुसूचित जाति के १७ फीसदी परिवारों के पास बीपीएल कार्ड हैं जबकि शहरी इलाके के अनुसूचित जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के १४ फीसदी परिवारों के पास बीपीएल कार्ड हैं। देश के शहरी इलाके में अनुसूचित जाति और जनजाति के १ फीसदी परिवारों के पास अंत्योदय कार्ड है जबकि बाकी वर्गों के १ फीसदी से कम परिवारों के पास अंत्योदय कार्ड है।
- देश के ग्रामीण इलाकों ४३ फीसदी कृषि-मजदूर परिवारों के पास बीपीएल कार्ड हैं जबकि खेती से अलग मजदूरी करने वाले ३५ फीसदी परिवारों के पास बीपीएल कार्ड है।
- ०.०१ हेक्टेयर से कम जमीन की मल्कियत वाले ५१ फीसदी परिवारों के पास राशन कार्ड नहीं है। एक हेक्टेयर और उससे ज्यादा जमीन की मल्कियत वाले ७७-८७ फीसदी परिवारों के पास एक ना एक तरह का राशन कार्ड है। एक से दो हेक्टेयर और आधे से एक हेक्टेयर वाले वर्ग के ८६ फीसदी यानी सर्वाधिक परिवारों के पास किसी ना किसी तरह का राशन कार्ड है। जहां तक गरीब तबके के लिए जारी किये जाने वाले राशन कार्ड का सवाल है, सर्वाधिक बीपीएल कार्ड (३२ फीसदी) और अंत्योदय कार्ड (४ फीसदी) ०.०१-०.४१ हेक्टेयर जमीन की मिल्कियत वाले परिवारों के पास थे।
- सर्वेक्षण के लिए प्रति व्यक्ति मासिक खर्च को आधार बनाकर क्रमवार १२ श्रेणियां बनायी गई थीं। ग्रामीण इलाके में प्रति व्यक्ति मासिक खर्चे के आधार पर सबसे ज्यादा खर्च करने वाली श्रेणी में ५ फीसदी आबादी थी। इस श्रेणी के ११ फीसदी परिवारों के पास बीपीएल कार्ड थे। इससे नीचे की श्रेणी में आने वाले कुल ५ फीसदी ग्रामीण आबादी में १४ फीसदी परिवारों के पास बीपीएल कार्ड थे। मासिक खर्चे के आधार पर क्रमवार बनायी गई श्रेणी की तीसरे पादान पर १० फीसदी ग्रामीण आबादी थी और इस वर्ग के १८ फीसदी परिवारों के पास बीपीएल कार्ड थे।
- जिन राज्यों में पीडीएस (पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम-सार्वजनिक वितरण प्रणाली) के अन्तर्गत मुहैया कराये जाने वाले चावल की खपत सबसे ज्यादा थी उनके नाम हैं- तमिलनाडु (यहां ७९ फीसदी ग्रामीण और ४८ फीसदी शहरी परिवारों में पीडीएस से हासिल चावल की खपत थी), आंध्रप्रदेश ( ग्रामीण ६२ फीसदी,शहरी ३१ फीसदी),कर्नाटक (ग्रामीण ५९ फीसदी, शहरी २१ फीसदी) और केरल (ग्रामीण ३५ फीसदी,शहरी २३ फीसदी)। यहां तक की महाराष्ट्र और गुजरात जहां चावल भोजन की आदतों में खास शुमार नहीं है वहां भी पीडीएस से प्राप्त चावल की खपत क्रमशः ३२ फीसदी और २८ फीसदी परिवारों में होती है।दूसरी तरफ, पीडीएस से हासिल चावल की खपत पश्चिम बंगाल (१३ फीसदी ग्रामीण और ५ फीसदी शहरी), असम (९ फीसदी ग्रामीण और २ फीसदी शहरी) और बिहार( १ फीसदी ग्रामीण और २ फीसदी शहरी) में बहुत कम है।
- पीडीएस से प्राप्त गेहूं या आटे की खपत के मामले में कर्नाटक ( ४६ फीसदी ग्रामीण, १५ फीसदी शहरी), गुजरात (२९ फीसदी ग्रामीण परिवार) , महाराष्ट्र (२६ फीसदी) और मध्यप्रदेश (ग्रामीण २० फीसदी, शहरी १० फीसदी) आगे हैं।
- पीडीएस से प्राप्त चीनी की सर्वाधिक खपत वाले राज्यों के नाम हैं- तमिलनाडु (६५ फीसदी ग्रामीण परिवार और ६४ फीसदी शहरी परिवार), असम (४० फीसदी ग्रामीण और १६ फीसदी शहरी) और आंध्रप्रदेश (ग्रामीण ३६ फीसदी, शहरी १५ फीसदी)। दूसरी तरफ पंजाब, हरियाणा, बिहार और झारखंड जैसे राज्य हैं जहां पीडीएस से प्राप्त चीनी की खपत ग्रामीण और शहरी, दोनों ही इलाकों के १ फीसदी परिवार भी नहीं करते।यही हाल उड़ीसा और उत्तरप्रदेश का है जहां पीडीएस से प्राप्त चीनी का इस्तेमाल २ फीसदी परिवार करते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो पीडीएस से प्राप्त चीनी का इस्तेमाल १६ फीसदी ग्रामीण और १२ फीसदी शहरी परिवार करते हैं।
- पंजाब और हरियाणा को छोड़ दें तो बाकी सभी बड़े राज्यों के ग्रामीण इलाकों में ५५ फीसदी से ज्यादा परिवार पीडीएस से प्राप्त किरोसिन तेल का इस्तेमाल करते हैं। पश्चिम बंगाल में तो ९१ फीसदी ग्रामीण और ६० फीसदी शहरी परिवार पीडीएस से प्राप्त किरोसिन तेल का इस्तेमाल करते हैं।
- पीडीएस से मुहैया कराये जाने वाली चार प्रमुख चीजों(चावल, गेहूं,चीनी और किरोसिन) में किरोसिन की खपत सबसे ज्यादा है। पीडीएस से मुहैया करायी गई इन चार चीजों की खपत को एक साथ जोड़ दें तो इसमें किरोसिन तेल की खपत का हिस्सा ७७ फीसदी(गांवों में) और ५७ फीसदी(शहरों में) आता है।पीडीएस से मुहैया करायी गई चार बड़ी चीजों में एक चावल के लिए यह आंकड़ा गांवों और शहरों के लिए क्रमशः १३ फीसदी और ११ फीसदी का आता है जबकि गेहूं के मामले में क्रमशः ७ फीसदी और ४ फीसदी।
- बीपीएल और अंत्योदय कार्डधारी परिवार पीडीएस से प्राप्त होने वाली चीजों पर तुलनात्मक रुप से ज्यादा निर्भर हैं। गेंहूं की खपत के मामले में यह स्थिति सबसे ज्यादा साफ तरीके से उभरती है। बीपीएल और अंत्योदय कार्डधारी परिवार रोजाना के भोजन के लिए जरुरी कुल गेंहूं का २८ फीसदी हिस्सा पीडीएस से प्राप्त करते हैं। यह बात शहर और गांव दोनों ही जगहों के परिवारों पर लागू होती है जबकि कुल आबादी के लिहाज से देखें तो गेंहूं की कुल खपत का ७ फीसदी और ४ फीसदी हिस्सा क्रमशः गांवों और शहरों में पीडीएस से हासिल होता है। बीपीएल और अंत्योदय कार्डधारी चावल और चीनी के लिए भी कुल आबादी की तुलना में पीडीएस पर ज्यादा निर्भर हैं। गांवों में पीडीएस से प्राप्त चावल और गेंहूं पर बीपीएल और अंत्योदय कार्डधारी लोगों की निर्भरता सामान्य आबादी की तुलना में दोगुनी और शहरों में तीन गुनी है।
- साल २००४-०५ में लगभग २२ फीसदी ग्रामीण परिवारों के बच्चे मिड डे मील योजना से लाभान्वित हुए। समेकित बाल विकास परियोजना(आईसीडीएस) से ५.७ फीसदी ग्रामीण परिवारों के बच्चे लाभान्वित हुए। फूड-फार-वर्क योजना से महज २.७ फीसदी परिवारों को लाभ मिला जबकि बुजुर्गों के लाब के लिए चलायी गई अन्नपूर्णा योजना से महज ०.९ फीसदी ग्रामीण परिवार लाभान्वित हुए। भारत के शहरी इलाके में ८ फीसदी परिवारों के बच्चे मिड डे मील योजना से लाभान्वित हुए जबकि समेकिल बाल विकास परियोजना से १.८ फीसदी परिवारों के बच्चे। केवल ०.२ फीसदी शहरी परिवार अन्नपूर्णा योजना से और ०.१ फीसदी परिवार फूड फार वर्क योजना से लाभान्वित हुए।
- अगर ग्रामीण इलाके के परिवारों का विभाजन पेशागत आधार पर करें तो जाहिर होगा कि आजीविका के लिए शारीरिक श्रम (खेत-मजदूर या फिर अन्य प्रकार की मजदूरी करने वाले मेहनतकश) पर निर्भर रहने वाले परिवार पीडीएस के अन्तर्गत चलायी जा रही योजनाओं से आनुपातिक तौर पर ज्यादा लाभान्वित हो रहे हैं। ठीक इसी तरह शहरों में दिहाड़ी मजदूरी करने वाले परिवार के लोगों की पीडीएस के अन्तर्गत चलायी जा रही योजनाओं पर निर्भरता ज्यादा है।
- भारत के ग्रामीण और शहरी इलाके में अनुसूचित जनजाति के परिवार फूड फॉर वर्क योजना से आपेक्षिक रुप से ज्यादा लाभान्वित हुए हैं। इस सामाजिक वर्ग के लोगों को समेकित बाल विकास योजना के अन्तर्गत भी अन्य वर्गों की तुलना में ज्यादा लाभ पहुंचा है।
- ०.४० हेक्टेयर से ज्यादा जमीन की मिल्कियत वाले वाले परिवारों की तादाद लाभार्थियों में ०.४० हेक्टेयर से कम जमीन की मिल्कियत वाले लोगों की तुलना में अधिक है।बतौर लाभार्थी मिड डे मील योजना और फूड फॉर वर्क योजना में ०.४१ हेक्टेयर से १.०० हेक्टेयर जमीन की मिल्कियत वाले समूह के लोगों की संख्या बाकी समूहों की तुलना में ज्यादा है।
- प्रति व्यक्ति मासिक खर्चे के आधार पर श्रेणी क्रम में तैयार किए गए १२ समूहों में ऊपर के पहले चार समूहों के अन्तर्गत आने वाले ग्रामीण परिवारों में समेकित बाल विकास योजना से लाभान्वित होने वाले परिवारों की तादाद २ से ४ फीसदी है। .
- अधिकांश राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मिड डे मील योजना से १० फीसदी से ज्यादा ग्रामीण परिवार लाभान्वित हुए हैं। १२ बड़े राज्यों में इस योजना से लाभान्वित होने वाले ग्रामीण परिवारों की तादाद १८ फीसदी से लेकर ३३ फीसदी तक है।
- बडे राज्यों में फूड फॉर वर्क योजना से लाभान्वित होने वाले ग्रामीण परिवारों में सर्वाधिक संख्या राजस्थान (१२ फीसदी) और उड़ीसा (८ फीसदी) के ग्रामीण परिवारों की है।
- ग्रामीण भारत में जितनी मात्रा में दूध की खपत होती है उसका ६२ फीसदी हिस्सा घरेलू उत्पाद के तौर पर हासिल होता है जबकि गेंहू-आटा और चावल के मामले में यह आंकड़ा ४० फीसदी और ३० फीसदी का है।
ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के दस्तावेज के अनुसार-
http://planningcommission.gov.in/plans/planrel/fiveyr/11th/11_v2/11v2_ch4.pdf
- समाज के सभी वर्गों के लोगों को खाद्य सुरक्षा प्रदान करने के लिहाज से पीडीएस सरकार द्वारा चलायी जा रही सबसे बड़ी योजना है। पीडीएस के अन्तर्गत चलायी जा रही उचित मूल्य की राशन दुकानों की संख्या देश में ४ लाख ८९ हजार है।
- पीडीएस के अन्तर्गत भारतीय खाद्य निगम के मुख्य वितरण केंद्र तक खाद्यान्न को पहुंचाने और उसके उपार्जन का जिम्मा केंद्र सरकार का है। गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों की पहचान करना, राशन कार्ड के वितरण की व्यवस्था करना तथा समाज के कमजोर तबकों को उचित मूल्य की दुकानों के जरिए खाद्यान्न मुहैया कराने का जिम्मा राज्य सरकारों का है। पीडीएस समाज के कमजोर तबकों को खाद्यान्न मुहैया कराने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाया है। अगर पी़डीएस इस काम में सफल रहता तो पिछले दो दशकों से खाद्यान्न के उपभोग में लगातार कमी नहीं आ रही होती।
- पीडीएस के कामकाज में सुधार करने के लिए जून १९९७ में उसे टीपीडीएस (टारगेटेड पब्लिक डिस्ट्रब्यूशन ) का रुप दिया गया । टीपीडीएस का लक्ष्य गरीब परिवारों की पहचान करना और उन्हें तयशुदा खाद्यन्न अनुदानित मूल्य पर मुहैया कराना है । टीडीपीएस के अन्तर्गत निर्धनतर और निर्धनतम परिवारों को अत्यंत अनुदानित मूल्य पर खाद्यान्न मुहैया कराया जाता है। गरीबी रेखा से ऊपर रहने वाले परिवारों को भी टीडीपीएस में खाद्यान्न मुहैया कराया जाता है लेकिन इसके मूल्य पर अनुदान कम होता है। टीडीपीएस के अन्तर्गत अंत्योदय कार्डधारी परिवारों को पहले १० किलो ग्राम अनाज प्रति महीने दिया गया फिर अप्रैल २००२ से इसे बढ़ाकर ३५ किलोग्राम अनाज प्रति महीना कर दिया गया।
- अलग-अलग अध्ययनों से पता चलता है कि टीडीपीएस में कुछ खामियां है, मसलन- निर्धनतम परिवारों की पहचान ठीक तरीके नहीं हो पायी है, उचित मूल्य की दुकानें कारगर नहीं है, खाद्यान्न के दामों में स्थिरता नहीं लायी जा सकी है और टीडीपीएस के अन्तर्गत मुहैया कराये जाने वाले खाद्यान्न को लाभार्थियों तक पहुंचाने के क्रम में उसका एक हिस्सा दूसरे हाथों में चला जाता है।
कितना कारगर रहा है टीडीपीएस ?
- केवल २२.७ फीसदी उचित मूल्य की दुकानें कुल लागत पूंजी पर १२ फीसदी लौटा पाने में सफल हो पा रही हैं ।
- हिमाचल प्रदेश,तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल को छोड़ दें तो गरीबी रेखा से ऊपर के परिवारों द्वारा टीडीपीएस के तहत लिए जाने वाले खाद्यान्न की मात्रा नगण्य है। .
- पश्चिम बंगाल, केरल, हिमाचल प्रदेश और तमिलनाडु में बीपीएल कार्डधारियों की टीडीपीएस पर निर्भरता अधिक है।
- सर्व-सुलभ पीडीएस की तुलना में टीडीपीएस पर गरीबों की निर्भरता अपेक्षाकृत ज्यादा है।
- टीडीपीएस के अन्तर्गत कार्ड का वितरण उचित रीति से नहीं हो सका है। झूठहा कार्ड बनाने की घटनाएं आम हैं।
- गरीब परिवारों की पहचान ठीक तरह से ना हो पाने के कारण बड़ी संख्या में गरीब परिवार टीडीपीएस से बाहर रह गए हैं आकलन के मुताबिक सिर्फ ५७ फीसदी गरीब परिवारों को टीडीपीएस की सुरक्षा हासिल हो पायी है।
- आंध्रप्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु में गरीब परिवारों की पहचान में गड़बड़ी की घटनाएं ज्यादा हुई हैं। इसका मतलब यह हुआ कि इन राज्यों में गरीबी रेखा से ऊपर आने वाले कुछ लोगों को टीडीपीएस के तहत अनुदानित मूल्य पर राशन मुहैया कराया जा रहा है।
- टीडीपीएस के तहत मुहैया कराये जा रहे राशन की सम्पूर्ण मात्रा उसके लक्षित ग्राहक तक नहीं पहुंच पाते, कुछ बीच में ही दूसरे हाथों में चली जाती है। अलग अलग प्रांतो में इस घटना के प्रतिशत में अन्तर है। बिहार और पंजाब में टीडीपीएस की ७५ फीसदी सामग्री दूसरे हाथों में जाती है तो हरियाणा और उत्तरप्रदेश में ५० से ७५ फीसदी।
- अवांछित हाथों में टीडीपीएस का खाद्यान्न पहुंचने का मतलब है कि जो बीपीएल परिवार इसके असली हकदार हैं उन्हें टीडीपीएस के अन्तर्गत अनुदानित मूल्य पर वांछित मात्रा से कहीं कम खाद्यान्न हासिल हो रहा है। अनुमान के मुताबिक साल २००३-०४ में बीपीएल परिवारों के लिए केंद्रीय कोटे से एख करोड़ एकतालिस लाख टन खाद्यान्न भेजा गया लेकिन बीपीएल परिवारों के हाथ आया केवल ६१ लाख टन जबकि ८० लाख टन अनाज लक्षित ग्राहकों के हाथ में नहीं पहुंचा।
- अनाज के गलत हाथों में जाने के कारण सरकार को वांछित मात्रा मुहैया कराने में ज्यादा खर्च करना पड़ता है।गरीब परिवारों को एक किलाग्राम अनाज मुहैया कराने के लिए केंद्रीय कोष से सरकार को २.३२ किलोग्राम अनाज देना पड़ा।
- साल २००३-०४ में टीडीपीएस के तहत ७२५८ करोड़ रुपयों का अनुदान दिया गया लेकिन महज ४१२३ करोड़ रुपये का ही अनुदान बीपीएल परिवारों के हाथ आया। बाकी रकम का अनुदान ग्राहक तक ना पहुंच कर आपूर्ति-तंत्र से जुड़ी विभिन्न एजेंसियों के बीच बंट गया।
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