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पर्यावरण संरक्षण : ...महिलाओं ने बचाया मिश्राइनमोढ़ा का जंगलपर्यावरण संरक्षण : ...महिलाओं ने बचाया मिश्राइनमोढ़ा का जंगल

ती न दशक तक मिश्राइनमोढ़ा के जंगलों की रक्षा करनेवालों ने इसकी सुरक्षा की जिम्मेवारी अब महिलाओं को दे दी है. विभिन्न प्रजाति के लाखों पेड़ों की सुरक्षा महिलाएं बखूबी कर रहे हैं. यह सब हो रहा है बिना वन विभाग की मदद या प्रोत्साहन के. हालांकि, प्रशासन और वन विभाग से सहयोग न मिलने से महिलाएं निराश हैं, लेकिन जंगल बचाने का जज्बा कम नहीं हुआ. वन विभाग भी मानता है कि वास्तव में ग्रामीणों के कारण ही मिश्राइनमोढ़ा का जंगल बचा है. ग्रामीण बताते हैं कि दशकों पूर्व गांव में एक मिश्रा परिवार रहता था. मिश्राजी गांव के सर्वेसर्वा थे. उनके नाम से ही इस गांव का नाम मिश्राइनमोढ़ा पड़ा. गांव में आदिवासी व मुसलिम जाति की बहुलता है. ग्रामीण बताते हैं कि 70 के दशक में जंगल कटाई के बाद गांव में छोटे-छोटे पौधे ही बचे थे. जंगल न होने से ग्रामीणों को कई तरह

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भानमती देश की सौ ताकतवर महिलाओं में शुमारभानमती देश की सौ ताकतवर महिलाओं में शुमार

लखनऊ। एक दशक पहले तक जीविका के लिए पल्लेदारी, मजदूरी, सिर पर डलिया रखकर सब्जी व फल बेचने वाली निरक्षर भानुमती वनग्राम की महिलाओं व अन्य वर्ग के लोगों की आवाज उठाकर देश की सौ ताकतवर महिलाओं में शुमार हो चुकी है। उन्हें राष्ट्रपति की ओर से 22 जनवरी को राष्ट्रपति भवन आने का न्यौता मिला है। इस मौके पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के साथ भोज में शामिल होने के साथ-साथ सम्मानित भी किया जाएगा। बहराइच के मिहींपुरवा विकास खंड के सात वन ग्रामों में एक टेडिय़ा निवासी शिवबचन की पत्नी भानमती मजदूरी कर अपना व परिवारीजनों का पेट पालती थीं। उन्हें न तो आसानी मजदूरी मिलती थी और मताधिकार हासिल था। वन ग्रामवासियों के साथ नागरिक अधिकारों के लिए 'वनग्राम आजादी आंदोलन' शुरू करने वाले सामाजिक संस्था देहात (डेवलपमेंटल एसोसिएशन फॉर ह्यूमन एडवांसमेंट) के मुख्य कार्यकारी डॉ. जितेंद्र चतुर्वेदी के संपर्क में आईं तो भानमति की जिंदगी ही बदल गई। आंदोलन

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असंभव की सीमाएं तोड़ीं और आज बन गईं रोल माडल-- माधव शर्माअसंभव की सीमाएं तोड़ीं और आज बन गईं रोल माडल-- माधव शर्मा

जयपुर. गांव-देहात से निकली ये महिलाएं आज सामाजिक-आर्थिक बदलाव की कहानियां गढ़ रही हैं। मेहनत और हौसले से इन्होंने न केवल सामाजिक बंधन और रूढ़ियों को ध्वस्त किया बल्कि अपनी आर्थिक तरक्की की राह भी प्रशस्त की। आइये, आपको बदलाव के कुछ ऐसे किरदारों से मिलाते हैं जिन्होंने खुद की ही नहीं बल्कि अपने आस-पास की भी तस्वीर बदल दी। 100-200 रुपए से हुई शुरुआत आज 4-5 लाख रुपए तक के बैंक बैलेंस तक पहुंच चुकी है। पेश हैं स्वयं सहायता समूहों में शामिल महिलाओं के शून्य से शिखर तक के इस सफर की ये चार कहानियां। फैक्ट फाइल राजस्थान में स्वयं सहायता समूह : 180,000 समूहों में शामिल महिलाओं की संख्या : 18-20 लाख बैंक भी बने मददगार 10-15 महिलाएं 50-100 रुपए की पूंजी लगाकर स्वयं सहायता समूह बना सकती हैं। बैंक इन समूहों को सस्ती ब्याज दरों पर लॉन देता है। समय पर चुकाने पर लॉन की

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बिहार का एक बैंक जहां कर्ज में मिलता है अनाज- सीटू तिवारीबिहार का एक बैंक जहां कर्ज में मिलता है अनाज- सीटू तिवारी

बिहार की राजधानी पटना से सटे सुंदरपुर की गहनी मांझी को अब पेट भर भात खाने को मिल जाता है। जवानी की न जाने कितनी रातें खाली पेट गुजारने के बाद बुढ़ापे में उन्हें पेट भर खाना नसीब हो रहा है। गहनी का भाग्य अनाज बैंक की वजह से ही जागा है। अनाज बैंक यानी वह बैंक जहां अनाज का लेन देन होता है। इस बैंक से अनाज उधार लिया जा सकता है और यहां अनाज जमा भी कराया जा सकता है। यहां पांच किलो अनाज उधार लेने पर छह किलो अनाज जमा कराना होता है।   पेट भर भात का सुख गहनी कहती हैं, " अगर ई बैंक नहीं होता, तो खाने को नहीं मिल पाता। पति को रोजाना बस डेढ़ किलो चावल ही मज़दूरी मिलती है। उसमें कुछ खाते हैं, कुछ अनाज देकर बदले में तेल, मसाला, नमक, कपड़ा वगैरह लाते हैं।" अनाज बैंक की शुरुआत साल 2005 में हुई।   ग़ैर सरकारी संस्था

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उत्तराखंडः यहां महिलाएं 2011 से चला रहीं 'जनधन योजना'

2014 में सत्ता में आने के बाद से पीएम मोदी जनधन योजना को बढ़ावा दे रहे हैं। लेकिन उत्तराखंड के पहाड़ की महिलाओं ने 'जनधन योजना' की शुरूआत 2011 में कर दी थी। उत्तरकाशी जिले में सैणी नाकुरी की अहिल्या एवं सुनीता, उत्तरों की सत्यभामा, सुनीता, चीवां की राधिका, डिडसारी की सरस्वती, लौंथरू की पूर्णा देवी और कई नाम हैं जिन्होंने अपनी असाधारण प्रबंध क्षमता का परिचय दिया है। हर माह 20 रुपए से लेकर 100 रुपए की छोटी बचत के सहारे उन्होंने दो करोड़ रुपये जमा कर लिए हैं। इस राशि से उन्होंने स्वयंसहायता समूह तैयार किया है। इससे जरूरतमंद महिलाओं को कर्ज दिया जाता है जिससे वे स्वावलंबन की राह पर चलती हैं। ग्रामीण महिलाओं की माइक्रो फाइनेंस की यह मुहिम अब गंगोत्री स्वायत्त सहकारिता संघ का रूप ले चुकी है। नेताला की पूनम बकरी पालन कर रही हैं, तो सिमोल्डी की जसदेई ने चारा प्रजाति एवं सब्जी पौध की नर्सरी

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