शिक्षा

लाखों की नौकरी छोड़ बच्चों का स्कूल खोलालाखों की नौकरी छोड़ बच्चों का स्कूल खोला

मुजफ्फरपुर : आइआइएम, लखनऊ से पढ़ाई और इंफोसिस व जेडएस जैसी नामी कंपनियों में नौकरी, जिसमें हर माह वेतन के रूप में लाखों का पैकेज, लेकिन ये सब छोड़ मधुबनी की बेटी और मुजफ्फरपुर की बहू गरिमा विशाल ने बच्चों को पढ़ा कर समाज को बदलने का रास्ता चुना. उन्होंने डेजाऊ नाम से बच्चों का स्कूल खोला है, जिसमें आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों पर विशेष जोर दिया जाता है. 2014 में 10 बच्चों से डेजाऊ की शुरुआत हुई थी. दो साल में इस स्कूल में एक सौ बच्चे हो गये हैं. गरिमा बच्चों की संख्या व उनकी पढ़ाई से संतुष्ट हैं. स्कूल के बारे में पूछने में गरिमा के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ जाती है. कहती हैं, कहां से बताना शुरू करूं, चलिये मैं अपनी पढ़ाई से शुरुआत करती हूं. मेरे पिता रजिस्टार हैं, उनके ट्रांसफर के हिसाब से मेरी पढ़ाई के शहर बदलते

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ऑनलाइन जगा रहे शिक्षा का अलख

महज 50 रुपये मासिक शुल्क पर दी जा रही हैं सुविधाएं बड़ा हौसला रखनेवाले ही जिंदगी के उस मुकाम को छू लेते हैं, जहां वे किसी पहचान के मोहताज नहीं होते. ऐसा ही अनोखा काम कर दिखाया है मुंबई की नील डिसूजा और सोमा वाजपेयी ने. नील और सोमा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डिजिटिलाइजेशन की गुमनाम दूत बन कर देश के स्लम एरिया और दूरस्थ गांवों में सुविधाविहीन बच्चों में इंटरनेट के जरिये शिक्षा का अलख जगा रहे हैं. भारत के शहरों के स्लम एरिया और दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट शिक्षा से दूर होते बच्चों की खाई को पाटने का काम कर रहा है. कंप्यूटर टैबलेट और क्लास क्लाउड तकनीक के जरिये ग्रामीण और स्लम क्षेत्र के बच्चे आसानी से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं. सुविधाविहीन बच्चों को इंटरनेट के जरिये शिक्षा प्रदान की जा रही है.  मुंबई से की काम की शुरुआत मुंबई उपनगरी मलवानी के स्लम एरिया

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गांव की मीना ने तंगी में छोड़ी पढ़ाई और लिख डाली दो किताबें

लता सिंह, रायपुर(छत्‍तीसगढ़)। गांव में रहने वाली मीना ने छोटी उम्र और तमाम विपत्तियों के बावजूद वह कारनामा कर दिखाया, जो दूसरी लड़कियों की सोच से भी दूर है। साहित्य के प्रति ऐसी लगन कि दो किताबें लिख डाली। लेकिन विडंबना है कि उसे आर्थिक तंगी के चलते पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ गई। आरंग तहसील के ग्राम खुटेरी निवासी मीना जांगड़े पांच भाई और चार बहनों में आठवें नम्बर की है। मीना ने प्राथमिक शिक्षा गांव में ली। माध्यमिक स्कूल गांव में नहीं है, इसलिए उमरिया जाना पड़ा और हाईस्कूल के लिए परसदा। पिता रामबगस जांगड़े और माता जगाना गांव में खेती का काम करते हैं। बड़े भाइयों की घर-परिवार के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं होने के कारण सारा बोझ मीना के ऊपर ही है। गरीब घर और बूढ़े मां-बाप की छोटी बेटी होने के बावजूद मीना ने कभी हार नहीं मानी। घर की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण दसवीं

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कोटा की कोचिंगों को भी पीछे छोड़ता है बिहार का ये गांव-- मनीष शांडिल्यकोटा की कोचिंगों को भी पीछे छोड़ता है बिहार का ये गांव-- मनीष शांडिल्य

बिहार के गया ज़िले की मानपुर पटवा टोली बुनकरों की बस्ती है। हाल के दिनों में यह चर्चा में रहा है। यहां से इस साल 17 छात्र भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के लिए चुने गए हैं। लेकिन ऐसा नहीं नहीं कि यह कोई पहली बार हुआ हो। बीते पांच वर्षों से हर साल करीब 10 छात्र पटवा टोली से लगातार आईआईटी के लिए चुने जाते रहे हैं। इतना ही नहीं बीते दो दशक से अधिक समय से यहां के छात्र लगातार आईआईटी के साथ-साथ भारत के दूसरे नामी-गिरामी इंजीनियरिंग संस्थानों में दाखिला पा रहे हैं। श्रीदुर्गाजी पटवाय जातीय सुधार समिति के सभापति गोपाल पटवा बताते हैं, ‘‘यह सिलसिला 1992 में शुरु हुआ था। अब तक यहां के कम से कम 150 छात्र आईआईटी के लिए चुने गए हैं।''   मंदी से निकले इंजीनियर पटवा टोली के तंग गलियों से गुजरते पावरलूम के ठक-ठक का शोर हमेशा कानों से टकराता रहता है। यहां करीब डेढ़ हजार

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महंगी कोचिंग पर भारी गोरेलाल मास्टर का सरकारी स्कूलमहंगी कोचिंग पर भारी गोरेलाल मास्टर का सरकारी स्कूल

शिवप्रताप सिंह जादौन, मुरैना। शहर से 30 किमी दूर नूराबाद के घने जंगलों में एक छोटा सा प्राइमरी स्कूल है। यहां पदस्थ हैं 51 वर्षीय गोरेलाल मास्टर। 25 साल पहले वे इस स्कूल में आए और उन्होंने जंगल के गांवों में रहने वाले गरीब व आदिवासी बच्चों की किस्मत बदल दी। उन्होंने बच्चों को नवोदय व सैनिक स्कूल प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी शुरू करवाई। अब तक दर्जनों बच्चे एक ही प्रयास में प्रवेश परीक्षाओं को पास कर इन स्कूलों में प्रवेश पा चुके हैं। कुछ तो डॉक्टर, प्राचार्य, इंजीनियर और राष्ट्रीय खिलाड़ी भी बन गए हैं। नूराबाद के घने जंगल में बने प्राथमिक स्कूल करह में पढ़ाने वाले गोरेलाल मास्टर जंगल के गांवों में रह रहे बच्चों के भविष्य निर्माता बन गए हैं और दूसरे शिक्षकों के लिए प्रेरणा। गोरेलाल मास्टर के छोटे स्कूल में हर साल कक्षा एक से लेकर 5वीं तक के मात्र 12 से 15 बच्चे ही पढ़ते हैं।

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