सशक्तीकरण

जंगलों की विरासत सहेजते आदिवासी - बाबा मायारामजंगलों की विरासत सहेजते आदिवासी - बाबा मायाराम

छत्तीसगढ़ के मैकल पहाड़ की तलहटी में बसे आदिवासी वन अधिकार पाने के लिए कोशिश कर रहे हैं। उनकी उम्मीदें राज्य में नई सरकार बनने से बढ़ गई हैं, जो स्वयं भी वन अधिकार देने की प्रक्रिया चला रही है। गांवों में जगह-जगह आदिवासी सामुदायिक वन अधिकार के लिए दावा कर रहे है।   हाल ही मैंने बिलासपुर जिले के करपिहा,जोगीपुर,बैगापारा, मानपुर, सरईपाली आदि कई गांवों का दौरा किया, जहां वन अधिकार कानून के तहत् सामुदायिक वन अधिकार पाने के लिए आदिवासी कोशिश कर रहे हैं। यह इलाका अचानकमार अभयारण्य से लगा है। यहां मैंने प्रेरक संस्था ( राजिम, रायपुर) और विकासशील फाउंडेशन से जुड़े कार्यकर्ताओं के साथ क्षेत्र का दौरा किया। यह संस्था आदिवासियों को वन अधिकार देने की पहल में आदिवासियों की मदद कर रही है।   बैगा और गोंड आदिवासी यहां के बाशिन्दे हैं। बैगा विशेष पिछड़ी जनजाति में आते हैं। जंगल से उनका रिश्ता गहरा है। वे वनोपज

+ कुछ और...
महिला किसानों का संगम रेडियो- बाबा मायाराममहिला किसानों का संगम रेडियो- बाबा मायाराम

तेलंगाना का छोटा गांव है माचनूर। वैसे तो यह गांव आम गांव की तरह है लेकिन सामुदायिक रेडियो ने इसे खास बना दिया है। इस गांव का नाम इतिहास में दर्ज हो गया है, देश का पहला सामुदायिक रेडियो इसी गांव में स्थापित हुआ। एक और इतिहास बना, वह है दलित महिला किसानों ने इसे चलाया। वे रिकार्डिंग से लेकर कार्यक्रम प्रसारित करने तक के सभी काम करती हैं। संगारेड्डी जिले का गांव है माचनूर। जहीराबाद से करीब 10 किलोमीटर दूर निर्जन इलाके के पेड़ों के बीच स्थित है संगम रेडियो स्टेशन। हाल ही विकल्प संगम की बैठक के लिए मैं यहां 26 से 29 नवंबर तक था। इस दौरान में मैंने कई महिला किसानों से बात की। रेडियो स्टेशन देखा और डैक्कन डेवलपमेंट सोसायटी, जिसके प्रयास से यह सब संभव हुआ, उनके निदेशक पी.व्ही.सतीश से मिला और उनसे डीडीएस व सामुदायिक रेडियो की कहानी सुनी। सामुदायिक रेडियो की शुरूआत पौष्टिक अनाजों

+ कुछ और...
दक्षिण भारत का अप्पिको आंदोलन -- बाबा मायारामदक्षिण भारत का अप्पिको आंदोलन -- बाबा मायाराम

हिमालय के चिपको आंदोलन की तरह ही दक्षिण भारत में अप्पिको आंदोलन को काफी मान्यता और ख्याति मिली है। इसे न केवल मीडिया में जगह मिली, बल्कि सरकारी महकमें में काफी सराहना मिली। कर्नाटक सरकार ने जंगल में हरे पेड़ों की कटाई पर पूरी तरह रोक लगा दी, जो आज तक जारी है। हाल ही में मैं 15 सितम्बर को अप्पिको आंदोलन के सूत्रधार पांडुरंग हेगड़े से मिला। सिरसी स्थित अप्पिको आंदोलन के कार्यालय में उनसे मुलाकात और लंबी बातचीत हुई। करीब 34 बीत गए, वे इस मिशन में लगातार सक्रिय हैं। अब वे अलग-अलग तरह से पर्यावरण के प्रति चेतना जगाने की कोशिश कर रहे हैं।   80 के दशक में उभरे अप्पिको आंदोलन में पांडुरंग हेगड़े जी की ही प्रमुख भूमिका रही है। एक जमाने में दिल्ली विश्वविद्यालय से सामाजिक कार्य में गोल्ड मेडलिस्ट रहे हैं। अपनी पढ़ाई के दौरान वे चिपको आंदोलन में शामिल हुए और

+ कुछ और...
महिलाओं की कंपनी ‘साथी’ ने केले के फाइबर से बनाया ‘सैनेटरी पैड’-- रजनीश आनंदमहिलाओं की कंपनी ‘साथी’ ने केले के फाइबर से बनाया ‘सैनेटरी पैड’-- रजनीश आनंद

केला स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से तो एक फायदेमंद फल है, इस बात से तो हम सब वाकिफ हैं, लेकिन क्या आप यह जानते हैं कि केले के पेड़ से सेनेटरी नैपकिन भी बन सकता हैं? अगर आप नहीं जानते तो यह जानकारी आपके लिए बहुत फायदेमंद है. अहमदाबाद की एक कंपनी ‘साथी' ने माहवारी स्वच्छता के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए एक सौ प्रतिशत ‘बायोडिग्रेडेबल' नैपकिन बनाने की शुरुआत की है, इस नैपकिन का निर्मान केले के फाइबर से किया जा रहा है. केले के थम से फाइबर निकालकर उसे कई तरह की प्रक्रियाओं से गुजारने के बाद सेनेटरी नैपकिन का निर्माण किया जाता है. यह सैनिटरी नैपकिन स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से बहुत फायदेमंद है, साथ ही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है कि यह सौ प्रतिशत बायोडिग्रेडेबल है. इससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचता है.   हमारे देश की यह एक सच्चाई है कि मात्र 12 प्रतिशत महिलाएं माहवारी

+ कुछ और...
हरियाली से कुपोषण मिटाने की मुहिम--- बाबा मायारामहरियाली से कुपोषण मिटाने की मुहिम--- बाबा मायाराम

मध्य प्रदेश के बैतूल और हरदा जिले में पिछले कुछ सालों से आदिवासी हरियाली अभियान चला रहे हैं। उनका नारा है- हरियाली लाएंगे, भुखमरी मिटाएंगे।इस मुहिम का उद्देश्य है, पहला तो यह कि आदिवासियों को कुपोषण से निजात मिल सके, उनकी आमदनी बढ़ सके और दूसरा, जंगलों को फिर से हरा-भरा बनाया जा सके, पर्यावरण सुधारा जा सके और जैव-विविधता का संवर्धन और संरक्षण किया जा सके। इससे मिट्टी का कटाव रूकेगा, पेड़ों में पानी संचित रहेगा- और नदियों में फिर से बारहमासी पानी बहेगा।हरियाली अभियान के तहत् हर साल जुलाई माह में आदिवासियों के हरी जिरोती त्यौहार पर पखवाड़े भर हरियाली अभियान के रूप में कार्यक्रमों का सिलसिला चलता है। इस दौरान आदिवासी साप्ताहिक हाट बाजारों में एकत्र होते हैं, ढोल-ढमाकों के साथ फलदार पेड़-पौधों के साथ यात्रा निकालते हैं, और लोगों को फलदार वृक्ष लगाने के लिए प्रेरित करते हैं।इसके लिए बैतूल जिले के तीन गांव मरकाढाना,

+ कुछ और...

Video Archives

Archives

share on Facebook
Twitter
RSS
Feedback
Read Later