नरेगा
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खास बात
• मनरेगा के अंतर्गत साल 2010-2011 में 1 फरवरी, 2011 तक राष्ट्रीय स्तर पर कुल पंजीकृत
परिवारों और व्यक्तियों की संख्या क्रमश 11.62 करोड़
और 25.38 करोड़ है। साल 2010-2011 में 1 फरवरी,
2011 तक जारी किए गए जॉब-कार्ड की संख्या 11.53 करोड़
है। #
• 2010-2011 में 1 फरवरी,
2011 तक राष्ट्रीय स्तर पर कुल 4.24 करोड़ परिवारों ने रोजगार की मांग
की और 4.25 करोड़ परिवारों को रोजगार मुहैया कराया गया। #
• तकरीबन 6.77 करोड़
व्यक्तियों ने इस अवधि में रोजगार की मांग की और रोजगार हासिल हुआ कुल 6.82 करोड़
लोगों को।#
• 2010-2011 में 1 फरवरी,
2011 तक आंध्रप्रदेश ने सर्वाधिक
व्यक्ति-कार्यदिवसों ( 27.48 करोड़) का सृजन किया। तमिलनाडु में यह तादाद 22.44 व्यक्ति-कार्यदिवसों
की रही जबकि राजस्थान में 19.36 करोड़ व्यक्ति-कार्यदिवसों की ।#
• 2010-2011 में 1 फरवरी,
2011 तक राष्ट्रीय स्तर पर 150.97 करोड़ व्यक्ति-कार्यदिवसों का सृजन हुआ। इस अवधि में कुल भरे गए मस्टर
रोल की संख्या रही 1.55 करोड़। #
• 2010-2011 में 1 फरवरी,
2011 तक राष्ट्रीय स्तर पर मनरेगा के अन्तर्गत
अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए कुल 25.76 करोड़ व्यक्ति-कार्यदिवसों का सृजन हुआ और इस योजना में
राष्ट्रीय स्तर पर इस अवधि में महिलाओं के लिए सृजित व्यक्ति कार्य दिवसों की
संख्या रही 75.14 करोड़। #
• राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो केवल 16,98,788 परिवारों को इस अवधि में 100 दिन का
काम मिला।#
• इस अवधि में कुल 8,97,192 पंजीकृत परिवार ऐसे रहे जिन्हें जॉबकार्ड जारी नहीं हुआ। ##
• देश के 625 जिलों में से 517 जिलों( 82.7%) में नरेगा के कामों का सामाजिक अंकेक्षण का काम शुरु हो सका है। ठीक इसी
तरह देश के कुल 248380 ग्राम-पंचायतों में से 182724 में ( 73.6%)
सामाजिक अंकेक्षण आरंभ हुआ है।*
• साल 2010-2011 में 1 फरवरी,
2011 तक देश में नरेगा के लिए हुए सामाजिक
अंकेक्षणों की संख्या 2,92,113 है। इसमें जो सवाल उभरकर सामने आये इनपर कार्रवाई कुल 92,145 सामाजिक अंकेक्षणों में हुई। ( यानी कुल सामाजिक अंकेक्षण के 31.54% में) **
• साल 2010-2011 में 1 फरवरी, 2011 तक अखिल भारतीय स्तर पर नरेगा के काम में लगे श्रम और
सामग्री का अनुपात ग्राम-पंचायत,
प्रखंड और जिला-पंचायत के स्तर पर
क्रमश 2.59: 1.00, 1.14: 1.00 और 1.51: 1.00 का रहा। इसकी आदर्श स्थिति 1.50: 1.00 (यानी 60: 40) की ही। राष्ट्रीय स्तर पर नरेगा के काम में श्रम और सामग्री का अनुपात इस
अवधि में 2.40: 1.00 का रहा। **
• मजदूरी के भुगतान में सांस्थानिक तौर पर एकरुपता लाने के लिए
राज्यों से सिफारिश की गई थी कि भुगतान पोस्ट-ऑफिस या फिर बैंक के जरिए किया जाय।
नरेगा के अन्तर्गत 6.86 करोड़
ऐसे खाते वित्तीय वर्ष 2008-09 में खोले गए हैं। ***
• नरेगा के अन्तर्गत मजदूरी के भुगतान के लिए खोले गए खातों की
संख्या बढ़कर 8.8 करोड़ हो
गई है और 80 % मामलों में मजदूरी का भुगतान इन्हीं
खातों के जरिए हुआ है।***
# एम्पलॉयमेंट जेनेरेटेड ड्यूरिग द ईयर 2010-2011,
## लिस्ट ऑव रजिस्टर्ड फैमिली टू हूम जॉब-कार्ड ईज नॉट इश्यूड 2010-2011,
* सोशल ऑडिट रिपोर्ट ,
** लेबर टू मैटिरियल रेशियो एनालिसिस फॉर द फाईनेन्शियल ईयर 2010-2011,
*** महात्मा गांधी नेशनल रुरल एम्पलॉयमेंट गारंटी एक्ट 2005, रिपोर्ट टू द पी,पल, 2 फरवरी 2006 टू 2 फरवरी 2010
http://nrega.nic.in/circular/Report_to_the_people.pdf
एक नजर
नरेगा को
लेकर पक्ष और विपक्ष से अतिवादी प्रतिक्रियाएं आती हैं।साल 2005 में यह
योजना 200 जिलों में शुरु की गई (और बाद के दिनों में इसका विस्तार
पूरे देश में हुआ), थी तो इस योजना के समर्थकों ने कहा कि यह
ग्रामीण भारत में एक नये युग की शुरुआत है। बहरहाल, नरेगा से
नव-उदारवादी खेमे के प्रभावशाली अर्थशास्त्री इतने नाराज थे कि उनमें से एक ने
कहा-पैसा ही बर्बाद करना है तो इससे बेहतर तरीका है कि हेलिकॉप्टर से नोटों की
बरसात कर दी जाय। आज स्थिति दूसरी है और नरेगा पर अंगुलि उठाने वाले मुख्यतः तीन
वजहों से चुप हैं-(क) योजना को आम तौर पर सफल हुआ बताया जा रहा है, (ख) माना जा
रहा है कि यूपीए के दोबारा सत्तासीन होने में नरेगा की महत्त्वपूरण भूमिका है और
(ग) मंदी की मारी पश्चिमी दुनिया अब लोक-कल्याणकारी कामों में सरकारी खर्च की
दुहाई देने लगी है। नरेगा के आलोचक अब इस योजना में जारी भ्रष्टाचार और गड़बड़
घोटाले की ही बात कर रहे हैं और सच पूछें तो नरेगा में भ्रष्टाचार बड़े पैमाने पर
हो रहा है मगर इतना नहीं कि पानी के सर कुजरने की नौबत आन पड़ी हो।
नरेगा
गरीबी उन्मूलन की अधिकतर योजनाओं से एक बुनियादी अर्थ में भिन्न है। नरेगा में इस
बात की पहचान की गई है कि व्यक्ति को रोजगार का वैधानिक अधिकार होता है।नरेगा के
फुटकल फायदों में शामिल है-ग्रामीण गरीबों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ना, सामुदायिक
संपदा का जिर्णोद्धार और स्त्री-पुरुष की बराबरी।नरेगा को जब याद किया जाएगा तो यह
भी कहा जाएगा कि नरेगा ने भारत में नागरिक समूहों की आवाज को एक नई धार
दी।कल्पनालोक में आदर्श की हांडी में पकायी गई खिचड़ी जान पड़ने वाला एक विचार कई
नागरिक-समूहों, प्रतिबद्ध विशेषज्ञों और तृणमूल स्तर के संगठनों के
साल-दर-साल चलने वाले प्रयासों के बूते आखिरकार हकीकत की जमीन पर नमूदार हुआ।
इनमें से कई कार्यकर्ता अब कारगर सामाजिक अंकेक्षण(सोशल ऑडिट) और मजदूरी के भुगतान
में हुई देरी के लिए मुआवजा देने की मांग उठा रहे हैं और इसके लिए काम कर रहे हैं।
छत्तीसगढ़, राजस्थान
और आंध्रप्रदेश के कुछ प्रमुख स्वयंसेवी संस्थाओं ने अग्रणी विश्वविद्यालयों के
स्नातकों और शहरी युवाओं को अपने काम से जोड़कर नरेगा से संबद्ध हेल्पडेस्क चलाना
शुरु किया है। कुछ जगहों पर ये युवा सोशल-ऑडिट के काम में बी मदद कर रहे हैं।
मिसाल के लिए दिल्ली विस्वविद्यालय के स्वयंसेवकों की मदद एक महीने तक संघर्ष
चलाने के बाद झारखंड के खूंटी और मूरहू प्रखंड के 174 ग्रामीणों को साल 2009 के जून
में 2-2 हजार रुपये का मुआवजा हासिल हुआ जिसे एक साथ जोड़ दें तो यह
रकम 3 लाख 48 हजार रुपये की बैठती है। मुआवजा हासिल करने
वाले ग्रामीणों को नरेगा के अंतर्गत किए गए काम का भुगतान नहीं किया गया था जो
इसके प्रावधानों को घनघोर उल्लंघन है।
नरेगा के
लागू होने से आशाए भले परवान चढ़ी हों मगर इसके साथ एक आशंका यह भी लगी है कि
स्थानीय स्वशासन और सार्वजनिक सेवाओं को मुहैया कराने वाले तंत्र में अगर व्यापक
सुधार नहीं होते तो यह योजना कहीं सरकारी धर्मखाते से दी गई एक और खैरात ना साबित
होकर रह जाय।अनेक विशेशज्ञों का तर्क है कि नरेगा को प्रभावकारी ढंग से लागू करने
के लिए पर्याप्त धन और कार्यदिशा के साथ कार्यकर्ताओं की एक टोली तैयार की जाय जो
पंचायत स्तर पर नरेगा के काम की जिम्मेवारी ले।
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