भोजन का अधिकार

भोजन का अधिकार



खाद्य सुरक्षा विधेयक के बारे में

बहुत संभावना है कि संसद के अगले सत्र में खाद्य सुरक्षा विधेयक पेश किया जाय। विधेयक अपने मौजूदा रुप में भोजन के अधिकार को वैधानिक दर्जा देने के लिए तैयार किया गया है। विधेयक का उद्देश्य लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली(टीपीडीएस) के जरिए विशिष्ट व्यक्ति-समूहों को भोजन के मामले में सुरक्षा प्रदान करना है। संसद की स्थायी समिति(खाद्य, उपभोक्ता मामले और सार्वजनिक वितरण) ने खाद्य सुरक्षा विधेयक से संबंधित अपनी रिपोर्ट 17 जनवरी 2013
को प्रस्तुत
की। समिति ने कुछेक महत्वपूर्ण बिन्दुओं मसलन लाभार्थियों के वर्गीकरण
, नकद-हस्तांतरण और राज्य तथा केंद्र के बीच लागत-खर्च के बंटवारे के बारे में सुझाव दिए हैं।

 

खाद्य सुरक्षा विधेयक और संसद की स्थायी समिति की सिफारिशों का एक तुलनात्मक जायजा नीचे प्रस्तुत किया

जा रहा है-

 

किसे मिलेगी खाद्य सुरक्षा ?

 

खाद्य सुरक्षा विधेयक में कहा गया है कि देश के ग्रामीण क्षेत्र के 75 फीसदी और शहरी क्षेत्र के 50 फीसदी लोगों को खाद्य सुरक्षा प्रदान की जाएगी। इस आबादी का वर्गीकरण दो कोटिय़ों- प्राथमिक(priority) और सामान्य(general)- के रुप में किया जाएगा।  ग्रामीण क्षेत्र से 46 फीसदी लोगों को प्राथमिक वर्ग में रखा जाएगा जबकि शहरी क्षेत्र से 28 फीसदी लोगों को। बाकी जन दोनों ही क्षेत्रों में सामान्य वर्ग में माने जायेंगे।

 

संसद की स्थायी समिति का सुझाव है कि प्राथमिक, सामान्य तथा अन्य वर्ग के रुप में किया गया वर्गीकरण समाप्त किया जाय और इसकी जगह समाविष्ट(included) तथा अपवर्जित(excluded) नाम की दो कोटि बनायी जाय। समाविष्ट कोटि के दायरे में ग्रामीण क्षेत्र की 75 फीसदी आबादी को शामिल किया जाय और शहरी क्षेत्र में 50 फीसदी आबादी को।

 

लाभार्थियों की पहचान कैसे होगी?

 

खाद्य सुरक्षा बिल में कहा गया है कि केंद्र लाभार्थी परिवारों की पहचान के लिए विशेष दिशा-निर्देश जारी करेगा और राज्य सरकारें उन दिशा-निर्देशों के अनुरुप विशेष परिवारों की पहचान करेंगी।

 

संसद की स्थायी समिति की सिफारिश में कहा गया है कि अपवर्जन(exclusion) के लिए केंद्र को चाहिए कि वह साफ-साफ मानक निर्धारित करे और समावेशन(inclusion) के मानकों को तय करने के लिए राज्यों से परामर्श ले।

 

लाभार्थी को क्या मिलेगा?

 

खाद्य सुरक्षा विधेयक के अनुसार प्राथमिक(Priority) वर्ग में आने वाले परिवार में प्रति व्यक्ति प्रति माह 7 किलोग्राम खाद्यान्न दिया जाएगा। इसकी दर चावल के लिए 3 रुपये, गेहूं के लिए 2 रुपये और मोटहन के लिए 1 रुपये प्रतिकिलोग्राम की होगी। सामान्य श्रेणी के लाभार्थी को 3 किलोग्राम खाद्यान्न प्रति व्यक्ति प्रतिमाह के हिसाब से दिया जाएगा और इसकी दर न्यनतम समर्थन मूल्य का 50 फीसदी होगी।

 

संसद की स्थायी समिति के सुझाव के अनुसार समाविष्ट कोटि में प्रति व्यक्ति प्रति माह 5 किलोग्राम खाद्यान्न अनुदानित मूल्य पर दिया जाय। इसके अतिरिक्त दाल, चीनी आदि भी दिया जाय।

 

लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार

 

खाद्य सुरक्षा विधेयक के अनुसार लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार के लिए खाद्यान्न को सीधे राशन दुकान तक पहुंचाया जाय और सूचना प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल किया जाय।

 

संसद की स्थायी समिति के सुझाव के अनुसार सूचना प्रौद्योगिकी से संबंधित विशेष किस्म के उपाय करने होंगे। मिसाल के लिए गोदामों में सीसीटीवी कैमरा लगाना, इंटरनेट का इस्तेमाल, खाद्यान्न ले जाने वाले वाहनों पर नजर रखने के लिए जीपीएस तकनीक का इस्तेमाल। साथ ही प्रति पाँच वर्ष पर लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के क्रियान्वयन का मूल्यांकन करना होगा।

 

केंद्र और राज्यों के बीच लागत-खर्च का साझा कैसे होगा?

 

खाद्य सुरक्षा विधेयक के अनुसार लागत-खर्च का साझा केंद्र और राज्यों के बीच होगा और इस साझे की रुपरेखा केंद्र सरकार तैयार करेगी।

संसद की स्थायी समिति की सिफारिश के अनुसार विधेयक के क्रियान्वयन में राज्यों को अगर अतिरिक्त खर्च वहन करना पड़ता है तो इसके बारे में वित्त आयोग से परामर्श किया जाय।

 

क्रियान्वयन की समय-सीमा क्या होगी?

 

विधेयक के अनुसार केंद्र सरकार इसके बारे में तिथि का निर्धारण करेगी।

 

संसद की स्थायी समिति की सिफारिश के अनुसार राज्य के तर्कसंगत समय-सीमा, मिसाल के लिए एक वर्ष की अवधि, बतायेंगे, और इसके बाद ही विधेयक अमल में आएगा।


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