सोशल ऑडिट

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नरेगा के अन्तर्गत सामाजिक अंकेक्षण के प्रावधान : (विस्तार के लिए उपरोक्त वेबलिंक खोलें)

नरेगा के अन्तर्गत सामाजिक अंकेक्षण के प्रावधान तीन स्तरों पर किए गए हैं। पहला है शुरुआती तैयारी का चरण, दूसरा सामाजिक अंकेक्षण के फोरम से संबंधित है और तीसरा है सामाजिक अंकेक्षण के बाद की गतिविधियों से संबंधित प्रावधान।

सामाजिक अंकेक्षण फोरम यानी ग्राम सभा की मीटिंग हर छह महीने पर अनिवार्य रुप से होनी चाहिए। इसकी अध्यक्षता फोरम द्वारा चुना गया व्यक्ति करेगा और ग्रामसभा के आयोजन की सूचना व्यापक रुप से फैलायी जानी चाहिए।

पहले किए गए सामाजिक अंकेक्षण के क्रम में क्या कार्रवाइयां हुईं इसकी एक रिपोर्ट ग्रामसभा की बैठक में जरुर पढ़ी जानी चाहिए। सभी संबंद्ध अधिकारियों की इस सभा में उपस्थिति अनिवार्य है। साथ ही सभा की कार्रवाही का ब्यौरा सचिव द्वारा विधिवत तैयार किया जाना चाहिए।

 

सामाजिक अंकेक्षण के बाद के चरण में उन सभी शिकायतों पर सुनवाई होनी चाहिए जिनसे काम का ना होना प्रकट होता है। जो भी व्यक्ति नरेगा के कोष की हेराफेरी का दोषी पाया जाय उस पर समुचित कार्रवाई की जानी चाहिए।

 

नरेगा से संबंधित सामाजिक अंकेक्षण के कानून में साफ साफ बताया गया है कि कार्यक्रम के क्रियान्वयन के क्रम में किस चरण में किसकी जिम्मेदारी क्या होगी। कानून में यह भी कहा गया है कि केंद्र सरकार राज्य स्तर पर सामाजिक अंकेक्षण की इकाई को गठित करने और चलाने का खर्च वहन करेगी।

विजन फाऊंडेशन द्वारा प्रस्तुत सोशल ऑडिट-ग्रामसभा एंड पंचायती राज नामक दस्तावेज के अनुसार,

http://planningcommission.nic.in/reports/sereport/ser/stdy
_sagspr.pdf
:

सामाजिक अंकेक्षण वह प्रक्रिया है जिसके सहारे सार्वजनिक एजेंसी द्वारा वित्तीय या गैर वित् संसाधनों के इस्तेमाल का ब्यौरा जनता तक पहुंचाया जाता है और इसके लिए सार्वजनिक मंच का सहारा लिया जाता है।सामाजिक अंकेक्षण से जवाबदारी तय होती है और कामकाज में पारदर्शिता आती है।

पंचायती राज प्रणाली में ग्रामसभा को पंचायतों के प्रभावकारी संचालन में केंद्रीय भूमिका दी गई है। ग्रामसबा के जरिए समाज के कमजोर तबके के सदस्य पंचायत के कामों के संदर्भ में निर्णय प्रक्रिया के साझीदार बनते हैं।

ग्रामसभा के विधिवत संचालन से पार्दर्शिता, जबावदेही और लक्ष्यप्राप्ति को सुनिश्चित किया जा सकता है। ग्रामसभा को पंचायत राजप्रणाली में पहरेदार की भूमिका दी गई है। अधिकांश राज्यों में ग्रामसभा की जिम्मेदारी है कि वह पंचायत के निर्वाचित प्रतिनिधियों के कामकाज की निगरानी करें।

पंचायती राज कानून में ही ग्रामसभा को सामाजिक अंकेक्षण की भी ताकत दी गई है। ग्रामपंचायत, ग्रामसभा और जिलापंचायत के सदस्य अपने प्रतिनिधियों के द्वारा सामाजिक सरोकार और जनहित के मसले उठा सकते हैं और इस संदर्भ में कैफियत तलब कर सकते हैं।

पंचायती राज कानून को ज्यादा कारगर बनाने के लिए भारत सरकार ने 1996 में एक और कानून पंचायतस्(एक्सटेंशन टू द शिड्यूल्ड एरियाज्) नाम से बनाया। इस कानून के तहत संविधान के 73 वें संशोधन अधिनियम(1992) के प्रावधानों को आंध्रप्रदेश, विहार, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और राजस्थान के जनजातीय इलाकों तक विस्तरित किया गया। 24 दिसंबर 1996 को यह अमल में आया।

सामाजिक अंकेक्षण संविधान के 73 वें संशोधन के बाद से अनिवार्य हो गया है। इसके जरिए ग्रामीण समुदाय को अपने अपने इलाके में हर तरह के वैकासिक कार्यों के सामाजिक अंकेक्षण के अधिकार दिए गए हैं । कानून के मुताबिक सामाजिक अंकेक्षण के काम में अधिकारियों को हर तरह की सहायता मुहैया करानी होगी।

पंचायतस्(एक्सटेंशन टू द शिड्यूल्ड एरियाज्-1996) के प्रावधानों के अनुसार गांव में अगर कोई विकास-कार्य हो रहा है तो उसके पूरे होने का प्रमाणपत्र सिर्फ ग्रामसभा जारी कर सकती है।

राजस्थान पंचायती राज(संशोधन) अधिनियम 2000 के अन्तर्गत कहा गया है कि वार्डसभा अपने कामों का विस्त-त ब्यौरा तैयार करके पेश करेगी और इलाके में हुए तमाम वैकासिक कामों के सामाजिक अंकेक्षण के लिए जवाबदेह होगी।

मध्यप्रदेश में सामाजिक अंकेक्षण के लिए एक अधिसूचना जारी की गई। देखें अधिसूचना संख्या- 18069/22/JRY/vi - 7/96 dev. October 30th 1996.

उड़ीसा में ग्रामीण विकास के कामों के सामाजिक अंकेक्षण के लिए सितंबर 2002 में अधिसूचना जारी की गई।


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