सोशल ऑडिट

सोशल ऑडिट

एम पार्थसारथि द्वारा प्रस्तुत सोशल ऑडिट एंड इट्स् रेलीवेंस टू ऑडिट ऑव पब्लिक यूटिलिटीज नामक शोधपत्र के अनुसार-

http://www.asosai.org/journal1988/social_audit_and_its_relevance.htm:

सामाजिक अंकेक्षण के लिए अनेक देशों में विविध मॉडल तैयार किए गए हैं लेकिन किसी एक प्रामाणिक मॉडल पर अभी तक सहमति नहीं बन पायी है। सामाजिक अंकेक्षण के लिए सर्वाधिक जरुरी है जिम्मेदारी तय करने की मंशा से सार्वजनिक उपक्रमों के कामकाज की रिपोर्ट तैयार करना और इन्हें सार्वजनिक करना।

सामाजिक अंकेक्षण के क्रम में शायद सबसे बड़ी बाधा सूचना हासिल करने की प्रणाली का कारगर नहीं होना है। सूचना के अभाव में लोककल्याण के कार्यक्रमों के क्रियान्वयन की जरुरी जानकारी नहीं हो पाती और सामाजिक अंकेक्षम का काम अधूरा रहता है। सूचना जुटाने और इनके विश्लेषण का औपचारिक तरीका सामाजिक अंकेक्षण के काम में बाधा पहुंचाता है।

अमिताभ मुखोपाध्याय द्वारा प्रस्तुत सोशल ऑडिट नामक शोधपत्र के अनुसार-

 http://www.india-seminar.com/2005/551/551%20amitabh%20mukh
opadhyay.htm

साल 1992-93 में किए गए संविधान संशोधन के बाद यह बात साफ हो गई कि स्थानीय स्वशासन की प्रणाली में ग्रामसभा और म्युनिस्पल वार्ड ही जवाबदेही तय करने की भूमिका निभायेंगे। अधिकारी वर्ग का काम इसमें सहयोग करना होगा चाहे यह अधिकारी वर्ग ग्राम पंचायत का निर्वाचित प्रतिनिधि ही क्यों ना हो। जवाबदेही तय करने का काम जनता करेगी क्योंकि विकास कार्य का एकमात्र लक्ष्य वही है।

सामाजिक अंकेक्षण के काम से लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया को बढ़ावा मिला है। पंचायतों और म्युनिस्पल वार्डों की जिम्मेदारी होती है कि वे गरीबी उन्मूलन और वंचित वर्गों के सशक्तीकरण से संबंधित कार्यक्रमों को लागू करें लेकिन पंचायत और म्युनिस्पल स्तर पर जवाबदारी तय करने की मशीनरी सामाजिक अंकेक्षण के प्रावधानों के बावजूद बहुत कमजोर है। ज्यादातर राज्यों ने इस दिशा में आधे अधूरे मन से कदम उठाये हैं। संविधान संशोधन के बाद जिला नियोजन समितियों को नियोजन का अधिकार मिला लेकिन ग्राम स्तर पर नियोजन के लिए जिला स्तरीय समितियां कारगर प्रयास नहीं करती।तालुक और ग्राम पंचायत के स्तर पर रिकार्ड कीपिंग का काम हेरफेर का शिकार होता है अथवा उसमें तार्किक संगति का अभाव मिलता है। किसी विकास कार्य के पूरे होने का प्रमाणपत्र जारी करने से पहले स्थानीय शासन की इकाइयां योरोप में संबद्ध जनता की शिकायतों को भी सुनती हैं लेकिन भारत में यह बात अभी तक अमल में नहीं आ पायी है।


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