| हमने पत्रकारिता के उसूलों की हिफाजत की | |
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बोफोर्स कांड अब एक ऐसा नासूर बन गया है, जो रह-रहकर रिस उठता है। स्वीडन
के पूर्व पुलिस प्रमुख स्टेन लिंडस्ट्रॉम ने हाल ही में एक इंटरव्यू में
कुछ नई बातें कही हैं, जिनसे यह मामला फिर सुर्खियों में आ गया है। बोफोर्स
सौदे में शीर्ष स्तर पर हुए भ्रष्टाचार का जो खुलासा हुआ, उसमें द हिंदू
अखबार के पूर्व प्रधान संपादक एन राम का किरदार काफी अहम था। एन राम से उस
खबर की तफ्तीश और विवादों के बारे में निखिल कनकल ने बात की। प्रस्तुत हैं,
उसके कुछ अंश-( दैनिक हिन्दुस्तान । |
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| ‘आप गलतफहमी के शिकार हैं. हमने भूमि सुधारों को बैकबर्नर पर नहीं डाला है’ | |
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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से बात करना आसान
नहीं. उन्हें केंद्र और राज्य दोनों तरह की सरकारों में काम करने का खासा
अनुभव है. वे हिंदीभाषी प्रदेशों के उन गिने-चुने नेताओं में से हैं जो
बढ़िया वक्ता हैं. काफी पढ़े-लिखे हैं और राजनीति के उथल-पुथल वाले 70 और
80 के दशक में उन्होंने आजादी के बाद के, कांग्रेस से अलग धारा में काम
करने वाले कई प्रमुख नेताओं के करीब रहकर काम किया है. प्रदेश में आज क्या
हो रहा है इसके छोटे से छोटे बिंदु की भी उन्हें गहरी से गहरी ज। |
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| 'अन्ना हमारे नेता हैं. मैं तो बस उन्हें दफ्तरी मदद उपलब्ध करवाता हूं' | |
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अरविंद केजरीवाल से बातचीत का यह अंश तहलका(हिन्दी) से साभार लिया जा रहा है।
अरब दुनिया में आई क्रांति की लहर की तरह शुरू
हुआ अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन अब एक अलग दिशा में जाता दिख
रहा है. यह दिशा बिखराव और साख में गिरावट की है. गिरावट कई मोर्चों पर
देखने को मिल रही है. पहला मोर्चा तो एकजुटता का ही है. कश्मीर पर प्रशांत
भूषण के बयान के बाद उनके साथ कुछ लोगों द्वारा हुई मारपीट के बाद बाकी टीम
ने इस कृत्य की भर्त्सना तो की मगर साथ ही यह भी जोड़ा कि । |
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| मैंने नहीं कहा अन्ना संसद से ऊपर - अरविन्द केजरीवाल | |
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भ्रष्टाचार के खिलाफ अलख जगाने वाली टीम अन्ना के कुछ सदस्य अब विवादों के
घेरे में आने लगे हैं। कहीं उनके अंतर्विरोध उजागर हो रहे हैं, और कहीं
उसके सदस्यों पर हमले हो रहे हैं। इन्हीं सब मुद्दों पर टीम अन्ना के
प्रमुख सदस्य अरविंद केजरीवाल से बातचीत की दैनिक हिन्दुस्तान के प्रवीण प्रभाकर ने। प्रस्तुत
हैं बातचीत के अंश:
आप पर चप्पल फेंकी गई। प्रशांत भूषण पर घूंसे चले। क्यों हो रहे हैं हमले? कहीं राजनीतिक सक्रियता तो इसकी वजह नहीं?
जी नहीं, मुद्दे से ध्यान । |
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| 'आरटीआई संज्ञा नहीं अब क्रिया हो गई है' दैनिक हिन्दुस्तान के विशेष संवाददाता श्याम सुमन की प्रस् | |
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देश के इतिहास में आरटीआई ऐक्ट एक ऐसा कानूनी दस्तावेज है, जो जनता का राज सुनिश्चित करता है। इस कानून ने नागरिकों को अधिकारों से लैस किया है, जिससे सरकारी तंत्र की नींद टूटी है और उसे जनता के प्रति अपनी जवाबदेही का अहसास हुआ है। लेकिन इन अधिकारों से अब सरकार कुछ परेशान-सी दिख रही है और सरकार में यह मत बनने लगा है कि इस कानून की समीक्षा की जाए। सरकार इसके पीछे सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सहारा ले रही है, जिसमें कहा गया है सूचना के अधिकार से लोग ईमानदार अफसरों को डरा र। |
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