भू-अधिग्रहण बिल में जीविका का सवाल?

क्या सरकार आजीविका से वंचित होने वाले गरीबों की परेशानियों का ख्याल किए बगैर एक नया भू-अधग्रहण बिल लाने की तैयारी में है।जन-आंदोलनों और सामाजिक रुप से सक्रिय कई समूहों का आरोप है कि हरियाणा में पैसा दो-जमीन लो का जो मॉडल आजमाया जा रहा है या फिर मायावती सरकार जमीन पर कब्जे के लिए जो तरीके अख्तियार कर रही है वह भी अपनी जगह-जमीन से बगैर मुआवजा या पुनर्वास के उजड़ने वाले लोगों के लिए तना ही खतरनाक है।

जन-आंदोलनों की मांग है कि भू-अधिग्रहण के साथ-साथ पुनर्वास और पुनर्स्थापन बिल लाने की जगह सरकार को एक व्यापक और सांविधानिक रुप से सक्षम विकास नियोजन-नीति बनानी चाहिए।इन समूहों(देखें नीचे दी गई सूची) का कहना है कि वे अक्तूबर महीने में संसद शीतकालीन सत्र से तुरंत पहले भूमिहीनों, वंचित वर्गों और वनवासी समुदाय की चिन्ताओं को जाहिर करने के लिए जन-संसद का आयोजन करेंगे क्योंकि इन वर्गों की प्रस्तावित भूमि-अधिग्रहण बिल में अनदेखी की गई है।

अनुमान है कि प्रस्तावित भू-अधिग्रहण बिल शीतकालीन सत्र में संसद में पेश किया जाएगा। साल 2009 में भू-अधिग्रहण संशोधन बिल लोकसभा में पेश किया गया था लेकिन उसके प्रारुप पर सहमति नहीं बन पायी थी।निर्माधीन यमुना एक्सप्रेस के इलाके में भूमि-अधिग्रहण  मुद्दे पर यूपी में किसानों के हिंसक प्रतिरोध के बाद हाल ही में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी ने आश्वासन दिया है कि शीतकालीन सत्र में भूमि-अधिग्रहण और पुनर्वास बिल को दोबारा पेश किया जाएगा। 

बहरहाल, नागरिक संगठनों को आश्ववस्त करने के बजाय सरकार ने प्रस्तावित बिल के विधानों से जन-आंदोलनों के कान खड़े कर दिए हैं। सामाजिक समूह इस बिल के मुद्दे पर एकजुट हो रहे हैं क्योंकि उन्हें भय है कि वंचित तबकों विशेषकर वनवासी समुदाय की वास्तविक चिन्ताओं को दरकिनार करके बिल को हड़बड़ी में पारित कर दिया जाएगा।

चौदहवीं लोकसभा में पेश बिल के प्रारुप की व्यापक आलोचना करते हुए सामाजिक संगठनों ने कहा था कि इस बिल में पिछले कई सालों की भागीदारी और परामर्श की लंबी प्रक्रिया से बनी सहमति की अनदेखी की गई है। इन समूहों ने भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर बनने वाली की किसी भी नीति के लिए चार अनिवार्य सिद्धांत नीयत किए हैं-

(इन समूहों का कहना है कि ये सिद्धांत पूरे देश में चलने वाले जन-आंदोलनों के बीच हुए आपसी परामर्श से एक लंबी अवधि में उभर कर सामने आये हैं)

भूमि-अधिग्रहण का कोई भी कानून यह मानकर चले कि लोगों का प्राकृतिक संसाधनों(भूमि सहित) पर व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकार होता है।

             परियोजना की नियोजन प्रक्रिया में विकल्प के निर्धारण को अनिवार्य हिस्सा मानकर चला जाय और इसे सबसे छोटी इकाई मसलन ग्राम-सभा या बस्ती से लागू किया जाय।

             अगर भूमि-अधिग्रहण से कहीं विस्थापन हो रहा हो तो यह विस्थापन बगैर प्रभावित समुदाय की अनुमति के स्वीकार नहीं है।

             पुनर्वास का मतलब है सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रुप से एक वैकल्पिक जीवन की व्यवस्था और ऐसा तबतक नहीं हो सकता जब तक विस्थापित समुदाय के लिए आजीविका की व्यवस्था ना हो जाय। खेतिहर और वनवासी समुदाय के लिए आजीविका की यह व्यवस्था भूमि- आधारित ही हो सकती है।

सामाजिक संगठनों का कहना है कि पुनर्वास के मसले पर सरकारी हलके में व्याप्त सोच इस बात की कत्तई फिक्र नहीं करती कि जिसके बास प्राकृतिक संसाधनों पर अपने मालिकाना हक को साबित करने के लिए दस्तावेज नहीं है उसका क्या होगा जबकि कुछेक समुदाय सदा से अपनी आजीविका के लिए उसी पर निर्भर रहे हैं और परंपरा से इन समुदायों का अधिकार प्राकृतिक संसाधनों पर स्वीकार किया जाता रहा है।निम्नलिखित तबकों को सरकारी पुनर्वास नीति में कभी भी जगह नहीं मिली है-

             पर्वतीय इलाकों में जब भी भूमि-अधिग्रहण होता है चारागाहों की एक बड़ी भूमि दखल कर ली जाती है। इस भूमि पर पशुपालक समुदाय सदियों से अपने पशुओं के चारे के लिए निर्भर रहा है। चारागाह की ऐसी भूमि के अधिग्रहण से पशुपालक समुदाय की आजीविका तो जाते रहती है लेकिन उसे मुआवजा नहीं मिलता। 

             ऐसा ही एक उदाहरण असम का है जहां 168 बाँध बनाये जाने हैं। यह एक मानी हुई बात है कि बांधों के निर्माण से जलधारा के निम्ववर्ती प्रवाह वाले क्षेत्र के मछुआरों की आजीविका का साधन छिन जाता है क्योंकि फिर मछली मारने के लिए कोई जगह नहीं रह जाती।बहरहाल, अब तक बनी किसी भी नीति में जलधारा के निम्नवर्ती इलाके में रहने-जीने वाले मछुआरों के पुनर्वास के लिए कोई बात नहीं कही गई है।

             X और  XI अनुसूची क्षेत्र के कस्टमरी लॉ को पूरे भारत में सांविधानिक स्वीकृति प्राप्त है लेकिन भूमि-अधिग्रहण और पुनर्वास की नीतियों में इसकी अनदेखी की जाती रही है। पर्वतीय इलाकों में परंपरागत रुप से सामुदायिक हकदारी का चलन होने से किसी के पास प्राकृतिक संसाधन पर अपना अधिकार साबित करने के लिए दस्तावेज नहीं होता। ऐसी सूरत में पूरे समुदाय का मुआवजा मारा जाता है। असम में जिन लोगों के पास मालिकाना हक साबित करने वाले दस्तावेज थे उन्हें मुआवजे के तौर पर 70 हजार रुपये प्रति बीघा मिला लेकिन पर्वतीय इलाके के लोगों को इतनी ही जमीन के लिए महज 16 हजार रुपये दिए गए।

             पर्वतीय इलाके की जमीन के मूल्यांकन के लिए कोई आधार तय नहीं किया गया है। यहां की जमीन पर जल-संसाधनों के अतिरिक्त दुर्लभ जड़ी-बूटी और वन-संपदा होती है। विकास के लिए जब पर्वतीय इलाके में जमीन ली जाती है तो ये संसाधन भी खत्म हो जाते हैं। ऐसे प्राकृतिक संसाधनों के लिए कोई भी मुआवजा दिया जाय कम ही कहा जाएगा क्योंकि इन चीजों से पर्वतीय इलाके के लोगों का जीवन बनता-चलता है।

             भूमिहीन मजदूर, गांव के दस्तकार और पशुपालक आदि भी स्थानीय समुदाय से अपनी आपसदारी के कारण वहां जीविका कमाते हैं।लेकिन विस्थापन के समय सरकार इनके पुनर्वास के बारे में कभी नहीं सोचती।

सामाजिक संगठनों का कहना है कि प्रस्तावित बिल में इन मसलों पर जरुर सोचा जाना चाहिए। संगठन सार्वजनिक हित के नाम पर निजी कंपनी के लिए जमीन जुटाने के सरकारी चलन का भी विरोध कर रहे हैं। संगठनों का कहना है कि जमीन अधिग्रहण के मामले में फिलहाल जो विधान है(कंपनी द्वारा 70 फीसदी और सरकार द्वारा 30 फीसदी जमीन जुटाना) उसे समाप्त किया जाना चाहिए।संगठन चाहते हैं कि निम्नलिखित बातों पर प्रस्तावित विधेयक का रुख एकदम स्पष्ट हो-

-      सार्वजनिक हित की व्याख्या करते हुए हमेशा देश के विकास के लक्ष्य को एक संदर्भ बिन्दु माना जाय। फिलहाल. सार्वजनिक हित का व्याख्या इतने ढीले-ढाले ढंग से की गई है कि उसमें निजी हितों को प्रधानता मिल जाती है।

-      नियोजन प्रक्रिया में विकल्पों के मूल्यांकन और चयन का विधान

-      अपनाये जाने वाले प्रशासनिक तंत्र को लोकतांत्रिक बनाया जाय।

-      भू-अधिग्रहण की प्रक्रिया राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किए गए मानवाधिकार संधियों के अनुरुप हो।

-      पुनर्वास न्यायसंगत हो।

-      नर्मदा बचाओ आंदोलन, हिमालय नीति अभियान, भूमि बचाओ आंदोलन, नदी घाटी मोर्चा, घर बचाओ-घर बनाओ आंदोलन, नेशनल हॉकर्स फेडरेशन जैसे संगठन तथा मेधा पाटकर, बी डी शर्मा प्रफुल्ल सामंत्र जैसे जन-नेताओं ने ये मांग उठायी है।

-      विस्तृत जानकारी के लिए कृपया देखें-

THE LAND ACQUISITION ACT, 1894
http://dolr.nic.in/hyperlink/acq.htm

http://revenueassam.nic.in/Assam%20Land%20Acquisition%20ma
nual.pdf


Constitutional Validity of the Land Acquisition Act, 1984
http://www.legalserviceindia.com/article/l295-Land-Acquisi
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Land Acquisition (Amendment) Bill: A slow but sure step forward

http://sanhati.com/articles/1730/

Haryana: Policy regarding acquisition of land for private deployment and in public-private partnership for setting up of Special Economic Zones

http://haryana.gov.in/Policy_of_SEZ.pdf

Policy for Rehabilitation and Resettlement of Land Owners, Land Acquisition Oustee, http://huda.nic.in/oust.htm

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Miners may’ve to share revenues with displaced by Subhash Narayan & Rohini Singh, The Economic Times, 13 September, 2010, http://economictimes.indiatimes.com/news/news-by-industry/
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