Event

ताज होटल पैलेस में टायलेट फेयर

निम्नलिखित सूचना के आलोक में आपकी प्रतिभागिता का निवेदन है. कृपया ध्यान दें की प्रतिभागिता आमंत्रण-पत्र के आधार पर ही सुनिश्चित होगी इसलिए दिए गए ईमेल पते पर समय रहते संपर्क कर लें. Participants: More than 600 participants, including 50 exhibitor teams, foundation grantees, industry leaders, government representatives, and other local and international partners   Participant Details The Reinvent the Toilet Fair will begin at approximately 10 am on Thursday, March 20 and conclude at approximately 8 pm on Saturday, March 22. We encourage you to attend on March 20 as the opening day of the fair is reserved for our VIP guests. Please confirm your participation via email to Chaitanya Datta (Chaitanya.datta@GatesFoundation.org) or ReinventedToilet@GatesFoundation.org before 3rd March, 2014. Please note that this event is by invitation-only and the invitations are non-transferable. Travel, hotel and ground transportation Participants are requested to make their own arrangements. The foundation will provide support to a limited number of participants based

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घरेलू नौकरों के जीवन और जीविका की दशा पर परिचर्चा

इन्क्लूसिव मीडिया फॉर चेंज, सीएसडीएस, द्वारा आयोजित परिचर्चा में आप सादर आमंत्रित हैं   विषय- Work like any other? Accounting for domestic work in India वक्ता: भारती बिरला, राष्ट्रीय परियोजना समायोजनक, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन(ILO)   नीता पिल्लई, प्रोफेसर, सेंटर फॉर विमेन्स डेवलपमेंट स्टडीज          अमरजीत कौर, राष्ट्रीय सचिव, ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस   मैक्सिमा एक्का,डोमेस्टिक वर्कर्स फोरम ब्रदर वर्गीज थेकनाथ- समायोजक, डोमेस्टिक वर्कर्स फोरम ऑव इंडिया   तारीख: 19 फरवरी ∣ स्थान: प्रेस क्लब ऑव इंडिया ∣ समय: 11 बजे दिन से 1.00 अपराह्न तक   बीते एक दशक(साल 1999-2000 से 2009-10) में भारत के शहरी इलाकों में घरेलू नौकरों की संख्या में 68 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। अनुमानों के मुताबिक भारत में घरेलू नौकरों की संख्या तकरीबन 1 करोड़ है। श्रमशक्ति का यह हिस्सा देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान करता है। इसके बावजूद समाज इन्हें कामगार के रुप में स्वीकार करने के मामले में अभी पीछे है और घरेलू नौकर के रुप में काम करने वाले लोग श्रम-कानूनों से हासिल होने वाले लाभ

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पेंशन-परिषद का धरना- दिल्ली में

पांच राज्यों में चुनाव की घोषणा की जा चुकी है।इनमें एक राज्य दिल्ली भी है।इस बात को ध्यान में रखते हुए यह महसूस किया गया कि 25 नवंबर से पेंशन के मुद्दे पर जोर देना उचित रहेगा. हमारा जोर रहेगा कि हम मांग लेकर आये हैं-पेंशन लेकर जायेंगे.हमारा शुरुआती इरादा है कि हम कम से कम एक महीने एक लिए बैठें जबतक हमारी मांग काफी हदतक पूरी ना हो।

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नये भूमिअधिग्रहण कानून, जनआंदोलन और उनकी राजनीति का असर पर दो दिवसीय बैठक

निमंत्रण नये भूमिअधिग्रहण कानून, जनआंदोलन और उनकी राजनीति का असर पर दो दिवसीय बैठक नवंबर 19-20-2013 9ः30 प्रातः से सांय 6ः00 बजे तक, गांधी शांति प्रतिष्ठान, दीन दयाल उपाध्याय मार्ग, नई दिल्ली प्रिय साथियों, जिंदाबाद जनआंदोलनांे के बरसों चले लम्बे संघर्ष के बाद देश में औपनिवेशिक भूमि अधिग्रहण कानून, 1894 के स्थान  पर ‘‘उचित मुआवजे का अधिकार, भूमिअधिग्रहण में पारदर्शिता, पुनर्वास और पुर्नस्थापना कानून, 2013‘‘ आया है। आम चुनाव व विधानसभा चुनाव कई राज्यों में होने वाले है। राजनीतिक दल, सत्ता व विपक्ष इन सभी ने  मतदाताओं को निशाना बनाते हुए नयी-नयी योजनाओं और कानूनों पर काम करना शुरू कर दिया है। निर्वाचन क्षेत्रों में भी खूब हलचल हो रही है। सत्तानशीन यू.पी.ए. सरकार ने चुनावों को ध्यान में रखते हुए और अपना राजनीतिक लाभ देखते हुए कुछ महत्वपूर्ण कानून भी पारित किए हैं। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के साथ-साथ नया भूमि अधिग्रहण बिल 2013 भी लागू किया। यद्यपि विकास की प्रक्रिया में लोगों की भागीदारी जैसे

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परिचर्चा: विकास की अवधारणा

निमंत्रण                      परिचर्चा: विकास की अवधारणा                                 डॉ. शिवराज सिंह (योजना मंडल) और प्रो. हनुमंत यादव,                                                 चर्चा में- बी.के.मनीष के साथ.   छत्तीसगढ़ इलेक्शन वॉच की ’विधानसभा चुनाव जागरूकता कार्यक्रम श्रृंखला” की पहली कड़ी.                       सायं ४ बजे, मंगलवार, २२ अक्टूबर, प्रेस क्लब, रायपुर. धार्मिक ध्रुवीकरण तथा सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को पार कर के अब चुनाव विकास के मुद्दे पर लड़े जा रहे हैं। जहां राज्य और केंद्र की वर्तमान सरकारें चहुंमुखी विकास विकास के दावे करते नहीं थक रही हैं वहीं विपक्ष भी विकास के मुद्दे पर ही सत्ता छीनने की कोशिश कर रहा है। इस हड़बोंग में आम जनता और खास तौर पर आदिवासी तबका तथाकथित विकास में अपना हिस्सा तलाश कर रहा है। विकास की परिभाषा को लेकर यह असमंजस केवल आम जनता और राजनीतिक पंडितों तक सीमित नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर अर्थशास्त्री, पर्यावरणविद, राजनेता और प्रशासक इस मसले पर आरोप-प्रत्यारोप की अंतहीन श्रृंखला में उलझे नज़र आते हैं। विकास की अवधारणा के मसले पर प्रचुर संसाधन और बहुसंख्य आदिवासी आबादी वाले छत्तीसगढ़ का अस्तित्व

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