क्या सचमुच सरकार ने किसानों को फसल की लागत का ड्योढ़ा मूल्य दिया है?

क्या सचमुच सरकार ने किसानों को फसल की लागत का ड्योढ़ा मूल्य दिया है?

आर्थिक मामलों की काबीना समिति की हाल की एक प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक साल 2019-20 में बिक्री के लिए तैयार खरीफ की तमाम फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य उत्पादन लागत से कम से कम 50 फीसद ज्यादा घोषित किया गया है.

 

नये बजट के पेश होने के दो दिन पहले जारी इस आधिकारिक घोषणा से ऐसा जान पड़ता है मानो केंद्र की नयी सरकार ने अपना वादा निभाया है और किसानों को उनकी फसल का लाभकारी मूल्य दिया जा रहा है(जैसा कि हाल में कई किसान संगठनों ने मांग की थी). किसान-संगठनों की मांग थी कि किसानों को उनके ऊपज के लागत मूल्य से कम से कम डेढ़ गुना ज्यादा दाम दिया जाय.


इन्क्लूसिल मीडिया फॉर चेंज का आकलन है कि प्रेस-विज्ञप्ति की सूचना भ्रामक है और खरीफ फसलों के लिए घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य किसान-संगठनों की मांग के अनुरुप नहीं है बशर्ते हम फसल के उत्पादन-मूल्य की गणना 'C2' के रुप में करें ना कि 'A2+FL' के रुप में. उत्पादन-लागत को 'C2' के रुप में देखने का मतलब है, उत्पादन के प्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष तमाम पहलुओं को आपस में जोड़ना जबकि 'A2+FL' में कृषि-उत्पादन के प्रत्यक्ष लागत को ही ध्यान में रखा जाता है.(इन दोनों लागतों के आपसी अन्तर की समझ बनाने के लिए कृपया देखें हमारा पूर्ववर्ती न्यूज एलर्ट)


नीति आयोग के सदस्य प्रोफेसर रमेश चंद के मुताबिक कृषि-उत्पादन की ‘A2' लागत में फसल के उत्पादन में किसान द्वारा नकदी या फिर वस्तु-रुप में चुकायी गई कीमत जैसे कि खाद, बीज, कीटनाशक, मजदूर, मशीन, सिंचाई आदि की खरीद के भुगतान के क्रम हुए खर्च को जोड़ा जाता है. साथ ही, अगर जमीन पट्टे पर ली हुई है जो इस मद में खर्च हुई रकम को भी जोड़ा जाता है. इससे अलग 'C2' उत्पादन-लागत की गणना में ‘A2' मद में खर्च हुई राशि के अतिरिक्त यह भी देखा जाता है कि किसान के अपने परिवार के लोगों ने खेत में काम किया तो उनकी मजदूरी कितनी हुई है, साथ ही जिस मालिकाना जमीन पर खेती की जा रही है वह एक पूंजी के रुप में सूद की कितनी रकम अर्जित करती तथा उसे पट्टे के तौर पर देने से कितनी आमदनी हो सकती थी. इस तरह ‘A2' अथवा 'A2+FL'.की तुलना में 'C2' हमेशा ही ज्यादा होता है.


विगत 3 जुलाई को जारी विज्ञप्ति में सरकार ने फसल के उत्पादन-लागत की गणना 'A2+FL' के रुप में की गई है और इसी गणना के आधार पर कहा है कि खरीफ मौसम की 14 फसलों के उत्पादन-लागत से किसानों को डेढ़ गुना ज्यादा मूल्य दिया जा रहा है. गौरतलब है कि जारी प्रेस विज्ञप्ति में इस बात का कहीं भी संकेत नहीं है कि खरीफ मौसम की फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा के लिए उत्पादन-लागत के रुप में ' A2+FL ' का इस्तेमाल हुआ है या 'C2' का.


संबंधित आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर इन्क्लूसिव मीडिया फॉर चेंज का आकलन है कि 2019-20 के खरीफ मार्केटिंग सीजन के लिए खरीफ की सभी 14 फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य और A2+FL उत्पादन-लागत के बीच 50 प्रतिशत या इससे ज्यादा का अन्तर है यानि घोषित समर्थन मूल्य उत्पादन लागत से ज्यादा है.(देखें इससे सबंधित तालिका-1) मिसाल के लिए, बाजरा का उदाहरण लिया जा सकता है. अगर बाजरा के उत्पादन-लागत मूल्य की गणना A2+FL पद्धति के आधार पर करें तो तालिका से स्पष्ट होता है कि इस फसल का घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य उत्पादन लागत से 84.67 प्रतिशत ज्यादा है.


लेकिन खरीफ मौसम की सभी 14 फसलों के उत्पादन-लागत की गणना 'C2' पद्धति के आधार पर करें तो स्पष्ट होगा कि इन फसलों का घोषित समर्थन-मूल्य (कृषि मार्केटिंग सीजन 2019-20) किसी भी फसल के मामले में उत्पादन-लागत का डेढ़ गुणा नहीं है. (स्पष्टता के लिए देखें तालिका- 2)


गौरतलब है कि केंद्र में नई सरकार की अगुवाई कर रही भारतीय जनता पार्टी ने 2019 के चुनावी घोषणापत्र में कहा था कि किसानों को लाभकर मूल्य देने के लिए पिछली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन(एनडीए) की सरकार ने 22 फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य लागत से डेढ़ गुना ज्यादा बढ़ा दिया.

 




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