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सूचना का अधिकार

रुआती सालों में राजस्थान के ग्रामीण इलाके के लोगों की हक की लड़ाई लड़ते हुए मजदूर किसान शक्ति संगठन ने व्यक्ति के जीवन में सूचना के अधिकार को एक नये ढंग से रेखांकित किया। य

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मानवाधिकार

रण कुछ लोगों को फुटपाथ और गलियों के कोने-अंतरे में रहना पड़ता है ताकि वे अपनी मजदूरी मिले कुछ पैसे बचा सकें.   ---- 2011 के स्लमस् सेन्सस के तथ्यों से पता चलता है कि तमिलनाडु में

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खेती पर असर

ी का 70 फीसदी हिस्सा खेती से आता है, सो इस गांव का हर बालिग व्यक्ति या तो खेतिहर मजदूर है या किसान। गांव के कुछ व्यक्ति सरकारी नौकरी, छोटे-मोटे कारोबार या निर्माण-कार्यों के लिए

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शिक्षा

रीबी के जाल में फंसेगी। •        बढती गरीबी, बेरोजगारी और घटती मजदूरी के कारण कई गरीब परिवार शिक्षा पर हो रहे अपने खर्चे में कटौती कर रहे हैं और अपने बच्चों का ना

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असुरक्षित परिवेश

ग 70 फीसदी है। • सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं के अतिरिक्त किसानों और खेतिहर मजदूरों को खाद, कीटनाशक और खरपतवारनाशक तथा मशीनों के अत्यधिक इस्तेमाल के कारण कुछ विशेष स्वास्थ

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मानव विकास सूचकांक

निकलकर आता है।.*** * साल 1993–94 और साल 2004–05 यानी कुल दस सालों की अवधि में खेतिहर मजदूर परिवारों की गरीबी के लिहाज से आंकडे में कोई खास परिवर्तन नजर नहीं आता। ग्रामीण गरीब परिवार

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सार्वजनिक वितरण प्रणाली

परिवारों के पास कोई कार्ड नहीं है। •  देश के ग्रामीण अंचलों में दिहाड़ी मजदूरी करने वाले खेतिहर तथा गैर-खेतिहर परिवारों में अंत्योदय कार्डधारियों की संख्या सबसे ज्याद

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भुखमरी-एक आकलन

र इसके फलस्वरुप ना खरीदा हुआ अनाज गोदामों में पड़ा रहा। साल १९९० के दशक में मजदूरों-किसानों की खरीददारी की क्षमता में काफी कमी आई-खासकर ग्रामीण भारत में। इससे एक तरफ ग्रामी

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नरेगा

ोजगार पा सके.   • वित्तवर्ष 2015-16 में मनरेगा में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन औसत मजदूरी 154 रुपये की रही.  इन तथ्यों के स्रोत के लिए देखें आगे के पृष्ठ एक नजर नरेगा को ल

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पलायन (माइग्रेशन)

लायन करने वालों की संख्या कुल पलायन का ५४.७ फीसदी है।* • भारत में आप्रवासी मजदूरों की कुल संख्या साल १९९९-२००० में १० करोड़ २७ हजार थी। मौसमी पलायन करने वालों की संख्या २ कर

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