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मानव विकास सूचकांक

निकलकर आता है।.*** * साल 1993–94 और साल 2004–05 यानी कुल दस सालों की अवधि में खेतिहर मजदूर परिवारों की गरीबी के लिहाज से आंकडे में कोई खास परिवर्तन नजर नहीं आता। ग्रामीण गरीब परिवार

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सार्वजनिक वितरण प्रणाली

परिवारों के पास कोई कार्ड नहीं है। •  देश के ग्रामीण अंचलों में दिहाड़ी मजदूरी करने वाले खेतिहर तथा गैर-खेतिहर परिवारों में अंत्योदय कार्डधारियों की संख्या सबसे ज्याद

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भुखमरी-एक आकलन

र इसके फलस्वरुप ना खरीदा हुआ अनाज गोदामों में पड़ा रहा। साल १९९० के दशक में मजदूरों-किसानों की खरीददारी की क्षमता में काफी कमी आई-खासकर ग्रामीण भारत में। इससे एक तरफ ग्रामी

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नरेगा

ोजगार पा सके.   • वित्तवर्ष 2015-16 में मनरेगा में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन औसत मजदूरी 154 रुपये की रही.  इन तथ्यों के स्रोत के लिए देखें आगे के पृष्ठ एक नजर नरेगा को ल

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पलायन (माइग्रेशन)

लायन करने वालों की संख्या कुल पलायन का ५४.७ फीसदी है।* • भारत में आप्रवासी मजदूरों की कुल संख्या साल १९९९-२००० में १० करोड़ २७ हजार थी। मौसमी पलायन करने वालों की संख्या २ कर

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बेरोजगारी

ै और कृषि-इतर काम कहने से बात थोड़ी छुपती है मगर सीधे सीधे कहें तो यह दिहाड़ी मजदूरी का ही दूसरा नाम है। मजदूरी भी कम मिलती है क्योंकि गांव के दरम्याने में जो

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घटती आमदनी

खास बात   • दिहाड़ी मजदूरों सहित हर श्रेणी के कामगार के मेहनताने की बढोतरी दर साल 1983-1993 की तुलना में 1993-94 से 2004-05 के बीच घटी है। # • साल 1983 से 1993-94 के बीच रोजगार की बढ़ोतरी की दर 2.03

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कर्ज का फंदा

स्रोत खेती है। इसके अतिरिक्त खेतिहर-परिवारों के लिए आमदनी का जरिया दिहाड़ी मजदूरी या फिर नियमित अवधि वाली नौकरी है। सर्वेक्षण के दौरान तकरीबन 63.5% परिवारों ने खेती को अपनी आम

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किसान और आत्महत्या

आत्महत्या करने वाले कुल लोगों की संख्या का 5.99 फीसद है. साल 2015 में कुल 4595 खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की जो 2015 में आत्महत्या करने वाले कुल लोगों की संख्या का 3.44 फीसद है. अगर किसान औ

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