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कृषि व्यवस्था दुरुस्त करना जरूरी-- वरुण गांधी

खरीफ फसलों में निवेश के चलते कर्ज तले दबे हुए हैं. अब यहां के ग्रामीणों को मजदूरी की तलाश में रोजाना पास के शहरी इलाकों में भटकते देखा जा सकता है. पिछले कुछ वर्षों में विदर्

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किसानों के प्रति उदासीनता- योगेन्द्र यादव

करता है, उसमें गांव उजड़ेंगे, किसान के हाथ से खेती जायेगी और किसान शहरों में मजदूर बनेंगे. केवल व्यवस्था विरोध व वैचारिक विरोध के मायने में मोदी सरकार देश की पहली या सबसे

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45 परिवारों की जिंदगी झोपड़ी में, 55 वर्षों में न अनाज मिला

हार पयला, दीया, बर्तन, रस्सी बनाने जैसे परंपरागत काम के अलावा नौजवान दिहाड़ी मजदूरी कर पेट भरते है़ं बस्ती के अधिकतर नौजवान किसी तरह चौथी से सातवीं तक की पढ़ाई पूरी कर पाये है

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मातृत्व लाभ हर महिला का अधिकार- ज्यां द्रेज

िख रहा था. लातेहार के दुम्बी गांव की मुन्नी देवी के पति सर्वेक्षण के दौरान ही मजदूरी की तलाश में कहीं पलायन कर चुके थे. मुन्नी अकेली घर और खेत दोनों संभाल रही थी. उसके दो बच्च

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श्रमिकों की गरिमा व बिहार की अस्मिता-- मिहिर भोले

्रवासन में भी कमी आयी है. फिर यह कहकर लोगों को मारपीट के लिए उकसाना कि बिहारी मजदूरों की वजह से गुजरात में बेरोजगारी बढ़ी है, यह सिर्फ राजनीति-प्रेरित ही हो सकता है. लेकिन, ह

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उत्तर भारतीयों का भी है भारत -- आर के सिन्हा

बलात्कार की घटना के बाद वहां के बहुत से हिस्से में बिहारी और उत्तर प्रदेश के मजदूरों के साथ योजनाबद्ध तरीके से मारपीट होती रही. मारपीट से डरे-सहमे अपनी जान बचाने के लिए अब तक प

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बदल रही है परहिया समुदाय की जिंदगी

र्थिक जीवन का आधार है. इसके अलावा उच्च जाति के लोगाों के घरों में ये दिहाड़ी मजदूर के तौर पर काम करते हैं, मगर अब यह तस्वीर बदल रही है. दरअसल, ग्रामीण जीवन में परिवर्तन को ले

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भूख से मौत और उसके बाद-- ज्यां द्रेज

र ने नुकसान किया है. उदाहरण के लिए, आधार संबंधित समस्याओं के कारण आजकल मनरेगा मजदूरों के भुगतान की कोई गारंटी नहीं है. मातृत्व लाभ का भुगतान भी कई बार आधार के कारण फंस जाता है.

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मनरेगा: चार सालों में रोजगार देने में त्रिपुरा सबसे अव्वल, यूपी-बिहार बहुत पीछे

रुरत है. त्रिपुरा में बीते चार सालों (2014-15 से 2017-18) में मनरेगा के अंतर्गत ग्रामीण मजदूरों को औसतन लगभग 75 दिनों का रोजगार मिला जबकि इस अवधि में योजना के अंतर्गत रोजगार का अखिल भारती

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अलोकतांत्रिक भारत और आरक्षण--- केसी त्यागी

ी काफी कम है. एक और आंकड़े की मानें, तो सवर्ण जाति का 56.3 फीसदी हिस्सा तनख्वाह व मजदूरी पर निर्भर करता है. ग्रामीण इलाकों में हिंदू सवर्णों की 34 फीसदी जनसंख्या के पास नियमित आमदन

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