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उत्तर भारतीयों का भी है भारत -- आर के सिन्हा

बलात्कार की घटना के बाद वहां के बहुत से हिस्से में बिहारी और उत्तर प्रदेश के मजदूरों के साथ योजनाबद्ध तरीके से मारपीट होती रही. मारपीट से डरे-सहमे अपनी जान बचाने के लिए अब तक प

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बदल रही है परहिया समुदाय की जिंदगी

र्थिक जीवन का आधार है. इसके अलावा उच्च जाति के लोगाों के घरों में ये दिहाड़ी मजदूर के तौर पर काम करते हैं, मगर अब यह तस्वीर बदल रही है. दरअसल, ग्रामीण जीवन में परिवर्तन को ले

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भूख से मौत और उसके बाद-- ज्यां द्रेज

र ने नुकसान किया है. उदाहरण के लिए, आधार संबंधित समस्याओं के कारण आजकल मनरेगा मजदूरों के भुगतान की कोई गारंटी नहीं है. मातृत्व लाभ का भुगतान भी कई बार आधार के कारण फंस जाता है.

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मनरेगा: चार सालों में रोजगार देने में त्रिपुरा सबसे अव्वल, यूपी-बिहार बहुत पीछे

रुरत है. त्रिपुरा में बीते चार सालों (2014-15 से 2017-18) में मनरेगा के अंतर्गत ग्रामीण मजदूरों को औसतन लगभग 75 दिनों का रोजगार मिला जबकि इस अवधि में योजना के अंतर्गत रोजगार का अखिल भारती

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अलोकतांत्रिक भारत और आरक्षण--- केसी त्यागी

ी काफी कम है. एक और आंकड़े की मानें, तो सवर्ण जाति का 56.3 फीसदी हिस्सा तनख्वाह व मजदूरी पर निर्भर करता है. ग्रामीण इलाकों में हिंदू सवर्णों की 34 फीसदी जनसंख्या के पास नियमित आमदन

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सड़कों पर उतरे देशभर के किसान-मजदूर

सानों ने कहा है कि चुनाव के बाद सरकार अपने वायदों को भूल गई है। गरीब, किसान और मजदूरों का शोषण अब भी जारी है। सरकार को इनके कल्याण के लिए अपनी नीतियों को बदलना चाहिए। रैली के

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शिक्षक यात्रा : मालिक से मजदूर तक-- मृदुला सिन्हा

हुए भी उन्हें गांव की स्वीकृति और सम्मान नहीं मिल रहा. सरकार ने उन्हें बंधुआ मजदूर से भी बदतर समझ रखा है. उन्हें पढ़ाने-लिखाने का समय नहीं मिलता. 'नौकर ऐसा चहिए, जो मांग-चांग कर ख

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खेती और गांव की बदहाली-- डा. अश्विनी महाजन

ालन इत्यादि से मात्र 43 प्रतिशत ही आमदनी मिलती है, जबकि शेष 57 प्रतिशत आय नौकरी, मजदूरी, उद्यम इत्यादि से प्राप्त होती है. ऐसे गृहस्थ जो कृषि में संलग्न नहीं है, उन्हें औसतन कुल

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किसानों की आमदनी में सालाना बढ़वार सिर्फ 5.6 फीसद- नाबार्ड की नई रिपोर्ट

आदि) से कुछ मोल का उत्पाद हासिल किया हो. बहरहाल, जो परिवार पूर्ण रुप से खेतिहर मजदूरी पर निर्भर थे उन्हें नेशनल सैम्पल सर्वे के सिचुएशन असेसमेंट सर्वे में खेतिहर परिवारों के

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न्यूनतम मजदूरी का सवाल-- मनींद्र नाथ ठाकुर

बढ़ती महंगाई को देखते हुए देश में क्या न्यूनतम मजदूरी को बढ़ाया जाना चाहिए? यह सवाल इसलिए भी उठ खड़ा हुआ है, क्योंकि दिल्ली और ओड़िशा के सरकारों ने इसमें महत्वपूर्ण पहल करने क

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