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सड़कों पर उतरे देशभर के किसान-मजदूर

सानों ने कहा है कि चुनाव के बाद सरकार अपने वायदों को भूल गई है। गरीब, किसान और मजदूरों का शोषण अब भी जारी है। सरकार को इनके कल्याण के लिए अपनी नीतियों को बदलना चाहिए। रैली के

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शिक्षक यात्रा : मालिक से मजदूर तक-- मृदुला सिन्हा

हुए भी उन्हें गांव की स्वीकृति और सम्मान नहीं मिल रहा. सरकार ने उन्हें बंधुआ मजदूर से भी बदतर समझ रखा है. उन्हें पढ़ाने-लिखाने का समय नहीं मिलता. 'नौकर ऐसा चहिए, जो मांग-चांग कर ख

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खेती और गांव की बदहाली-- डा. अश्विनी महाजन

ालन इत्यादि से मात्र 43 प्रतिशत ही आमदनी मिलती है, जबकि शेष 57 प्रतिशत आय नौकरी, मजदूरी, उद्यम इत्यादि से प्राप्त होती है. ऐसे गृहस्थ जो कृषि में संलग्न नहीं है, उन्हें औसतन कुल

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किसानों की आमदनी में सालाना बढ़वार सिर्फ 5.6 फीसद- नाबार्ड की नई रिपोर्ट

आदि) से कुछ मोल का उत्पाद हासिल किया हो. बहरहाल, जो परिवार पूर्ण रुप से खेतिहर मजदूरी पर निर्भर थे उन्हें नेशनल सैम्पल सर्वे के सिचुएशन असेसमेंट सर्वे में खेतिहर परिवारों के

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न्यूनतम मजदूरी का सवाल-- मनींद्र नाथ ठाकुर

बढ़ती महंगाई को देखते हुए देश में क्या न्यूनतम मजदूरी को बढ़ाया जाना चाहिए? यह सवाल इसलिए भी उठ खड़ा हुआ है, क्योंकि दिल्ली और ओड़िशा के सरकारों ने इसमें महत्वपूर्ण पहल करने क

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पीड़ितों को कमजोर करता कानून-- रुचिरा गुप्ता

न भांति के शोषणों हेतु होता है, जिनमें वेश्यावृत्ति हेतु शोषण, यौन शोषण, जबरन मजदूरी या सेवा, दासता अथवा दासता जैसी दूसरी प्रथाएं, संपूर्ण अधीनता अथवा शरीर के अंग निकालना अवश्

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असम के आकाश पर नई आशंकाएं-- रविशंकर रवि

जबकि बाहरी राज्यों से आकर बसे ज्यादातर लोग यहां आने के साथ ही खेती-किसानी या मजदूरी में जुट गए थे। तब न तो राशन कार्ड का प्रावधान था और न बैंक में खातों का ऐसा चलन। इन चीजों के ब

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शर्मनाकः दिल्ली में भुखमरी से हुई तीन बच्चियों की मौत

सिंह बचपन से ही दिल्ली के होटलों में बर्तन धोता था। होटल से काम छोड़ने के बाद मजदूरी करने लगा। करीब दो साल से वह रिक्शा चलाने लगा था। उसे नशे की लत भी लग गई थी। घटना बेहद दुखद

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विकास केवल आर्थिक वृद्धि नहीं-- ज्यां द्रेज

ें. सोचनेवाली बात यह है कि जीडीपी ग्रोथ करीब 7 प्रतिशत होने के बावजूद ग्रामीण मजदूरों की मजदूरी नहीं बढ़ती है. लेकिन, इस पर कोई बात ही नहीं करता है. और अगर हमें व

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धरातल पर एमएसपी की स्थिति-- अवनीन्द्र नाथ ठाकुर

ेंद्रों पर नहीं बेच सके, लेकिन इस प्रावधान की एक बड़ी समस्या यह है कि ज्यादातर मजदूर जो बटेदारी या अन्य किसी अनुबंध पर दूसरे की जमीन पर खेती करते हैं, उनके लिए सरकारी केंद्रों प

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