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नियमित हों कॉलेज शिक्षक- आर के सिन्हा

हर वक्त नौकरी जाने का भय रहेगा, उससे आप क्या उम्मीद करेंगे? इनकी स्थिति बंधुआ मजदूरों से भी बदतर है. जिन दिनों कॉलेजों में गर्मियों का अवकाश रहता है, तब इनके पास कोई काम ही नहीं

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सिल्ली : घर में नहीं है अनाज, योजनाओं का भी नहीं मिल रहा लाभ

हां अकेले रह रहे कार्तिक महली (63 वर्ष) के घर में अनाज नहीं है. कमजोरी के कारण वह मजदूरी भी नहीं कर पा रहा है. हाल यह है कि वह पड़ोस से मांग कर अपनी भूख मिटा रहा है. मिट्टी की कोठरी म

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पचास रुपए दिन की मजदूरी करने वाला झारखंड का ये किसान अब साल में कमाता है 50 लाख रुपए

रांची(झारखंड)। किसान गंसू महतो एक समय 50 रुपए दिहाड़ी की मजदूरी के लिए घर से 25 किलोमीटर दूर जाते थे, लेकिन अपनी सूझबूझ से इन्होंने अपनी 9 एकड़ जमीन को बंजर से उपजाऊ बनाया और अब सालान

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मजदूर दिवस पर बोले ज्यां द्रेज़- NREGA को जिंदा रखने के लिए मजदूरी दर बढ़ाना जरूरी

मजदूर दिवस यानी मे डे के मौके पर सरकार कई दावे कर रही है. सरकारी आंकड़ों में कहा जा रहा है कि भारत की अर्थव्यवस्था उच्च दर से बढ़ रही है. लेकिन, जाने-माने अर्थशास्त्री ज्यां द्र

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किसानों की हालत बदलनी होगी-- प्रो. योगेन्द्र यादव

रोड़ से भी कम यानी कामगारों का 24.6 प्रतिशत ही बचे हैं. उनकी तुलना में खेत में मजदूरी करनेवालों की संख्या कहीं अधिक यानी 14 करोड़ से ज्यादा या कामगारों का लगभग 30 प्रतिशत है. जमीन

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पलायन का दर्द : न नरेगा ने रोका और न रोक पा रही मनरेगा..

हीं होता. यात्रा से भी परहेज का विधान है, लेकिन पेट की आग ने मिथिला क्षेत्र के मजदूरों को इस विधान व परंपरा को तोड़ने के लिए विवश कर दिया है. रोजी-रोटी की जुगाड़ में मिथिला के कुछ और »

नहीं थम रहा सुपेबेड़ा में किडनी की बीमारी से ग्रामीणों की मौत का सिलसिला

ीं होने के कारण यहां के किसान एक सीजन में धान की फसल लेकर दूसरे सीजन में रोजी-मजदूरी करते हैं। शेष गांव के 20 फीसद से अधिक लोगों का मुख्य व्यवसाय वनोपज संग्रहण है। उदंती सीतानद

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मानव तस्करी को रोकना जरूरी-- क्रेग एल हॉल

मिल किया है, जो कि मानव तस्करी को यौन तस्करी, अनैच्छिक गुलामी, ऋण बंधक, जबरिया मजदूरी और घरेलू दासता के रूप में परिभाषित करता है. बच्चे और अल्पसंख्यक समूह इस बुरी प्रथा के सबसे

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रोजगार और सामाजिक सुरक्षा-- अनुज लुगुन

उनकी स्थिति के विश्लेषण, बहस और नारेबाजी का सप्ताह बन जाता है. ‘दुनिया के मजदूरों एक हो' के बुलंद नारों के साथ यह धीरे-धीरे अगले मई दिवस तक के लिए गुम हो जाता है. श्रम और उसके

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श्रमिक वर्ग का सर्वहारा समीकरण-- हरजिंदर

खते हुए एक पत्रकार ने चौंककर पूछा था कि सर्वहारा कहां है? पूरे सम्मेलन में वे मजदूर या औद्योगिक मजदूर कहीं नहीं थे, जिन्हें क्रांति का हरावल दस्ता मानते हुए व

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