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एमएसपी बढ़े तो किसान की आमदनी भी बढ़े, कोई जरुरी तो नहीं !

ू सेवा और सामान को भी रखा गया है जिसमें स्वास्थ्य, परिवहन तथा संचार, मनोरंजन, शिक्षा तथा निजी देखभाल आदि शामिल है.अन्यान्य वर्ग में शामिल ज्यादातर सेवाओं (जैसे कि कुछ और »

पहले भी हो चुका है गरीब सवर्णों के लिए आरक्षण का प्रयास, लेकिन विफल रहा

तंत्रता के बाद संविधान निर्माताओं ने अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए शिक्षा व सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था की। साथ ही शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को भी आरक

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‘आरक्षण गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं, नया विधेयक संविधान का उल्लंघन है’

गू करने के पीछे महत्वपूर्ण लोगों में से एक थे. मोदी सरकार द्वारा नौकरियों और शिक्षा में आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को आरक्षण देने को लेकर उन्होंने कहा कि यह विधेयक संविधान क

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अब 5वीं और 8वीं में भी बच्चों को फेल कर सकेंगे राज्य

षा में परीक्षा आयोजित कराने का अधिकार देने वाला ‘नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार (दूसरा संशोधन) बिल- 2017' गुरुवार को राज्यसभा से पारित हो गया। विधेयक लोकसभा से बीते

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पोषण और अंडे का संघर्ष- ज्यां द्रेज

, लोक-नीति में बच्चों पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है. आज भी गरीब बच्चों को न सही शिक्षा मिल रही है, न स्वास्थ्य सुविधा और न ही पोषण. इसके कारण बांग्लादेश और नेपाल की तुलना में भा

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साढ़े तीन माह से बिना वेतन पढ़ा रहे शिक्षक

ं को साढ़े तीन महीने से वेतन नहीं मिला है। वेतन के लिए नवनियुक्त शिक्षक बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय का चक्कर काटकर थक चुके हैं लेकिन प्रमाणपत्रों का सत्यापन नहीं होने के क

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पढ़ाई के दबाव में हर दिन चार स्कूली छात्र कर लेते हैं आत्महत्या- कृतिका शर्मा

छात्रों में 18 वर्ष (स्कूल के छात्र) की आयु से कम के 1,360 छात्र और 18-30 आयु वर्ग (उच्च शिक्षा) के 1,183 छात्रों ने परीक्षाओं में अच्छा करने के बढ़ते दबाव के कारण 2015 में आत्महत्या कर ली थी.

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10वीं से पहले पढ़ाई छोड़ने के मामले में बिहार सबसे आगे- स्कन्द विवेक

देश की शिक्षा व्यवस्था सुधारने की तमाम कवायदों के बीच स्कूली शिक्षा की एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। देश के ज्यादातर राज्यों में 10वीं कक्षा से पहले पढ़ाई

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नस्लवाद और गांधी का नजरिया- रामचंद्र गुहा

ा है, गांधी ‘मताधिकार, गैर-कानूनी ढंग से जान लेने, भेदभाव, सरकारी स्कूलों की शिक्षा, चर्च और उनके कामकाज जैसे तमाम मसलों को जानना चाहते थे।'     इसके दस साल बाद, दक्ष

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विद्रोह की जमीन पर एक गांधीवादी- रामचंद्र गुहा

्थितियों व सामाजिक विशिष्टताओं को समझे बगैर किस तरह से एक तयशुदा ‘भारतीय' शिक्षा का रूप उन पर थोपा, जो विकास और सहायता के नाम पर व्यापारियों, नौकरशाहों और राजनेताओं के भ्रष

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