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गरीबी का दंश, सिर छिपाने को झोपड़ी, स्ट्रीट लाइट में पढ़ाई

प्रथम ओडीएफ गांव है। साफ-सफाई के नाम से पुरस्कृत इस ग्राम पंचायत में दिहाड़ी मजदूर शत्रुघन साहू और उनके चार बच्चे चंदन (14), करन (12), (अर्जुन) व बेदम (आठ) एक छोटी सी झोपड़ी में रहते हैं

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चंपारण से निकला रास्ता- राजू पांडेय

ाला कृषिभूमि का स्वामी है तब तो उसकी पहचान कृषक के रूप में हो जाती है, पर कृषि मजदूरों के आंकड़े कभी भी सही रूप से दर्ज नहीं हो पाते हैं। राष्ट्रीय नमूना सर्वे का ही आंकड़ा यह भी ह

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आंबेडकर विचार भी, प्रेरणाशक्ति भी-- बद्री नारायण

िखाई। उनमें से अनेक ने पारंपरिक पेशे को छोड़कर रिक्शा चलाने, भवन निर्माण में मजदूरी के रास्ते अपनाए। कुछ ने इसी के साथ शिक्षा से जुड़े आरक्षण का लाभ लेने की शक्ति प्राप्त की।

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अप्रैल 2018 में मनरेगा मजदूरी का 99% भुगतान लंबित

इस साल देश के कई राज्यों में मनरेगा मजदूरी का नहीं बढना ही सिर्फ एक क्रूर मजाक नहीं है | आंकड़े बता रहे हैं कि पूरे देश में मार्च और अप्रैल माह में मनरेगा के तहत हुए कामों का 85-99% कुछ और »

मजदूरों के संघर्ष ने बोए उम्मीद के बीज-- बाबा मायाराम

पर सामूहिक रूप से उसे रोकने में कामयाब हो गए। इसका अच्छा उदाहरण राजस्थान के मजदूर किसान शक्ति संगठन है। हाल ही में मुझे एक कार्यक्रम के दौरान मजदूर किसान

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महिला सशक्तीकरण की बाधित राह-- ज्योति सिडाना

और निकट संबंधियों द्वारा किए गए। जैसा कि मार्क्स ने कहा था कि ‘दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ, तुम्हारे पास खोने को जंजीरों के अलावा कुछ भी नहीं है और पाने को सारा समाज है', उसी

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यूपी, बिहार और झारखंड समेत नौ राज्यों के लिए नहीं बढ़ी मनरेगा की मजदूर

काम ज्यादा- पैसा कम-- शायद, नये वित्तवर्ष में मनरेगा के मजदूरों के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय का संदेश यही है.अगर बात अटपटी लगे तो इस तथ्य पर विचार कीजिए :   पिछले साल के आख

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निर्माण श्रमिकों के लिए छह माह में बनाएं योजना : सुप्रीम कोर्ट

ितंबर तक एक आदर्श योजना बनाने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये मजदूर सिर्फ इमारतों का नहीं बल्कि देश का भी निर्माण करते हैं।   जस्टिस एमबी लोकुर और जस्टिस

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बच्चियों के जीने लायक बने दुनिया-- डॉ सय्यद मुबीन जेहरा

ाल जन्म के 28 दिनों के भीतर छह लाख नवजात शिशु मर जाते हैं. जिस देश में बच्चों से मजदूरी करायी जाती हो, जहां बच्चे ट्रैफिक सिग्नल पर भीख मांगते हों, जहां बच्चों के साथ हर तरह के जुल

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क्या कहती है दौलतपुर की कहानी-- आलोक रंजन

ने लगा है। कृषि में जीवन-यापन के बेहतर अवसर मिलने के कारण इन इलाकों के खेतिहर मजदूरों ने भी शहरों का पलायन बंद कर दिया है।   यह एक मूक क्रांति है, जिसका दायरा अब नजदीकी इला

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