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बचपन का बोझ कम करने के लिए- हरिवंश चतुर्वेदी

ोफेसर यशपाल की अध्यक्षता में एक छह सदस्यीय कमेटी का गठन किया था, जिसे स्कूली शिक्षा में सुधार का एजेंडा निर्धारित करने का काम दिया गया। आरके नारायण ने मालगुडी डेज उपन्यास मे

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बोझमुक्त बस्ता एक अच्छा कदम-- अंबरीश राय

मीद है कि इससे बच्चों के स्वास्थ्य ठीक रहेगा. इस कदम के साथ ही सरकार को और शिक्षा व्यवस्था संभाल रहे महकमे को अन्य महत्वपूर्ण कदम उठाने की भी जरूरत है. बहुत सारे स्कूलों मे

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.....ताकि चुनाव-चर्चा के बीच आप भुखमरी से हो रही मौतों को ना भूल जायें !

्याओं के चलते उन्हे पेंशन नहीं मिली. यह भी सोचने की आवश्यकता है कि अपर्याप्त शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधा व रोज़गार के साधन के आभाव में इन परिवारों के बच्चों व युवाओं का भविष्य भी

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चुनावों में पीछे छूटते असली मुद्दे- आशुतोष चतुर्वेदी

हीं लड़े जाते. चुनावों में किसानों की समस्याएं, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा की स्थिति, विकास जैसे विषय मुद्दे नहीं बनते. इस बार चुनाव के मुद्दों पर नजर डालें, तो शुरुआत

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किसके कब्जे में हैं विश्वविद्यालय-- रविभूषण

तृत्व में हुई थी. वल्लभभाई पटेल ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में गुजरात को शिक्षा के स्तर पर विकसित करने की जरूरत समझी थी. उनकी प्रेरणा से इस सोसाइटी ने शिक्ष

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मी टू अभियान: यौन हिंसा की पीड़ित महिलाएं इतनी देर चुप क्यों रहीं, पढ़िए इस न्यूज एलर्ट में

गैर-रोजगारशुदा महिलाओं में यह संख्या 26 प्रतिशत थी.   ---- महिलाओं की स्कूली शिक्षा तथा उन्हें हासिल धन की मात्रा के बढ़ने के साथ उनके साथ हिंसक बरताव में कमी आती है. 12 साल या उ

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बात पशुओं के अधिकारों की भी हो- विजय गोयल

ा मूल है' और हिंदू धर्म इसी मूल पर स्थित है। बाकी धर्मों में भी जीवों पर दया की शिक्षा दी गई है। यहां तक कि स्कूलों में भी इस बात की शिक्षा दी जाती है, फिर भी लोग अ

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शक्ति की मौलिक कल्पना के नौ दिन-- पद्मा सचदेव

? सच कहूं, तो मुल्क की स्त्रियां आज भगवान भरोसे जिंदगी काट रही हैं। स्त्री शिक्षा और स्त्री सशक्तीकरण के तमाम वादों और दावों के बाद यह सब हो रहा है। इसलिए भारतीय महिलाओं को

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किसान आंदोलन का नया स्वरूप- मणीन्द्र नाथ ठाकुर

नयी आर्थिक नीति ने हर आवश्यकता को बाजार को सौंप दिया है. किसान अपने बच्चों की शिक्षा और परिवार के स्वास्थ्य के लिए अब निजी क्षेत्र पर निर्भर रहने लगा है. उसकी आमदनी का बड़ा हिस

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भूख से मौत और उसके बाद-- ज्यां द्रेज

देखें, तो एक पैटर्न दिखता है. ऐसे परिवार थे, जिनके पास कुछ नहीं था- न संपत्ति, न शिक्षा, न रोजगार. ज्यादातर दलित या आदिवासी थे. कई बार पेंशन या जन-वितरण प्रणाली के सहारे जी रहे थे.

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