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ताकि मिले बढ़ती आबादी का फायदा- प्रो.सुरेश शर्मा

देश-दुनिया की तमाम सरकारों और नीति-निर्माताओं के लिए आज यह याद करने का दिन है कि जनसंख्या और उससे जुड़े मसलों का हल उनकी विकास-नीतियों के मूल में होना चाहिए। भारतीय संदर्भ में देखें, तो 1920 के दशक तक हमारे हिस्से में अत्यधिक जन्म-दर और मृत्यु-दर रही है, पर उसके बाद से इसमें लगातार गिरावट देखी गई। जन्म-दर, मृत्यु-दर और जनसंख्या वृद्धि का परस्पर संबंध किसी देश की जनसंख्या का...

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मोदी 1.0 के दौरान, कॉरपोरेट्स को 4.3 लाख करोड़ की रियायतें दी गईं

केंद्र में अपने पहले कार्यकाल के दौरान, मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने कॉर्पोरेट संस्थाओं को जो टैक्स की छूट दी है वह विभिन्न वर्षों के बजट दस्तावेज़ों के अनुसार 4.32 लाख करोड़ रुपये है। साल दर साल रियायत दी जाने वाली राशि में वृद्धि होती गई, और यह 2014-15 में 65,067 करोड़ रुपये थी और इसके अंतिम वर्ष मे, यानी, 2018-19 में यह रियायत केंद्र...

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एससी/एसटी छात्रों की शिक्षा के लिए बजट में कटौतीः दलित एवं आदिवासी अधिकार समूह

नई दिल्लीः दलित एवं आदिवासी अधिकार समूहों का कहना है कि अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के छात्रों की माध्यमिक और उच्च शिक्षा के लिए बजट 2019 में कटौती की गई है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, दलित आर्थिक अधिकार आंदोलन की बीना पल्लीकल का कहना है कि एससी छात्रों के लिए पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति के लिए बजट में कटौती की गई है और इसके लिए इस साल...

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राष्ट्रीय शिक्षा नीति मसौदा पुरातनपंथी नहीं पर शक है कि इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा- योगेन्द्र यादव

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (2019) का मसौदा मैंने पढ़ना शुरू किया तब मन में शंका थी. ये दस्तावेज तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावेड़कर के आदेश पर तैयार हुआ है. स्मृति ईरानी के आदेश पर एक मसौदा इससे पहले भी तैयार हुआ था लेकिन मंत्रालय ने उसे खारिज कर दिया था. मसौदे को तैयार करने वाली समिति के अध्यक्ष कोई शिक्षाविद नहीं बल्कि अंतरिक्ष-विज्ञानी के. कस्तूरीरंगन हैं. शिक्षा नीति के बाबत...

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गरीब की मौत पर तमाशा-- शशिशेखर

राजनीतिज्ञों का एक बड़ा वर्ग यह कहकर मूंछें ऐंठता आया है कि 2005 से 2015 के बीच भारत ने 27 करोड़ लोगों को गरीबी के अभिशाप से मुक्त किया और देश में गरीबी 50 फीसदी से घटकर 28 प्रतिशत तक आ गई। अगर यह सच है, तो फिर कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक साल-दर-साल इतनी बड़ी संख्या में अकाल मौत के शिकार होने वाले लोग कौन हैं? आपको जानकर आश्चर्य...

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