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युवा केंद्रित बजट से मिलेगी मजबूती-- वरुण गांधी

्रति एकड़ प्रति माह 2,400 रुपये कमाता है, जबकि गेहूं से 2,600 रुपये कमाता है. खेतिहर मजदूर प्रति माह 5,000 रुपये कमाता है (भारतीय सांख्यिकी, 2016). खेती के पेशे में औसत दिहाड़ी काफी कम है- जुत

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आर्थिक विषमता के बीच विकास का सच-- राजकुमार सिंह

ये नहीं गये और वहां उपलब्ध चलताऊ किस्म की शिक्षा उद्योग आधारित विकास के लिए मजदूरों के अलावा कुछ तैयार नहीं कर पायी। बहुत कम लोग अपने सामर्थ्य के बल पर नजदीकी कस्बों-शहरों म

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अर्थव्यवस्था सुधारने का मौका-- हिमांशु

हां तक अर्थव्यवस्था का सवाल है, तो स्थिति गौर करने लायक है। ग्रामीण भारत में मजदूरी दर में पिछले साल उल्लेखनीय वृद्धि हुई थी, पर अब इसमें गिरावट दर्ज की गई है, जिस कारण गांवों

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मानवीय गरिमा के खिलाफ--- कनिष्का तिवारी

्ष 2017 में यदि अखबारों के आंकड़ों पर ही गौर करें तो सौ दिनों के अंतराल में सत्रह मजदूरों को इस अमानवीय कार्य में लगने के चलते अपनी जान गंवानी पड़ी। यह एक ऐसी समस्या है जो व्यक्ति क

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अर्थव्यवस्था की आगे की राह-- अरविन्द कुमार सिंह

े शुरू कर दिए हैं। स्वयं चीन के कारोबारियों का कहना है कि पिछले तीन सालों में मजदूरी दोगुनी होने और गुणवत्ता पर ध्यान देने से चीन में बने सामान भी सस्ते नहीं रह जाएंगे। अब अगर

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भारत के 1 फीसदी लोगों के पास 73% आबादी से अधिक धन-दौलत

दौलत है. सर्वे के मुताबिक यह असमानता इतनी ज्यादा है कि ग्रामीण भारत के एक मजदूर को देश के गारमेंट फर्म के किसी टॉप सीईओ के एक साल के वेतन के बराबर कमाने में 941 साल लग जाएंगे.

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आधार पर निराधार हैं आपत्तियां - रविशंकर प्रसाद

ास आधार उपलब्ध है। कल तक भ्रष्टाचार और शासकीय संवेदनहीनता से जूझ रहे मनरेगा मजदूर के चेहरे पर आज इसलिए मुस्कान है, क्योंकि आधार के कारण उसकी कड़ी मेहनत का मेहनताना सीधे उसके ब

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नोटबंदी के तुरंत बाद दिहाड़ी मजदूरों ने सबसे ज्यादा गंवाये रोजगार के अवसर-- नई रिपोर्ट

नोटबंदी के तुरंत बाद के तीन महीनों में दिहाड़ी मजदूरों के रोजगार के अवसरों में सबसे ज्यादा कमी आई. इस तथ्य का खुलासा लेबर ब्यूरो की हाल की तिमाही रिपोर्ट से होता है. रिपोर्ट म

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राजनीतिक शक्ति बनें किसान-- राजकुमार सिंह

के लिए गांव से शहर जाने की प्रवृत्ति अब जीवनयापन के लिए किसी भी तरह की मेहनत-मजदूरी करने की मजबूरी में बदल गयी है। हर शहर के बाहरी, या अब अंदरूनी इलाकों में भी, जो तेजी से बढ़ती

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