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किसानों की मौत छिपाता और सैनिकों की मौत भुनाता दिखावटी राष्ट्रवाद- अनुराग मोदी

ी लालबहादुर शास्त्री ने नारा दिया था- ‘जय-जवान, जय-किसान.' आज पहले से ज्यादा किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे है- कुछ नहीं बदला, बल्कि इतने बुरे हालात कभी नहीं रहे. सरकार क

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उदारीकरण के बाद बनीं आर्थिक नीतियों से ग़रीब और अमीर के बीच की खाई बढ़ती गई- सचिन कुमार जैन

बताती है कि जिस साल (वर्ष 2017-18) में रुपये की कीमत गिर रही थी, बेरोज़गारी बढ़ रही थी. किसान आत्महत्या कर रहा था, वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) के आगाज़ ने अर्थव्यवस्था को झटका दिया था; उस साल

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कृषि में बेहतर होता बिहार-- के सी त्यागी

हार में न ही कर्जमाफी को लेकर किसानों का कोई बड़ा आंदोलन देखने को मिला और न ही किसान आत्महत्याओं से जुड़ी खबर. हाल ही में नीति आयोग द्वारा जारी सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करन

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राजस्थान: बैंगन की फसल बर्बाद होने पर किसान ने की आत्महत्या

य किसान ने खुदकुशी कर ली. राज्य में कांग्रेस की नई सरकार बनने के बाद यह पहली किसान आत्महत्या का मामला है. मालूम हो कि कांग्रेस ने किसानों की कर्ज माफी का भी ऐलान किया है. जनस

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आत्महत्या से बड़ा अपराध नहीं-- आशुतोष चतुर्वेदी

अनेक राज्यों के किसान आ गये हैं. यही वजह है कि आर्थिक कारणों से अब तक सैकड़ों किसान आत्महत्या कर चुके हैं. किसानों की आत्महत्या का सिलसिला अब थोड़ा थमा है, लेकिन अब भी बीच-बीच म

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किसान-आत्महत्याओं में कमी लेकिन खेतिहर मजदूरों की आत्महत्याओं में बढ़ती के रुझान

े कृषि-संकट के बारे में कोई राय बनाने से पहले इन तथ्यों पर गौर करें: साल 2015 में किसान आत्महत्याओं की संख्या 8007 थी जो 2016 में घटकर 6351 हो गई लेकिन इसी अवधि में खेतिहर मजदूरों की आत्मह

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जन-आंदोलनों का विचार-- अनुज लुगुन

े कर्ज की ब्याज दरों में कटौती की बात कही है. बाजार और कर्ज की गिरफ्त में फंसे किसान आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो रहे हैं. पी साईनाथ की रिपोर्ट के अनुसार, नब्बे के बाद डेढ़ दश

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खुशहाली का पैमाना और भारत-- राजू पांडेय

है कि मनुष्य अपनी मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति की अनदेखी कर रहा है। अन्नदाता किसान आत्महत्या कर रहे हैं। कृषि को उपेक्षित किया जा रहा है। अंधाधुंध औद्योगीकरण ने भूजल स्तर को

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आर्थिक आतंकियों को मिले सजा-- तरुण विजय

बहुत रास्ते मालूम हैं.' जिस देश में बैंक के छोटे-छोटे कर्ज न चुका पानेवाला किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाता है, जहां किसान का बेटा किसान बनने के बजाय खुश होकर शहर में को

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बजट : जीडीपी का एक फीसद से भी कम खर्च हुआ है कृषि और ग्रामीण विकास पर

के लिए कोई कारगर बीमा-योजना नहीं है. साथ ही, देश में कर्जदारी की स्थिति के बीच किसान आत्महत्याओं का सिलसिला अभी थमने का नाम नहीं ले रहा है. बताते चलें कि हाल में एक स्वयंसेवी

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