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रैंकिंग में और पिछड़ी उच्च शिक्षा -- हरिवंश चतुर्वेदी

ा और देखना होगा कि वे देश में ही रहकर शिक्षण, शोध व अनुसंधान के काम करें। उनका पलायन किसी भी हालत में रोकना होगा। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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बेरोजगारी दर कैसे 6.1 प्रतिशत से भी ज्यादा हो सकती है, पढ़िए इस न्यूज एलर्ट में

रोजगार-प्राप्त ग्रामीण आबादी के बढ़ने की प्रमुख वजह रही रोजगार की तलाश में पलायन कर निकले लोगों का किसी अन्य क्षेत्र में रोजगार हासिल ना होना और अंतिम विकल्प के रुप में निर

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पानी की वजह से पलायन के लिए मजबूर राजस्थान के ग्रामीण

ी भयंकर समस्या बनी हुई है. ग्रामीण अपने मवेशी और परिवार के साथ नदी किनारों पर पलायन कर गए हैं. कई गांवों में महिलाएं अपना आधा समय सिर्फ पानी लाने के लिए बिता रही हैं. कुछ और »

गुजरात में बीते 30 सालों का सबसे भीषण सूखा

न के लिए अपने मवेशियों पर निर्भर है. हजारों लोग गुजरात के अन्य हिस्सों में पलायन कर चुके हैं. गांवों में जलापूर्ति भी प्रभावित हुई है, यहां के स्थानीय लोगों को पाइपलाइन से प

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तीस लाख मतदाता चाहें भी तो इस चुनाव में मतदान नहीं कर सकते- आखिर क्यों, पढ़िए इस एलर्ट में !

. वे एक राज्य से दूसरे राज्य या फिर अपने ही राज्य में एक जिले से दूसरे जिले में पलायन करके ईंटभट्ठे पर काम करने जाते हैं. सो, इस बार मतदान की तारीखों पर अपने निर्वाचन क्षेत्र में

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मौलिक अधिकारों का संघर्ष जारी, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार चार्टर के 70 साल

हिंसा का कारण बन रहा है. यमन, सीरिया, बर्मा और दक्षिण सूडान में जारी हिंसा और पलायन इसके सबसे दुर्भाग्यपूर्ण उदाहरण रहे हैं. अधिकारों की उल्लंघन की विकट होती स्थिति अंतरराष

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प्राथमिकता नहीं है पर्यावरण-- ज्ञानेन्द्र रावत

ां सूखी-नंगी हो गयीं, जंगलों पर आश्रित आदिवासी रोजी-रोटी की खातिर शहरों की ओर पलायन करने लगे, पारिस्थितिकी तंत्र गड़बड़ा गया, वन्यजीव विलुप्ति के कगार पर पहुंच गये और जीवनदायिन

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प्रदूषण की राजधानी-- शशिशेखर

हाल रहा, तो ये र्पंरदे हमसे मुंह मोड़ लेंगे। बताने की जरूरत नहीं है कि र्पंरदे पलायन की शुरुआत करते हैं और यह शृंखला इंसानों पर जाकर थमती है। शायद यही वजह है कि पिछले दिनों एक सर

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मातृत्व लाभ हर महिला का अधिकार- ज्यां द्रेज

्बी गांव की मुन्नी देवी के पति सर्वेक्षण के दौरान ही मजदूरी की तलाश में कहीं पलायन कर चुके थे. मुन्नी अकेली घर और खेत दोनों संभाल रही थी. उसके दो बच्चे थे, दोनों कुपोषित. पूरा

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श्रमिकों की गरिमा व बिहार की अस्मिता-- मिहिर भोले

जाना ही हो, तो बजाय भेड़-बकरियों की तरह रेलगाड़ी में भरकर दूसरे प्रांतों में पलायन करने देने के, बिहार सरकार उन्हें सुनियोजित रूप से दूसरे प्रांतों में भेज सकती है. ठीक उसी

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