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रिपोर्ट/मंदी से निपटने के लिए ब्याज दरें घटाना काफी नहीं, सरकार को ग्रामीण इलाकों में खर्च बढ़ाना चाहिए

इलाकों में मांग बढ़ाने के उपाय करने चाहिए। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना, मनरेगा और पीएम-किसान जैसी योजनाओं के जरिए खर्च बढ़ाना चाहिए। एसबीआई की रिपोर्ट सोमवार को सामने आ

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सरकार मनरेगा को हमेशा चलाए रखने की पक्षधर नहीं: ग्रामीण विकास मंत्री

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना एवं मनरेगा में बजटीय आवंटन में कमी के विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए ग्रामीण विकास मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने बुधवार को कहा क

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मोदी 1.0 के दौरान, कॉरपोरेट्स को 4.3 लाख करोड़ की रियायतें दी गईं

ो राहत देने या उनके कल्याण के लिए बनाया गया है। ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (मनरेगा) के लिए वर्ष 2019-20 के लिए 60,000 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है, मिड-डे मील योजना के लिए 11,000 करोड़ र

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आर्थिक संकट की गहराई- अरुण कुमार

से भी बहुत ज्यादा फायदा नहीं उठा पाता। यह असंगठित क्षेत्र की बदहाली ही है कि मनरेगा की तरफ लोगों का झुकाव लगातार बढ़ रहा है। शहरी क्षेत्रों के असंगठित मजदूर गांव लौटकर कुछ और »

झारखंड: कथित तौर पर भूख से एक बुज़ुर्ग की मौत

े भी कहा कि उनके पति की मौत भुखमरी से हुई है. गांववालों ने इस मामले की जानकारी मनरेगा सहायता केंद्र को दी थी. द वायर हिन्दी पर प्रकाशित इस कथा को विस्तार से पढ़ने के लिए यहां

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मनरेगा :4 राज्यों और 2 संघशासित प्रदेशों में नहीं बढ़ी मजदूरी! कहीं 1 रुपये तो कहीं 2 रुपये की बढ़ोत्तरी !

ीं बदलता ? दार्शनिक मिजाज के इस सवाल का एकदम ही व्यावहारिक सा जवाब हो सकता है- मनरेगा की मजदूरी!  बात तनिक बुझौवल सी लगी तो इन तथ्यों पर गौर करें: साल 2019-20 के लिए महात्मा गांधी

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नोटबंदी के दौरान लाई गई प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के पैसे का क्या हुआ, सरकार को नहीं पता

प बनी हुई है. चाहे वो इंदिरा गांधी का गरीबी हटाओ का नारा हो या मनमोहन सिंह का मनरेगा हो या फिर नरेंद्र मोदी द्वारा शुरु की गई प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना हो. गरीब ही हैं जो

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आख़िर क्यों मनरेगा मज़दूरों को नहीं मिलती उचित मज़दूरी?- देवमाल्या नंदी

महात्मा गांधी रोज़गार गारंटी क़ानून (मनरेगा) वह क़ानून है जिसके अंतर्गत देश में सबसे अधिक व्यक्तियों को रोज़गार मिलता है. प्रत्येक वर्ष लगभग 8 करोड़ ग्रामीणों को इस क़ानून के अंतर्

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नेशनल अप्रेंटिसशिप प्रमोशनल स्कीम: 20 लाख युवाओं को करना था रोज़गार के लिए तैयार, हुए सिर्फ 2.90 लाख

है. खासकर सियासत और नौकरशाही के लिए. बेरोजगारी न होती तो हजारों करोड़ रुपये का मनरेगा न होता और मनरेगा के नाम पर मची लूट न होती. एक ऐसी लूट, जिसने पंचायत स्तर पर

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चुनावी हंगामे में रोजगार का मसला- हरजिंदर

फिर, हमें उन लोगों के बारे में भी सोचना होगा, जिनके श्रम का इस्तेमाल हम अभी तक मनरेगा में ही कर रहे हैं। उन लोगों के रोजगार की चिंता भी करनी होगी, जिनके लिए कैश ट्रांसफर की योजना

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