कर्ज का फंदा

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पी ग्रुएर, गुएलामें, पूर्वी मेहता भट्ट और देबदत्ता सेनगुप्ता द्वारा प्रस्तुत बीटी कॉटन-एंड फार्मर स्यूस्याइड नामक दस्तावेज(२००८,आईएफपीआरआई) के अनुसार-
 
http://www.ifpri.org/pubs/dp/IFPRIDP00808.pdf

  • जोखिम भरे नकदी फसलों की खेती की तरफ रुझान- आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र जैसे कई राज्यों में, जहां खेती ज्यादातर वर्षाजल से सिंचित है, पहले कम लागत वाली फसलों (अनाज) को उपजाने का चलन था परंतु धीरे धीरे इन राज्यों में नकदी फसलों को उपजाने का चलन बढ़ा। ऐसे राज्यों में अनाजी फसले कम जमीन में उपजायी जाने लगीं। मूंगफली और तेलहन जैसे नकदी फसलों को उपजाने की तरफ रुझान तो बढ़ा लेकिन सिचाईं की कोई कारगर व्यवस्था नहीं हो पायी। इससे किसान आर्थिक संकट में पड़े।
  • मॉनसून पर बढती निर्भरता-नकदी फसलों को उपजाने वाले इलाकों में मॉनसून और वर्षाजल से सिंचाई करने पर निर्भरता बढ़ी और इससे किसानों की परेशानियां बढ़ीं। नकदी फसलों को उपजाने का दायरा बढ़ा लेकिन उसके मुताबिक सिंचाई व्यवस्था ना हो पायी जबकि नकदी फसलें कहीं ज्यादा सिंचाई की मांग करती हैं। इस बात के प्रर्याप्त प्रमाण हैं कि बीटी कॉटन भरपूर सिंचाई की दशा में बेहतर ऊपज देता है फिर बी बीटी कॉटन और गैर बीटी कॉटन दोनों की कपासी खेती एक जैसी सिंचाई सुविधा के बीच हुई। 
  • कर्जदारी इसलिए भी बढ़ी क्योंकि सांस्थानिक कर्जे किसानों को समुचित मात्रा और सही वक्त पर ना मिल पाये। महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश में जिन किसानों ने आत्महत्या की उनपर कर्जे की बकाया रकम बहुत ज्यादा थी। महाराष्ट्र में १९९१ से २००४ के बीच कुल कर्जे में किसानी पर खर्च की जाने वाली रकम २०.२ फीसदी से घटकर ११.२ फीसदी हो गई। आंध्रप्रदेश में महाजनों और गैर सांस्थानिक स्रोतों से ली गई कर्ज की रकम को खेती में लगाने का तलन बढ़ा। आंध्रप्रदेश में इन स्रोतों से प्राप्त कर्ज की रकम में से ६८ फीसदी किसानी में लगायी गई। आंध्रप्रदेश सरकार द्वारा करवाये गए एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि ८० फीसदी कृषि-ऋण गैर-सांस्थानिक स्रोतों से लिए गए। कर्ज की ऐसी रकम पर किसानों को २४-३६ फीसदी का सूद चुकाना पड़ा।
  • न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं बढ़ा लेकिन खेती की लागत बढ़ गई- अधिकतर छोटे और मंझोले किसान स्थानीय स्तर पर मौजूद सरकारी केंद्रों पर अपनी ऊपज बेचते हैं। इन केंद्रों पर कीमतें बड़ी कम हैं। जिस तेजी से खेती में लागत बढ़ी उसकी तुलना में न्यूनतम समर्थन मूल्य में इजाफा नहीं हुआ। साल २००५ के दांडेकर रिपोर्ट में कहा गया है कि महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों में किसानों को अपनी ऊपज लागत से कम मूल्य पर बेचनी पड़ी। इस रिपोर्ट के मुताबिक साल १९९६ से २००४ के बीच किसानों को धान बेचने पर ३८ फीसदी, कपास बेचने पर ३८ फीसदी, मूंगफली बेचने पर ३२ फीसदी, सोयाबीन बेचने पर ३७ फीसदी और गन्ना बेचने पर १२ फीसदी का घाटा उठाना पड़ा।  
  • सामाजिक प्रतिष्ठा की हानि-एख तऱफ किसानों ने घाटा उठाकर फसल बेची तो दूसरी तरफ घाटे के कारण कर्ज भी ना चुका सके लेकिन कर्ज अपने सूद के साथ लगातार बढ़ता रहा। फसल के मारे जाने के बाद जिन किसानों ने आत्महत्या की उन पर कर्ज चुकाने लिए लगातार दबाब बना हुआ था और कर्जदाता तगादा कर रहा था।



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