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कर्ज का फंदा

 

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की रिपोर्ट Key Indicators of Situation Assessment Survey of Agricultural Households in India (January, 2013- December, 2013) के कुछ महत्वपूर्ण तथ्य़:

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0Agricultural%20Households%20in%20NSS%2070th%20Round.pdf

  --- तकरीबन साढ़े चार हजार गांवों के सर्वेक्षण पर आधारित राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 70वें दौर की इस रिपोर्ट के अनुसार आंध्रप्रदेश में कर्ज में डूबे किसान-परिवारों की संख्या सबसे ज्यादा((92.9%) है। तेलंगाना के 89.1% किसान परिवार कर्ज में डूबे हैं जबकि तमिलनाडु में कर्ज के बोझ तले दबे किसान परिवारों की तादाद 82.5% है। असम (17.5%), झारखंड (28.9%),और छत्तीसगढ़ (37.2%) उन राज्यों में शुमार हैं जहां कर्ज में डूबे किसान-परिवारों की संख्या अन्य राज्यों से अपेक्षाकृत कम है।

-- केरल के किसान-परिवारों पर औसत कर्ज की मात्रा सबसे ज्यादा (2,13,600/-रुपये) सर्वाधिक है। इसके बाद कर्ज का सर्वाधिक भार आंध्रप्रदेश के किसान-परिवारों ( 1,23,400/- रुपये) पर है। पंजाब के किसान-परिवारों पर कर्ज का औसत भार ( 1,19,500/- रुपये का है। इस मामले में असम ( 3,400/-रुपये), झारखंड ( 5,700/-रुपये) तथा छत्तीसगढ़ ( 10,200/-रुपये) के किसान-परिवार अन्य राज्य के किसानों की तुलना में बेहतर स्थिति में हैं।

-- किसान-परिवारों पर चढ़े कर्ज में 60% हिस्सा सांस्थानिक स्रोतों से लिए गए कर्ज का है। इसके अंतर्गत सरकार (2.1%), सहकारी समितियां (14.8%) तथा बैंक (42.9%) शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार किसानों पर चढ़े कर्ज में सूदखोर महाजनों से लिए गए कर्ज का हिस्सा बहुत ज्यादा(25.8%) है।

-- सांस्थानिक स्रोतों से कर्ज हासिल करने वाले किसान-परिवारों में ज्यादा बड़े रकबे के किसान-परिवारों की संख्या कम बड़े रकबे की मिल्कियत वाले किसानों की तुलना में बहुत ज्यादा है। सांस्थानिक कर्ज का भार ज्यादा है। मिसाल के लिए जिन किसानों के पास 0.01 हैक्टेयर या इससे कम रकबे की जमीन है उनमें मात्र 15 प्रतिशत किसान-परिवारों ने सांस्थानिक स्रोतों से कर्ज लिया है जबकि 10 हैक्टेयर या इससे ज्यादा रकबे की मिल्कियत वाले किसान-परिवारों में सांस्थानिक स्रोतों से कर्ज लेने वाले किसान-परिवारों की संख्या लगभग 79% है।

-- रिपोर्ट के अनुसार 2012 के जुलाई माह से 2013 के जून माह के बीच के आय-व्यय के आंकड़ों से जाहिर होता है कि किसान-परिवारों की औसत मासिक आमदनी 6426/- रुपये की रही जबकि इस अवधि में प्रत्येक किसान-परिवार का औसत मासिक उपभोग-व्यय 6223/- रुपये का था।

-- गौरतलब है कि राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 59 वें दौर की गणना पर आधारित रिपोर्ट (जनवरी-दिसंबर 2003) में कहा गया था कि देश के 48.6% किसान-परिवारों पर कर्जभार है लेकिन नई रिपोर्ट में यह संख्या बढ़ गई है। 1991 में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की ऐसी ही रिपोर्ट में कर्ज में डूबे किसान परिवारों की संख्या 26 प्रतिशत बतायी गई थी।  वर्ष 2003 की रिपोर्ट में किसान-परिवारों पर औसत कर्ज-भार 12,585 रुपये का था। एनएसएसओ की नई रिपोर्ट में यह कर्ज-भार चार गुना ज्यादा बढ़कर 47000 रुपये हो गया है।

-- भारत में किसान-परिवारों की संख्या तकरीबन 9 करोड़ 20 लाख है। यह कुल ग्रामीण-परिवारों की संख्या का 57.8 फीसदी है।

•-- देश के कुल किसान-परिवारों का 20 प्रतिशत उतरप्रदेश में है। यूपी में किसान-परिवारों की संख्या 1 करोड़ 80 लाख 5 हजार है। राजस्थान में किसान-परिवारों की संख्या 78.4% है जबकि उतरप्रदेश में 74.8% और मध्यप्रदेश में 70.8%।

•--- देश के कुल खेतिहर परिवारों में 45 प्रतिशत खेतिहर-परिवार ओबीसी श्रेणी के हैं, तकरीबन 16% खेतिहर-परिवार अनुसूचित जाति श्रेणी के जबकि अनुसूचित जनजाति श्रेणी के खेतिहर-परिवारों की संख्या 13% है। गौरतलब है कि देश के कुल ग्रामीण परिवारों में ओबीसी श्रेणी के ग्रामीण परिवारों की संख्या 45 प्रतिशत है जबकि अनुसूचित जाति के ग्रामीण परिवारों की संख्या 20% तथा अनुसूचित जनजाति श्रेणी के परिवारों की संख्या 12% बतायी गई है।

--- खेतिहर परिवारों की आमदनी का मुख्य स्रोत खेती है। इसके अतिरिक्त खेतिहर-परिवारों के लिए आमदनी का जरिया दिहाड़ी मजदूरी या फिर नियमित अवधि वाली नौकरी है। सर्वेक्षण के दौरान तकरीबन 63.5% परिवारों ने खेती को अपनी आमदनी का मुख्य जरिया बताया जबकि 22 प्रतिशत परिवारों ने दिहाड़ी मजदूरी अथवा नियमित अवधि की नौकरी को अपनी आमदनी का मुख्य जरिया बताया।

--- बड़े राज्यों में ज्यादातर ग्रामीण परिवारों ने अपनी आमदनी का मुख्य जरिया खती-बाड़ी तथा पशुपालन को बताया। सिर्फ केरल में 61 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों ने अपनी आमदनी का मुख्य जरिया खेती-बाड़ी से अलग बताया।असम, छत्तीसगढ़, तेलंगाना जैसे राज्यों में 80 प्रतिशत किसान-परिवारों की आमदनी का मुख्य स्रोत खेती ही है। तमिलनाडु, गुजरात, पंजाब और  हरियाणा के लगभग 9 प्रतिशत किसान-परिवारों ने पशुपालन को अपनी आमदनी का मुख्य स्रोत बताया।

--- देश के 93 प्रतिशत खेतिहर परिवारों के पास घर की जमीन के अतिरिक्त भी कुछ जमीन है जबकि 7 प्रतिशत किसान-परिवार ऐसे हैं जिनके पास सिर्फ घराड़ी की ही जमीन है। देश के ग्रामीण अंचलों में तकरीबन 0.1% खेतिहर परिवार भूमिहीन हैं। जिन किसान-परिवारों के पास 0.01 हैक्टेयर या इससे कम रकबे की जमीन है उनमें 70 फीसदी परिवारों के पास सिर्फ घराड़ी की ही जमीन है।

--- राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो देश में 78.5% किसान-परिवारों ऐसे हैं जिनकी जमीन अपने गांव में ही है, गांव के दायरे से बाहर उनके पास कोई जमीन नहीं है। जिन किसान-परिवारों ने कहा कि हमारे पास गांव के बाहर भी जमीन है उनमें 17.5% परिवारों के पास जमीन अपने राज्य में है जबकि 4 प्रतिशत के पास जमीन राज्य के बाहर भी है।

--- 12 प्रतिशत किसान परिवारों के पास सर्वेक्षण के समय राशन-कार्ड मौजूद नहीं थी। तकरीबन 36 प्रतिशत किसान-परिवारों के पास बीपीएल कार्ड था। 5 प्रतिशत खेतिहर परिवारों के पास अंत्योदय कार्ड मौजूद था।

--- धान, गेहूं, दाल, तेलहन जैसे पैदावार किसान-परिवार स्थानीय दुकानदारों को बेचते हैं या फिर मंडी में। सरकारी एजेंसी और सहकारी समिति को किसान-परिवार द्वारा बेचे गये पैदावार का हिस्सा बहुत कम है। इससे पता चलता है कि कृषि-उपज के अर्जन की सरकारी एजेंसियों का इस्तेमाल कम हो रहा है और किसानों को उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य अपेक्षित तौर पर नहीं मिल रहा।

--- आंकड़ों से पता चलता है कि किसान-परिवारों में न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर जागरुकता कम है। अगर गन्ने को अपवाद मान लें तो फिर जिन किसान-परिवारों को न्यूनतम समर्थन मूल्य के बारे में जानकारी है, उन किसान-परिवारों से भी पैदावार की बिक्री खास सरकारी अभिकरणों को कुछ खास नहीं होती। न्यूनतम समर्थन मूल्य के बारे में जानने वाले किसान-परिवारों में से महज 50 फीसदी परिवार ही अपनी उपज सरकारी अभिकरणों के मार्फत बेचते हैं।

--- सरकारी अभिकरणों को पैदावार ना बेचने की मुख्य वजहों में शामिल है-: ऐसी एजेंसी का मौके पर मौजूद ना होना, स्थानीय स्तर पर खरीद की ऐसी किसी प्रणाली की गैर-मौजूदगी या बाजार में न्यूनतम समर्थन मूल्य से कहीं ज्यादा कीमत का हासिल होना।
 

 

 

कृषिगत कर्जमाफी और ऋणराहत से संबंधित कंपट्रोलर एंड ऑडिटर जेनरल ऑव इंडिया द्वारा प्रस्तुत- रिपोर्ट नंबर 3(2013)-यूनियन गवर्नमेंट(मिनिस्ट्री ऑव फाईनेंस) नामक दस्तावेज के अनुसार-

http://saiindia.gov.in/english/home/Our_Products/Audit_Repor:

 

   द एग्रीकल्चरल डेट वेवर एंड डेट रिलीफ(एडीडब्ल्यूडीआरडीएस), 2008 नामक योजना साल 2008 के मई महीने में आरंभ हुई। इसका उद्देश्य कर्ज में फंसे किसानों को भुगतान संबंधी संकट से राहत दिलाना तथा नए कर्ज हासिल करने में मदद पहुंचाना था। योजना के अंतर्गत सीमांत किसानों के कर्ज पूर्ण रुप से माफ किए जाने थे जबकि अन्य किसानों के लिए कर्ज में ली गई रकम का 25 फीसदी हिस्सा माफ किया जाना था बशर्ते किसान कर्ज ली गई रकम का 75 फीसदी हिस्सा चुका दें। इस योजना के तहत जिन कर्जों को शामिल किया गया उनका ब्यौरा निम्नलिखित है-a. 1 अप्रैल 1997 से 31 मार्च 2007 तक वितरित ऋण, b. 31 मार्च तक बकाया कुल ऋण c. साल 2008 के 29 फरवरी तक बकाया रही कर्ज की शेष राशि। इस योजना पर साल 2010 तक 30 जून तक अमल करना था।

    भारत सरकार का साल 2008 के मई महीने में अनुमान था कि इस योजना के अंतर्गत 3.69 करोड़ सीमांत किसानों और अन्य किसानों के 0.60 करोड़ ऋण-खातों को कवर किया जा सकेगा। बीते चार सालों में भारत सरकार ने 52000 करोड़ रुपयों की कर्जमाफी की है जो कि 3.45 करोड़ सीमांत किसानों और अन्य कोटि के किसानों से संबंधित है।

    सीएजी ने अप्रैल 2011 से मार्च 2012 के बीच 25 राज्यों के कुल 90,576 लाभार्थियों/ किसानों के खातों की जांच की जो कि 715 कर्जदाता संस्थाओं की शाखाओं से संबंधित है। ये शाखाएं कुल 92 जिलों में थीं। जांच के लिए नमूने के तौर पर 80299 खाते ऐसे किसानों के लिए गए जो उपरोक्त योजना के तहत लाभार्थी थे जबकि 9334 खाते ऐसे किसानों के थे जिन्हें योजना में लाभार्थी नहीं माना गया लेकिन उन्होंने 1 अप्रैल 1997 से 31 मार्च 2007 के बीच कर्ज लिए थे।

    ऑडिट में जिन 9334 खातों(नौ राज्यों से चयनित) की जांच हुई उसमें 13.46 फीसदी यानि 1257 खाते ऐसे किसानों के थे जो योजना के तहत कर्जमाफी के हकदार थे लेकिन जब कर्जदाता संस्थाओं ने कर्जमाफी के हकदार किसानों की सूची तैयार की तो उन्हें लाभ का हकदार नहीं माना।

    जिन 80299 खातों को कर्जमाफी का हकदार ठहराया गया उसमें सीएजी ने 8.5 फीसदी मामलों में पाया कि या तो खाताधारक कर्जमाफी का हकदार नहीं था या फिर कर्ज-राहत का।

    निजी क्षेत्र के एक अधिसूचित बैंक को दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करते हुए कुल 164.60 करोड़ की रकम का पुनर्भुगतान किया गया। यह रकम कर्ज के तौर पर बैंक ने एक माइक्रोफाईनेंस कंपनी को दी थी।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि कुल 2824 मामलों में इस बात के पुख्ता प्रमाण थे कि कागजों में हेरफेर की गई है जबकि कर्ज से संबंधित कागजात का कर्जमाफी के लिए खास महत्व है। हेरफेर वाले ऐसे मामलों में कर्ज की रकम 8.64 करोड़ थी।

    ऑडिट में पाया गया कि कुल 4826 खाते(यानि नमूने के तौर पर लिए गए खातों का 6 फीसदी) ऐसे थे जिसमें किसान को लाभार्थी तो दिखाया गया है लेकिन उसे कर्जमाफी या कर्ज-राहत का फायदा नहीं दिया गया। कुल 3262 मामलों में सीएजी ने पाया कि 13.35 करोड़ रुपये की रकम बिना किसी मद के दे दी गई जबकि कुल 1564 मामले ऐसे थे जिसमें किसानों को हक के 1.91 करोड़ रुपये से वंचित किया गया।

    दिशा-निर्देश का उल्लंघन करते हुए कर्जदाता संस्थाओं ने सूद और शुल्क की रकम भी वसूली जबकि योजना में ऐसा करने की मनाही थी। 22 राज्यों से संबंधित कुल 6392 मामले ऐसे थे जिसमें कर्जदाता संस्थाओं ने 5.33 करोड़ रुपये सूद या शुल्क के तौर पर दावे में प्रस्तुत नहीं किए लेकिन उन्हें भारत सरकार की तरफ से इसका भुगतान किया गया।

    कई मामले ऐसे पाये गए जिसमें कर्ज माफी या कर्ज राहत से संबंधित प्रमाणपत्र लाभार्थियों को नहीं दिए गए। जांचे गए कुल 61793 खातों में 21182 खाते ऐसे थे जिसमें किसानों को दी गई कर्जमाफी या राहत का कोई प्रमाण संलग्न नहीं था जबकि नए कर्ज लेने के लिए ऐसे प्रमाणपत्र का होना जरुरी है।