पलायन (माइग्रेशन)

पलायन (माइग्रेशन)

Share this article Share this article

What's Inside

 

योजना आयोग द्वारा प्रस्तुत ११ वीं पंचवर्षीय योजना के दस्तावेज के अनुसार-http://www.planningcommission.nic.in/plans/planrel/fiveyr/11th/11_v3/11v3_ch4.pdf:

 

  • पिछले तीन दशकों में गांवों में रहने वाले लोगों की संख्या में कमी हुई है और शहरों में रहने वाले लोगों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। इस तथ्य से संकेत मिलते हैं कि ग्रामीण जन अपनी गरीबी से निकलने के लिए शहरों का रूख कर रहे हैं। साल १९९९-२००० में देश में आप्रवासी मजदूरों की संख्या १० करोड़ २७ लाख थी।यह एक बड़ी और चौंकाऊ तादाद है।मौसमी तौर पर पलायन करने वाले मजदूरों की संख्या कम सेकम २ करोड़ होने का अनुमान है।

 

असंगठित क्षेत्र के उद्यम और रोजगार से संबंधित आयोग यानी नेशनल कमीशन ऑन इंटरप्राइजेज इन अनऑर्गनाइज्ड सेक्टर(NCEUS) के दस्तावेज- रिपोर्ट ऑन द कंडीशन ऑव वर्क एंड प्रमोशन ऑव लाइवलीहुड इन द अनऑर्गनाइज्ड सेक्टर के अनुसार-

http://nceus.gov.in/Condition_of_workers_sep_2007.pdf

 

  • ग्रामीण श्रमिकों से संबंधित राष्ट्रीय आयोग यानी द नेशनल कमीशन ऑन रुरल लेबर (NCRL (1991) की रिपोर्ट में कहा गया है कि गांवों में ज्यादातर वही लोग मौसमी तौर पर पलायन करते हैं जिनके पास खेती की जमीन कम या नहीं है अथवा जो मजदूरी करते हैं।ऐसे आप्रवासी लोग वंचितों की कोटि में आते हैं क्योंकि ये लोग भयंकर गरीबी से त्रस्त होते हैं और इनके पास अपने काम की एवज में मोलभाव करने की भी कोई खास क्षमता नहीं होती। इन्हें असंगठित क्षेत्र में काम करना पड़ता है जहां उनके हितों की सुरक्षा करने वाला कामकाज का कोई खास नियम नहीं होता।ऐसी स्थिति आप्रवासी मजदूरों को सामाजिक रुप से और भी ज्यादा कमजोर बनाती है।उन्हें सरकारी अथवा स्वयंसेवी संगठनों द्वारा चलाए जा रहे कार्यक्रमों में उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है,साथ ही ऐसे लोगों से संबंधित श्रम-कानून भी ज्यादा कारगर नहीं हैं।

 

  • खेतिहर मजदूरों में शामिल महिलाओं के बीच रोजगार के लिए पलायन करने की प्रवृति सबसे ज्यादा है जबकि पुरुषों में सबसे ज्यादा करने वाले गैर-खेतिहर मजदूर हैं।खेती-बाड़ी का काम मौसमी होता है और इस कारण जब खेती का काम नहीं हो रहा होता तो खेतिहर मजदूर दूसरी जगहों पर रोजगार हासिल करने के लिए चले जाते हैं।

 

  • एनसीआरएल के अनुसार विभिन्न राज्यों में खेती का विकास असमान रुप से हुआ है।इस वजह से जिन इलाकों में मजदूरी की दर कम है उन इलाकों से मजदूर ज्यादा मजदूरी वाले इलाके अथवा राज्यों में पलायन कर जाते हैं।

 

  • यह बात खासतौर पर हरित क्रांति के बाद हुई। बिहार के मजदूरों ने रोजगार के लिए पंजाब,हरियाणा और पश्चिमी उत्तरप्रदेश का रुख किया।

 

  • कम विकसित इलाकों में खेती के बुनियादी ढांचे पर सरकारी खर्चे की दर कम है।इससे देश के विभिन्न इलाकों के बीच खेती का विकास असमान रुप से हुआ है।

 

  • एनसीआरएल यानी नेशनल कमीशन ऑन रुरल लेबर के अनुसार देश में मौसमी तौर पर पलायन करने वाले मजदूरों की संख्या १ करोड़ से ज्यादा है।साल १९६० के बाद खेती के व्यावसायीकरण की प्रवृति तेज हुई और खेती में उन्नत तकनीक का चलन बढा।इससे खेती के काम में साल की एक खास अवधि में मजदूरों की मांग ज्यादा होती है।इसी अवधि में देश के विभिन्न इलाकों से एक तरफ मजदूरों का पलायन होता है तो दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर मजदूरों को उपलब्ध रोजगार में गिरावट आती है।

 

  • अगर किसी मजदूर को उसकी परंपरागत वास-भूमि में जीविका के साधन अथवा रोजगार के उचित अवसर उपलब्ध नहीं हो तो इस स्थिति में मजदूर पलायन कर सकता है।यह बात खास तौर पर १९९० के दशक पर लागू होती है जब खेती-बाड़ी के काम में रोजगार के सृजन में ठहराव आ गया जबकि इसी अवधि में ग्रामीण इलाकों में गैर-खेतिहर कामों में विस्तार की गति धीमी रही।

 

  • गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में सामाजिक और आर्थिक रुप से दयनीय दशा में रहने वाले अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों ने पिछले दशक में सामूहिक रुप से पलायन किया है।



Rural Expert
 

Write Comments

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Video Archives

Archives

share on Facebook
Twitter
RSS
Feedback
Read Later

Contact Form

Please enter security code
      Close