पलायन (माइग्रेशन)

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What's Inside

 

स्ट्रैंड वर्कर्स एक्शन नेटवर्क (स्वान) द्वारा तैयार की गई ‘टू लीव या नॉट टू लीव? लॉकडाउन, माइग्रेंट वर्कर्स एंड देयर जर्नीज् होम’ नामक रिपोर्ट के मुख्य अंश जानने के लिए कृपया यहां और यहां क्लिक करें.

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‘अनलॉकिंग द अर्बन: रीमैजिनिंग माइग्रेंट लाइव्स इन सिटीज पोस्ट-कोविड-19’(1 मई, 2020 को जारी) नामक रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्षों तक पहुंचने के लिए कृपया यहां क्लिक करें. आजीविका ब्यूरो की पूरी रिपोर्ट देखने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें.

कोविड संक्रमण से पहले के डेटा का उपयोग करके तैयार की गई आजीविका ब्यूरो की रिपोर्ट, अहमदाबाद और सूरत में रह रहे किस्म-किस्म के कार्य क्षेत्रों और विविध जातियों, लिंगों, भाषा समूहों और क्षेत्रों के प्रवासी श्रमिकों की जिंदगी की तस्वीर खिंचती है. इस रिपोर्ट के माध्यम से, रिपोर्ट के लेखकों ने "शहरी क्षेत्रों में प्रवासी श्रमिक सार्वजनिक प्रावधान जैसे कि आवास, पानी, स्वच्छता, भोजन, और स्वास्थ्य सेवा का कैसे फायदा ले पाते हैं?"

आजीविका ब्यूरो की रिपोर्ट ‘अनलॉकिंग द अर्बन: रीमैजिनिंग माइग्रेंट लाइव्स इन सिटीज पोस्ट-कोविड-19’(1 मई, 2020 को जारी) में अहमदाबाद और सूरत (गुजरात) में रह रहे प्रवासी श्रमिकों की सामाजिक-आर्थिक और आवासीय स्थिति पर प्रकाष डालती है और यह जानने की कोशिश करती है कि प्रवासी श्रमिक बुनियादी सुविधाओं और सेवाओं का उपयोग कैसे करते हैं. इसके अलावा प्रवासी श्रमिक इन सुविधाओं के लिए कैसे संघर्ष करते हैं और अर्बन प्लानिंग डिपार्टमेंट और प्रशासन इन मौसमी प्रवासियों की आवश्यकताओं का क्या जवाब देते हैं.

अहमदाबाद और सूरत सर्वेक्षण मुख्य रूप से 2018 के दौरान अगस्त, सितंबर और अक्टूबर के महीनों में और 2019 के दौरान फरवरी, अगस्त, सितंबर और अक्टूबर के महीनों में किए गए थे. अहमदाबाद और सूरत सर्वेक्षण से उपलब्ध हुए डेटा से तैयार हुई इस रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष नीचे संक्षेप में प्रस्तुत किए गए हैं.

अहमदाबाद सर्वेक्षण से संबंधित मुख्य निष्कर्ष:

• अहमदाबाद में काम कर रहे लगभग 13 लाख मौसमी प्रवासी काम करते हैं. इस रिपोर्ट में अहमदाबाद की 32 जगहों से 285 श्रमिकों का सर्वेक्षण किया गया और उनमें से अधिकांश प्रवासी पांच प्रमुख क्षेत्रों में कार्यरत थे. निर्माण क्षेत्र में लगभग 80 उत्तरदाता (28.07 प्रतिशत) काम कर रहे थे, विनिर्माण (मैनुफैक्चरिंग) में 72 उत्तरदाता (25.26 प्रतिशत), होटल और ढाबे में 47 उत्तरदाता (16.49 प्रतिशत), 44 उत्तरदाता (15.44 प्रतिशत) सर पर बोझा ढोने और 42 उत्तरदाता (14.73 प्रतिशत) घरेलू सहायता क्षेत्र में काम कर रहे थे.

• मोटे तौर पर 174 उत्तरदाता (61.05 प्रतिशत) पुरुष थे जबकि 111 (38.94 प्रतिशत) उत्तरदाता महिलाएं थीं. कुल उत्तरदाताओं में से लगभग 44.6 प्रतिशत (127 उत्तरदाता) अनुसूचित जनजाति (एसटी), 23.5 प्रतिशत (67 उत्तरदाता) अनुसूचित जाति (एससी) थे, 12.3 प्रतिशत (35 उत्तरदाता) अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और 19.6 प्रतिशत (56 उत्तरदाता) सामान्य जातियों से थे. लगभग 176 उत्तरदाता (61.75 प्रतिशत) परिवार समेत प्रवास किए हुए थे और बाकी 109 उत्तरदाता (38.25 प्रतिशत) श्रमिक अकेले रह रहे थे. प्रवासी श्रमिक ज्यादातर राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा और छत्तीसगढ़ राज्यों से थे.

• अहमदाबाद शहर में रह रहे प्रवासी श्रमिकों की आवास स्थिति को समझने के लिए किराए के कमरे, काम की जगहों पर आवास और खुले स्थानों में बसने के तौर पर वर्गीकृत किया गया था. प्रवासियों के सर्वेक्षण में, 151 उत्तरदाता (लगभग 53 प्रतिशत) किराए के कमरों में रहते थे, 79 उत्तरदाता (27.7 प्रतिशत) कार्यस्थल पर रहते थे, 37 उत्तरदाता (लगभग 13 प्रतिशत) खुले स्थानों में रहते थे और 18 (6.3 प्रतिशत) उत्तरदाता कुछ अन्य तरीकों से रह रहे थे जैसे अर्ध स्थायी निवास. कारखाने में काम करने वाले श्रमिक और घरेलू श्रमिक ज्यादातर किराए के कमरों में रहे थे. कारखाने के श्रमिकों में 63.9 प्रतिशत (72 उत्तरदाताओं में से 46) और 83.3 प्रतिशत घरेलू श्रमिक (42 उत्तरदाताओं में से 35) किराए के मकान में रह रहे थे. निर्माण श्रमिकों के लगभग 41.3 प्रतिशत (80 उत्तरदाताओं में से 33) खुले स्थानों में रह रहे थे. मोटे तौर पर होटल श्रमिकों में किराए के घरों में 51.1 प्रतिशत (47 में से 24) और 48.9 प्रतिशत श्रमिक काम करने की जगह (47 में से 23) पर रह रहे थे.

• किराए के कमरों के लिए, 10 × 10 वर्ग फुट के पक्के कमरे के लिए मासिक औसत 3,022 / रुपये किराया था, जोकि अकुशल एसटी (आदिवासी) श्रमिकों के लिए बहुत महंगा था. इतने महंगे किराए के चलते अकेले श्रमिक 4-5 साथी श्रमिकों के साथ मिलकर एक कमरे में रहे थे. किराये का बाजार बिना किसी लिखित अनुबंध के अनियमित रुप से काम करता है. किराए पर दी जाने वाली सुविधाएं किरायेदार की मकान मालिक के साथ सद्भावना पर निर्भर करती हैं. कंस्ट्रक्शन वर्कर्स, सर पर बोझ ढोने वाले और होटल / ढाबे पर काम करने वाले ज्यादातर श्रमिक कार्यस्थल पर ही रह रहे थे. 

• कोई भी प्रवासी श्रमिक सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के माध्यम से सब्सिडी वाले खाद्यान्न नहीं प्राप्त कर रहा था. खुले स्थानों में रहने वाले श्रमिकों का सबसे ज्यादा खर्च भोजन पर हो रहा था(उनकी आय का लगभग 53 प्रतिशत). उनकी आय के प्रतिशत के रूप में भोजन पर खर्च, होटल / ढाबा श्रमिकों (17 प्रतिशत) के लिए सबसे कम था, इसके बाद घरेलू कामगार (42 प्रतिशत), कारखाना श्रमिक (43 प्रतिशत), बोझ ढोने वाले (44 प्रतिशत), और निर्माण श्रमिक (48) प्रतिशत) भोजन पर खर्च कर रहे थे. अक्सर किराए के मकानों में रह रहे कारखाने के श्रमिकों को अपने मकान मालिकों द्वारा बनाई गई दुकानों से राशन खरीदने के लिए मजबूर किया जाता था. कारखानों में रहने वाले और खतरनाक परिस्थितियों में काम करने वाले आदिवासी परिवार अपनी आय का सिर्फ 29 प्रतिशत भोजन पर खर्च कर रहे थे. इसका कारण यह  था कि तंबाकू का लगातार खाकर वह अपनी भूख मार लेते थे. ईंधन के लिए, खुले क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी परिवारों को प्लास्टिक के टुकड़ों से लेकर लकड़ी की छीलन तक विभिन्न सामग्रियों को एकत्र करना पड़ रहा था. जलाऊ लकड़ी खरीदने में 100 रुपए औसतन प्रति दिन खर्च करना पड़ता था, जोकि बहुतों के लिए संभव नहीं था.

• स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में, केवल 14.7 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने उपचार के लिए सार्वजनिक अस्पतालों को प्राथमिकता दी, 74.4 प्रतिशत ने निजी क्लीनिकों को प्राथमिकता दी, 14.4 प्रतिशत ने निजी अस्पतालों को प्राथमिकता दी, 5 प्रतिशत उपचार के लिए अपने गांवों में वापस लौट गए थे और 0.7 प्रतिशत ने शहरी स्वास्थ्य केंद्रों को प्राथमिकता दी. शहरी स्वास्थ्य केंद्र सुबह 9 बजे-शाम 6 बजे तक खुले रहते हैं, जोकि प्रवासियों के लिए दिहाड़ी का समय होता है और इसलिए स्वास्थ्य केंद्र जाने का मतलब उनकी दैनिक मजदूरी छूटना है. सार्वजनिक अस्पताल अक्सर विभिन्न प्रकार के अधिवास दस्तावेज दिखाने के लिए जोर देते हैं जो अक्सर प्रवासी श्रमिकों के पास उपलब्ध नहीं होते हैं. इसलिए वे इन अस्पतालों में नहीं जाते हैं. यहां तक कि उन 40 उत्तरदाताओं में से जिन्होंने कहा कि वे सार्वजनिक अस्पतालों को पसंद करते हैं, उनमें से 39 श्रमिक 3 साल से अधिक समय से अहमदाबाद में रह रहे थे. उनमें से लगभग 48 प्रतिशत सामान्य वर्ग के थे और केवल 20 प्रतिशत ही आदिवासी श्रमिक थे.

• अहमदाबाद शहरी विकास प्राधिकरण (AUDA) 10 वर्षों के लिए स्थैतिक योजना तैयार करता है जोकि शहरों की बदलती प्रकृति पर ध्यान न दिए जाने के कारण विफल साबित हुई है. AUDA अधिकारियों के अनुसार, श्रमिकों के लिए आवास वास्तव में शहरीकरण योजनाओं का हिस्सा ही नहीं है. एएमसी ने विस्तार या भूमि सुधार अभियान शुरू कर, खुले स्थान में रहने वाले श्रमिकों को सरकार द्वारा निर्मित रैन बसेरों में प्रवासी श्रमिकों को भेजने की कई बार कोशिश की है, लेकिन अक्सर ऐसे प्रयास असफल रहे हैं, क्योंकि रैनबसेरों की अपर्याप्तता और उनकी अपर्याप्त क्षमताओं के कारण श्रमिक वहां नहीं रहते.

सूरत सर्वेक्षण से संबंधित मुख्य निष्कर्ष:

• सूरत, वह शहर है जिसकी अक्सर 2019-35 की अवधि के दौरान दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते शहरों के तौर पर गिनती होती है. इस शहर में 1980 के दशक के बाद से ही हीरा, कपड़ा, जहाज निर्माण और पेट्रोकेमिकल उद्योग में उछाल देखा गया. जिसके चलते प्रवासी श्रमिक भारी तादाद में यहां आने शुरू हुए. वर्तमान में, यहां काम करने वाले लगभग 70 प्रतिशत कर्मचारी प्रवासी हैं, जोकि स्थानीय लोगों के अनुपात के तौर पर देश में सबसे अधिक हैं. सूरत में सर्वेक्षण, शहर के 12 विभिन्न स्थानों में पावर लूम उद्योग में काम करने वाले 150 प्रवासी श्रमिकों के बीच किया गया था. कुल मिलाकर, 106 (70.7 प्रतिशत) अकेले रहने वाले पुरुष प्रवासी श्रमिक थे और 44 प्रवासी (29.3 प्रतिशत) शहर में अपने परिवारों के साथ रहते थे. लगभग 72 प्रतिशत श्रमिक ओडिशा (ज्यादातर गंजम जिले से) थे, 16 प्रतिशत बिहार से थे, 10 प्रतिशत उत्तर प्रदेश से थे, और 1 प्रतिशत प्रत्येक महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश से थे.

• लगभग 56 प्रतिशत उत्तरदाता ओबीसी थे, 26 प्रतिशत सामान्य वर्ग के थे, 10 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति वर्ग के थे और 6 प्रतिशत अनुसूचित जाति वर्ग के थे.

• श्रमिकों के आवास को तीन तरह से विभाजित किया गया, – होस्टल के कमरे जहां 25 उत्तरदाता (16.7 प्रतिशत) रह रहे थे, साझे कमरे यानी कमरे में साझे तौर पर 81 उत्तरदाता (54 प्रतिशत) रहते थे और परिवार के साथ किराए पर 44 उत्तरदाता (29.3 प्रतिशत) रह रहे थे. इस प्रकार, सभी अकेले प्रवास कर काम करने वाले पुरुष प्रवासी श्रमिक किसी न किसी तरह की साझा सुविधाओं में रह रहे थे. किराए के कमरों के मामले में कमरे का किराया 2500-4000 रुपए तक मिलता है जिनमें कई सारे कमरों के लिए एक सामान्य शौचालय की सुविधा होती है. इस तरह के कमरे को 2 से 10 तक प्रवासी साझा करते हैं. होस्टल कमरे में 500-1000 वर्ग फीट के बड़े बड़े हॉल होते हैं, जहां लगभग 100 श्रमिक दो शिफ्टों में रहते हैं. एक हॉल पर 2 शौचालय होते हैं. होस्टल कमरे के साथ प्रति दिन 2 बार भोजन दिया जाता है. प्रवासियों को कमरे के किराए के तौर पर Rs.400-Rs.600 और भोजन के लिए Rs.1,800-Rs.2200 रुपए तक भुगतान करना होता है. अधिकांश कमरे घुटन वाले थे. आमतौर पर पुराने पावर लूम स्पेस एक होस्टल के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं और होस्टल मैनेजर द्वारा चलाए जाते हैं. किराए के मकानों में रहने वाले प्रवासी परिवारों को 80 वर्ग फुट से 200 वर्ग फुट तक के कमरे के लिए 1,800-3800 रुपए तक किराया चुकाना पड़ रहा था.

• सभी प्रवासियों के पास शौचालय की सुविधा थी. लगभग 83 प्रतिशत उत्तरदाता अपने निवास स्थान पर साझा शौचालय इस्तेमाल कर रहे थे. लगभग एक-तिहाई प्रवासी साझा बाथरूम, 46 प्रतिशत कच्चे बाथरूम और लगभग 20 प्रतिशत निजी बाथरूम इस्तेमाल कर रहे थे. मोटे तौर पर, 93 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि उनके यहां पानी की निकासी के लिए सीवर व्यवस्था थी, लेकिन आमतौर पर रखरखाव ठीक तरह से न होने के चलते सीवर रुके पड़े थे. सूरत महानगर पालिका (एसएमसी) द्वारा स्थापित कचरा संग्रह स्थानों पर और सड़कों के आसपास अक्सर कचरा बिखरा हुआ पड़ा रहता है.

• प्रवासी श्रमिकों के लिए पानी के स्रोतों में बोरवेल, पाइप लाइन यानी टूटी से पानी और सरकारी टैंकर शामिल हैं. लगभग 79 प्रतिशत उत्तरदाताओं को एसएमसी द्वारा पीने के लिए पानी की उपलब्धता थी. इसके अलावा 76 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने पानी को फील्टर यानी शुद्ध नहीं किया. बिजली सभी श्रमिकों के पास उपलब्ध थी और शायद ही कभी बिजली का कट लगता हो. बिजली की लागत या तो किराए में शामिल थी (उत्तरदाताओं के दो-तिहाई के लिए) या मकान मालिकों को अलग से भुगतान किया जाना था. पानी और बिजली जैसी सुविधाओं की गुणवत्ता आमतौर पर मकान मालिक के साथ किरायेदार के संबंधों पर निर्भर रहती है. ईंधन के मामले में, सभी उत्तरदाताओं के पास एलपीजी सिलेंडर थे और खाना पकाने के लिए होस्टल मालिक आमतौर पर काला बाजारी से सिलेंडर खरीद रहे थे. 4-5 सदस्यों वाले परिवारों में एक महीने में एक सिलेंडर की खपत देखी गई.

• लगभग 92 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने बिमारी के उपचार के लिए निजी स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं जैसे निजी अस्पतालों, निजी क्लीनिकों, क्वैक्स आदि का उपयोग किया. लगभग 18 श्रमिकों (कुल उत्तरदाताओं का 12 प्रतिशत) ने पिछले वर्ष में किसी भी प्रकार की दुर्घटना की सूचना दी. अक्सर, श्रमिक किसी भी गंभीर बिमारी के इलाज के लिए अपने पैतृक गांवों में वापस जाना पसंद करते हैं. सूरत म्युनिसिपल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (एसएमआईएमईआर) जैसी सरकारी सुविधाओं में रियायती स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाने के लिए अधिवास दस्तावेजों की आवश्यकता के कारण प्रवासी श्रमिक वहाँ नहीं गए. आशा श्रमिक अक्सर प्रवासियों के मोहल्लों में दौरा नहीं करतीं, खासकर अगर मोहल्ले में रहने वाले ज्यादातर एकल पुरुष प्रवासी हो तों. इसके अलावा, केवल 31 प्रतिशत उत्तरदाताओं को आयुष्मान भारत जैसी सरकारी योजनाओं के बारे में पता था.

• प्रवासी श्रमिकों के लगभग 71 बच्चों को सर्वेक्षण के एक भाग के रूप में दर्ज किया गया. उनमें से 40 बच्चे स्कूल जाने की उम्र के थे, लेकिन उनमें से 30 प्रतिशत किसी भी तरह के स्कूल में नहीं जाते थे. इसके बजाय वे धागा काटने के काम को पूरा करने में अपनी माताओं की मदद कर रहे थे. जिन इलाकों में सर्वे हुआ, उनमें सरकारी स्कूलों की कमी थी. दस्तावेजों और सरकारी स्कूलों की कमी के अलावा भी गुजराती-माध्यम के स्कूलों के कारण भी प्रवासी अपने बच्चों को वहाँ दाखिला नहीं दिलवा पाए. हालांकि कुछ ओडिया माध्यम के स्कूल भी थे, लेकिन उनमें केवल 8 वीं कक्षा तक की कक्षाएं थीं. इस वजह से प्रवासियों के बच्चे दिहाड़ी-मजदूरी करने के लिए मजबूर थे. मोटे तौर पर 15 प्रतिशत बच्चे किसी समय आंगनबाड़ियों में गए. लगभग 14 प्रतिशत बच्चों का टीकाकरण बिल्कुल नहीं किया गया.

• लगभग 36 प्रतिशत उत्तरदाता (55 उत्तरदाता) प्रति माह Rs.15,000-Rs.17000 रुपये कमा रहे थे. अकेले रहकर काम कर रहे प्रवासी कामगार अपनी आय का 40-60 प्रतिशत अपने घर वापस भेज देते थे. वह स्थानीय दुकानदारों की मदद से अनौपचारिक तरीके से नेट बैंकिंग के माध्यम से घर पैसे घर भेज रहे थे, जिसके लिए दुकानदार प्रत्येक 1,000 रुपये के लेनदेन के लिए 10 से 20 रुपये तक का शुल्क लेते हैं. केवल 21 प्रतिशत श्रमिकों के पास सूरत के वोटर कार्ड थे और 31 प्रतिशत के पास सूरत के आधार कार्ड थे. केवल 21 प्रतिशत श्रमिकों के पास बैंक खाता था. परिवार-आधारित प्रवासियों में महिलाएं आमतौर पर अपने पति के नियोक्ता के लिए धागा काटने का काम कर रही थीं, जिसकी एवज में औसतन प्रति दिन 6 घंटे काम करने के बावजूद, प्रति माह 1,500 से रु 3,000 रुपये की मामूली तनख्वाह ही उन्हें मिल रही थी.

• लगभग 98 प्रतिशत श्रमिकों का क्षेत्र के किसी भी सरकारी अधिकारी से कभी कोई संपर्क नहीं था और केवल 8 उत्तरदाता (5.3 प्रतिशत) कभी पुलिस स्टेशन में गए थे. पुलिस इन श्रमिकों को कीड़े मकौड़े समझती है जो नशा करके हर छोटे मुद्दे पर एक-दूसरे के साथ लड़ते रहते हैं.

प्रवासियों की स्थिति और राज्य की प्रतिक्रिया

ऊपर दिए गए दो अनुभागों में हमने अहमदाबाद और सूरत में प्रवासियों श्रमिकों के जीवन-यापन चक्र को देखा. आजीविका ब्यूरो द्वारा किए गए इस अध्ययन के तीन शोध उद्देश्य हैं: 1) अहमदाबाद और सूरत में सर्कुलर प्रवासियों की बुनियादी सुविधाओं और सेवाओं तक पहुंच की स्थिति क्या है?; 2) यदि इन मूलभूत सुविधाओं का अभाव है, तो बुनियादी सुविधाओं और सेवाओं का फायदा लेने के लिए प्रवासी प्रशासन से कैसे बातचीत करते हैं;; और 3) अर्बन प्लानिंग डिपार्टमेंट और प्रशासन इन प्रवासियों के सवालों का क्या जवाब देते हैं और इन नीतियों का उनके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है?

• इस रिपोर्ट से हमें पता चलता है कि ये शहर किस तरह के विकास मॉडल की बिनाह पर टिके हैं. नव-उदारवादी विकास मॉडल जो पैदावार बढ़ाकर संचय करने के एकमात्र सिद्धांत पर काम करता है, जिसके कारण ही प्रवासियों की मूलभूत सुविधाओं तक पहुंच नहीं है. नव-उदारवादी विकास मॉडल ने राज्य के कल्याणकारी चरित्र को नकार दिया है और नियोक्ताओं को श्रमिकों के प्रति उनकी जिम्मेदारियों की अनदेखी कर मनमानी करने की हिम्मत दी है.

• ऐसे बहुतेरे अन्य कारण हैं जिनकी वजह प्रवासी राज्य द्वारा प्रदान की जाने वाली बुनियादी सुविधाओं का फायदा नहीं उठा पाते हैं, उनमें राज्य द्वारा प्रदान किए जाने वाले कल्याणकारी उपायों और योजनाओं की जानकारी का अभाव, कई नीतियों में प्रवासियों की उपेक्षा और राज्य के साथ हस्तक्षेप करते समय उत्पीड़न का डर शामिल है. आमतौर पर नियोक्ता नव-उदारवादी विकास मॉडल के अनुसार कार्य करते हैं और अधिक मुनाफा कमाने के लिए श्रमिकों का शोषण करते हैं, और कर्मचारियों के लिए कोई बुनियादी सुविधा प्रदान नहीं करते हैं. यह वर्षों के निरंतर संघर्ष के बाद प्राप्त हुए श्रम अधिकारों की अनदेखी कर किया जाने वाला एक ऐतिहासिक अन्याय है. नव-उदारवादी विकास मॉडल पूंजी को विशिष्ट प्रोत्साहन देने और श्रम नियमों को कमजोर करने के तौर-तरीकों के हिसाब से काम करता है. जबकि अर्ध-स्थायी प्रवासी और बसे हुए शहरी गरीब विभिन्न तंत्रों के माध्यम से बुनियादी सुविधाओं की मांग करने में सक्षम होते हैं, लेकिन प्रवासी मजदीर तो नागरिकता के अधिकारों या श्रम अधिकारों के लिए अपना दावा करने तक में सक्षम नहीं हो पाते.

• अध्ययन से पता चलता है कि बुनियादी सुविधाओं के अभाव में, प्रवासियों का एक अनौपचारिक कनेक्शन का एक नेटवर्क तैयार हो गया है, जिसमें आमतौर पर शहरी गरीब मुख्य सेवा प्रदाताओं के रूप में इन सुविधाओं के लिए बातचीत करते हैं. यह अनौपचारिक अर्थव्यवस्था अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग तरह से काम करती है और श्रमिकों और स्थानीय लौगों के बीच एक साथ संरक्षण और शोषण के अनियमित संबंधों में गूथी हुई है. अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ राजनीतिक अर्थव्यवस्था में गूथें होने के कारण इसके दो परिणाम निकलते हैं. सबसे पहले, अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में प्रवासी कोई ठोस मांग नहीं कर पाते हैं और इस तरह उनकों सुविधाएं देने के नाम पर मनमानी चलती है. दूसरा, यह एक महंगा और मानसिक व शारीरिक रुप से थकाऊ काम है.

• अनौपचारिक अर्थव्यवस्था की इस प्रकृति में अक्सर प्रवासी श्रमिकों की आवाज या मांग का कोई महत्व नहीं होता और इसकी वजह से उनके हकों के लिए बातचीत की बहुत कम जगह बचती है. इसके लिए एक उदाहरण यह तथ्य है कि प्रवासी वर्षों तक एक ही मकान मालिक से कमरा किराए पर लेकर रहने के बावजूद किराए या बिजली के लिए कोई लिखित एग्रीमेंट तक नहीं कर पाते हैं. अनौपचारिक अर्थव्यवस्था की प्रकृति अलग है और अक्सर स्थानीय राजनीति और शक्ति में गूथीं होती है. 

• अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में प्रवासियों के अनुभव अलग-अलग हैं. सामाजिक नेटवर्क वाली मौजूदा जातीय पहचान प्रवासी के अनुभव तय करती है. अहमदाबाद शहर में ओबीसी समुदायों के साथ एससी और एसटी समुदायों के अनुभव इस बिंदु को उजागर करने के लिए एक आदर्श उदाहरण के रूप में देखे जा सकते हैं. अपेक्षाकृत मजबूत सामाजिक नेटवर्क और ऊपर उठते सामाजिक स्तर के कारण ओबीसी समुदायों को मूलभूत सुविधाओं और सेवाओं का फायदा लेने में आसानी होती है. महिला प्रवासियों के अनुभव भी अलग-अलग हैं. महिलाओं को घर में अवैतनिक घरेलू श्रम के अलावा, बिजली के शुल्क, किराए और कच्चे माल की सुरक्षा से जुड़ी लागतों को बिड़ा उठाना पड़ता है.

• प्रवासियों को नागरिकों तौर पर नहीं बल्कि उपभोक्ताओं के तौर पर देखा जाता है. यह पूंजीवादी विकास और नव-उदारवादी शहरीवाद के दोहरे प्रतिमान के कारण है. प्रवासी शहरी विकास के नव-उदारवादी मॉडल के कारण और सरकार की नीतियों और योजनाओं में उनकी मांगों की अनदेखी के कारण किसी भी तरह की सुविधाओं की मांग करने में सक्षम नहीं हैं. प्रवासी राज्य और नियोक्ता से कानूनी तरीके से या संगठन बनाकर अपने हकों की मांग करने में सक्षम नहीं हैं. बुनियादी सुविधाओं के लिए हर दिन बड़े पैमाने पर लेन-देन होता है और उनको इन सुविधाओं की लागत न जाने कैसे-कैसे चुकानी पड़ती है.

•प्रवासियों के गले में अटकी गरीबी पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती है. चूंकि प्रवासियों को नागरिकों के बजाय उपभोक्ताओं के तौर पर देखा जाता है, इसलिए उनके पास अक्सर अपने बच्चों पर लगाने के लिए बहुत पूंजी नहीं होती. बच्चे अक्सर अपने माता-पिता के साथ दिहाड़ी-मजूरी करने लग जाते हैं या घर पर रहकर काम में अपनी माँ की मदद करने में लग जाते हैं. आमतौर पर ये बच्चे 14-15 साल की उम्र से ही काम करना शुरू कर देते हैं, क्योंकि उनके माता-पिता 30-40 साल की उम्र से ज्यादा काम नहीं कर पाते हैं. प्रवासियों के लिए न तो राज्य और न ही नियोक्ता, चाइल्डकेअर या प्राथमिक शिक्षा सुविधाएं प्रदान करते हैं.

• यह रिपोर्ट प्रवासियों के प्रति राज्य की नीतियों के प्रभाव को समझने की कोशिश करती है और इन नीतियों से जुड़ी समस्याओं पर प्रकाश डालती है. प्रवासियों के जीवन-यापन में राज्य की खामियों की प्रमुख भूमिका है. ये खामियां हैं: आसन्न बाधाओं की राजनीति, प्रावधान और पात्रता, शहरी नीति डिजाइन और उन नीतियों के कार्यान्वयन में बिना वजह के पूर्वाग्रह, उनकी कमाई के मानदंड से अधिक मूल्य निर्धारण, गतिशील शहरी विकास और श्रम प्रवाह, शहरी निकायों की सीमित स्वायत्तता और बजटीय शक्तियां, शहरी शासन और श्रम प्रशासन के बीच द्वंद्वाद, शहरों में उनकी उपस्थिति की अनदेखी और उनकी राजनीतिक लामबंदी की कमी.

• कई नीतियों के कार्यान्वयन के लिए जनगणना के आंकड़ों का उपयोग होता है. निवास स्थान से संबंधित जनगणना की परिभाषा के कारण, प्रवासी अक्सर जनगणना डेटा संग्रह में दर्ज ही नहीं किए जाते हैं. जनगणना एक लंबे अंतराल के बाद होती है, जिसकी वजह से अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के लपेटे में आए प्रवासियों के गतिशील प्रवाह के कारण उन्हें दर्ज नहीं कर पाती. जिसकी वजह से जनगणना के आंकड़ों में दर्ज न हो पाने के चलते आमतौर पर प्रवासी सरकारी योजनाओं से वंचित रहते हैं.

• एक अन्य कारक जो राज्य की नीतियों का अपुष्ट बनाता है, वह है इन नीतियों का बेवजह का पूर्वाग्रह. कई नीतियों का लाभ किसी व्यक्ति को तभी मिल पाता है, जब वह अपनी अधिवास स्थिति को साबित करने में सक्षम होता है. कई बार, प्रवासियों को इन नीतियों से अलग रखा जाता है क्योंकि वे अपने निवास संबंधित कागज नहीं जुटा पाते हैं. जब निवास का स्थायित्व प्राथमिक जरूरी शर्त बन जाता है, तो प्रवासी इन नीतियों से बाहर हो जाते हैं. स्वास्थ्य देखभाल जैसे कुछ डोमेन में, नागरिकता के आधार पर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ निर्धारण किया जाता है, जबकि कल्याणकारी योजनाओं तक पहुंच अधिवास स्थिति पर आधारित होती है. 

• कई योजनाओं से जुड़ी आय संबंधी शर्तों की वजह से प्रवासी बुनियादी सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं. इसका एक उदाहरण पीएमएवाई (प्रधानमंत्री आवास योजना योजना दिशानिर्देश, 2016) की किफायती आवास योजना है. लाभार्थी को योजना के तहत मिलने वाले आवास के मालिकाना हक प्राप्त करने के लिए लागत का 50 प्रतिशत वहन करना पड़ता है, जो कि सबसे सस्ती आवास इकाइयों के लिए लगभग रु 3,00,000 / - है, जिसकी लागत लगभग Rs.6,00,000 है. प्रवासियों के लिए यह लागत बहुत अधिक है और इस प्रकार इस तरह की शर्तें लगाकर उन्हें आवास जैसी बुनियादी सुविधा तक पहुंच से वंचित कर दिया जाता है.

• प्रवासियों के जीवन पर प्रभाव डालने वाला एक अन्य महत्वपूर्ण कारक शहरी नियोजन की स्थिर प्रकृति है. उदाहरण के लिए, 2002 में अहमदाबाद विकास योजना तैयार की गई थी और अगली योजना वर्ष 2021 में तैयार की जाएगी. लगभग 20 वर्षों के अंतराल में तो इन वर्षों में बहुत सारे जनसांख्यिकीय और अन्य परिवर्तन हुए हैं. इसका अर्थ यह भी है कि प्रवासियों की आमद को ध्यान में रखने की योजना प्रक्रिया के भीतर कोई प्रतिक्रिया तंत्र नहीं है.

• बजट की कमी के कारण भी नियोजन प्रक्रिया में समस्याएं आती हैं. स्थानीय निकायों की कंगाली विकेंद्रीकरण प्रक्रिया को प्रभावित करती है. अहमदाबाद और सूरत में होने वाले विकास के लिए अधिक पूंजी की आवश्यकता के बावजूद भी राज्य सरकार की तुलना में स्थानीय शहरी निकायों की इसमें बहुत कम हिस्सेदारी है. कुछ मामलों में स्थानीय सरकारें इसे हाशिए वाले वर्गों की समस्याओं को निपटाने की बजाय एक बहाने के रूप में उपयोग करती हैं. असल में, संस्थागत तंत्र की कमी के कारण शहरी सरकारों से सार्थक कदम उठाने की शक्तियां छीन ली गई हैं. 

• प्रवासियों के लिए कल्याणकारी योजनाओं की कमी का एक बड़ा कारण शहरी शासन और श्रम प्रशासन के बीच द्वंद्वाद होना भी है. हालांकि द्वंद्वाद की सटीक प्रकृति स्पष्ट नहीं है, विभिन्न अधिकारियों द्वारा निभाई जाने वाली भूमिकाओं पर स्पष्टता की कमी का प्रवासियों के जीवन पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है. उदाहरण के लिए, फैक्टरी अधिनियम और दुकानें और प्रतिष्ठान अधिनियम में कोई विशेष प्रावधान नहीं हैं जिनमें प्रवासी श्रमिकों की आवास आवश्यकताओं का प्रावधान हो. यह गौरतलब है कि कई मध्य स्तर के होटल और रेस्तरां बाद के अधिनियम के तहत पंजीकृत हैं और कई प्रवासी उस क्षेत्र में कार्यरत हैं.

• प्रवासी अपने अधिकारों के लिए राजनीतिक तौर पर लामबंद हो कर अपनी आवाज बुलंद करने में सक्षम नहीं हैं. प्रवासियों से उनके मतदान के अधिकार छीन लिए जाते हैं और इस प्रकार उनके पास अपनी राजनीतिक लामबंदी का दावा करने का कोई अवसर नहीं मिल पाता है. उदाहरण के लिए, पानी के लिए सार्वजनिक नलकूप के लिए आवेदन करने के लिए कोई दस्तावेज आवश्यक नहीं है. हालांकि, पानी की टूटी तक के आवेदनों को अक्सर वार्ड पार्षदों / अधिकारियों द्वारा उपेक्षित किया जाता है, क्योंकि उनमें से कोई भी किसी भी तरह से प्रवासी समुदाय के प्रति जवाबदेह नहीं है. राजनैतिक लामबंदी अहम भूमिका निभाती है, लेकिन उनकी राजनीतिक लामबंदी न होने के कारण वे उनकी आवाज कुचल दी जाती है.

• एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि प्रवासियों को नागरिक क्यों नहीं माना जाता है. इसका कारण ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच उनकी निरंतर आवाजाही है. उनके पास शहर में दस्तावेज़ नहीं हैं और न ही वे गाँव में उनके पास मौजूद दस्तावेजों को शहर में स्थानांतरित करते हैं, क्योंकि उनमें से अधिकांश गाँव को अपना घर मानते हैं. औपचारिक राज्य और अनौपचारिक राज्य प्रवासियों को वैध नागरिक के तौर पर नहीं मानते हैं जो अपने मूल अधिकारों के लिए दावा कर सकें. प्रवासियों के प्रति कई तरह के घटिया पूर्वाग्रह काम करते हैं क्योंकि उन्हें बाहरी लोग माना जाता है और यह उनकी विभिन्न पहचानों के माध्यम से प्रबलित होता है. इस संदर्भ में मोबाइल नागरिकता का विचार एक आकर्षक विचार है.

• स्थाई निवास के कागजात किसी भी नीति के लिए आवश्यक नहीं होने चाहिए, जिसका उद्देश्य प्रवासियों की मूलभूत सुविधाओं तक पहुँच में सुधार करना है. शहर में उनकी अस्थायी और गतिशील उपस्थिति के अनुरूप नागरिकता एक घूमंतु नागरिकता जैसी है. यह विचार ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच बहु-स्थानीयता और सही गतिशीलता (आसान आवाजाही) को समायोजित करने में मदद करेगा. मूलभूत सुविधाओं तक प्रवासियों की पहुंच के लिए स्थाई निवास आधारित वर्तमान नागरिकता के पैमानों की बजाय शहर के निर्माण में उनकी भूमिका पर आधारित होने चाहिए. यह उल्लेखनीय है कि मोबाइल नागरिकता का विचार शहर में बसने की एक प्रवासी की इच्छा को नुकसान नहीं पहुंचाता हो. बल्कि यह उन प्रवासियों के लिए अनुकूल होना चाहिए जो अपनी जड़ों को गाँव में बनाए रखना चाहते हैं यानी गांव से नाता रखना चाहते हैं और जो शहर में स्थायी या अर्ध-स्थायी तौर पर काम करना चाहते हैं. 

 

[बालू एन वरदराज और नबारुन सेनगुप्ता, जो टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, हैदराबाद से डेवलपमेंट स्टडीज (प्रथम वर्ष) में एमए कर रहे हैं. इन दोनों ने सोसाइटी फॉर लेबर एंड डेवलपमेंट द्वारा जारी की गई इस रिपोर्ट का सारांश तैयार करने में इनक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज की मदद की. बालू और नबारुन ने जून-जुलाई 2020 में इनक्लूसिव मीडिया फॉर चेंज प्रोजेक्ट में अपनी इंटर्नशिप के दौरान यह काम किया है.]



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