पलायन (माइग्रेशन)

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What's Inside

 

 

कोविड-19 की परिस्थितियों में प्रवासी मजदूर अपने घर-गांव पहुँचने लगे. वहां विकास संवाद ने स्थानीय सामाजिक संस्थओं के माध्यम से वापस लौटे प्रवासी मजदूरों की मनः स्थिति, सामाजिक स्थिति और निकट भविष्य के बारे में उनकी सोच का अनुमान लगाने के लिए एक तत्वरिक अध्ययन किया है. इस अध्ययन में 13 जिलों से औसतन 30-30 वापस लौटे प्रवासी मजदूरों से सघन संवाद करते हुए तत्वरिक अध्ययन प्रश्नावली का उपयोग करते हुए जानकारी इकट्ठा की गयी. इसमें कुल 435 प्रवासी मजदूरों से जानकारी एकत्र की गयी है. इसके साथ ही हर जिले से गुणात्मक जानकारी जुटाने के लिए 2-2 केस अध्ययन भी इकट्ठा किये गए. कोविड19 से उपजी अनिश्चितता के साए में - प्रवासी मजदूरों की बात नामक इस त्वरित अध्ययन रिपोर्ट के निष्कर्ष इस प्रकार हैं. (पूरी रिपोर्ट देखने के लिए यहां क्लिक करें.)

45.5% मजदूर परिवार के साथ और 54.5% अकेले पलायन पर गए थे.

31.9% प्रवासी कामगार 18-25 वर्ष, 26-40 वर्ष 43.9% और 24.2% प्रवासी मजदर 40 वर्ष से ज्यादा उम वर्ग में थे,

50.6% प्रवासी मजदूर निर्माण क्षेत्र में, 21% व्यापारिक इकाईयो/उद्यमों में और 16.7% कारखाना/उद्योग में कार्यरत थे. 26.8% मजदूर पलायन पर मध्यप्रदेश के भीतर के ही जिलों में जाते हैं, जबकि 16.1% गुजरात, 13.2% दिल्ली, नोएडा, गुडगाँव, फरीदाबाद आदि गए. 11.9% उत्तरप्रदेश और 6.5% महाराष्ट्र गए थे. 29.4% प्रवासी मजदूरों को औसतन रु. 201 से रु. 300 प्रतिदिन, 41.6% को रु. 301 से रु. 400 प्रतिदिन और 17.1% प्रवासी कामगारों को रु. 401 से रु. 500 प्रतिदिन पारिश्रमिक मिलता था.

56.5% लोग 3 से 6 महीने, 21.6% 3 महीने से कम और 16.8% मजदूर 6 से 11 महीने के लिए पलायन करते हैं.

93.2% मजदूर/कामगारों को किसी भी किस्म का नियुक्ति पत्र या अनुबंध पत्र नहीं दिया गया. इससे उनके कोई कानूनी अधिकार तय नहीं होते हैं.

चूंकि मजदूरी भुगतान की अवधि अलग-अलग होती है, जैसे किसी को दैनिक भुगतान होता है, किसी को साप्ताहिक या मासिक और किसी स्थिति में घर वापसी पर मजदूरी का भुगतान होता है, इसलिए कोविड19 के कारण अचानक हुए लाकडाउन के कारण 47 प्रतिशत मजदूरों को उनकी मजदूरी का पूरा भुगतान नहीं हुआ.

पूरा देश डिजिटल भुगतान की बयार से भीगा हुआ है, किन्तु अध्ययन से पता चला कि 85.8% प्रवासी मजदूरों को नकद भुगतान किया जाता है. इस कारण से भी कहीं कोई प्यपस्थित वैधानिक प्रमाण मौजूद

नहीं होता है. .81% प्रवासी मजदूरों ने बताया कि उन्हें किसी भी किस्म का अवकाश या छुट्टी नहीं मिलती है. जिस दिन वे काम पर नहीं जा पाते हैं. उस दिन उन्हें मजदूरी की राशि का घाटा होता है.

57.4% मजदूरों पर कोई कर्ज नहीं है.

कोविड19 के दौरान उपजी स्थितियां

जिस तरह का व्यवहार, आर्थिक असुरक्षा, संकट और दर्द का सामना हुआ है, उसके बाद अध्ययन क्षेत्र में वापस पहुंचे 54.6% प्रवासी मजदूर अब पलायन पर बिलकुल नहीं जाना चाहते हैं.

24.5% अभी तय नहीं कर पाए है कि अब वे पुनः जायेंगे या नहीं और यदि जायेंगे तो कब?

21% कामगार स्थितियां सामान्य होते ही पलायन पर जाना चाहेंगे. वापस पहुंचे 23% मजदूरों के पास 100 रुपये से भी कम भी राशि शेष बची थी.

7% मजदूरों के पास वापस पहुँचने के वक्त 1 रुपये भी शेष नहीं थे. 25.2% मजदूरों के पास रु. 101 से 500 रुपये शेष बचे ये और 18.1% के पास रु. 501 से 1000 रूपये शेष थे. केवल 11% मजदूर ऐसे थे, जिनके पास रु. 2001 से ज्यादा की राशि शेष थी.

91.2% प्रवासी मजदूर मानते हैं कि वे बेरोजगार के संकट में फंसेगे. 81% बीमारियों के फैलाव और उपचार व्यवस्था की कमी को संकट मानते हैं.

82.3% मानते हैं कि उन पर कर्ज का संकट आएगा, 76.5% भुखमरी फैलने की आशंका में भी हैं.

वापस आये 53.5% प्रवासी मजदूर मानते हैं कि उन्हें अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए जमीन, सामान, महिलाओं के गहने बेचने पड़ेंगे.

कोविड19 के संकट का सामना कैसे होगा?

90.3% प्रवासी मजदूर मानते हैं कि परिवार में उन सभी सदस्यों को रोजगार दिया जाए, जो कामकाज की उम में हैं.

93.9% मानते हैं कि सस्ता राशन सभी को मिलना चाहिए. अभी कई परिवार पीडीएस की सूची में शामिल नहीं है. कई परिवार ऐसे हैं, जिनके सदस्यों के नाम सूची से नदारद है.

100% प्रवासी मजदूर मानते हैं कि न्यूनतम मजदूरी डेढ़ गुना बढना चाहिए.

100% प्रवासी चाहते हैं कि बों और किशोरवय समूह को गुणवतापूर्ण शिक्षा और प्रशिक्षण मिलने से पलायन करने वाले मजदूरों की स्थिति में सकारात्मक बदलाव आएगा.

63.2% पेंशन या किसी न किसी रूप में प्रत्यक्ष आर्थिक सहयोग चाहते हैं.

87.7% प्रवासी मजदूर विकासखंड स्तर पर अच्छी स्वास्थ्य सेवाएँ चाहते है.

76.8% प्रवासी मजदूर आजीविका और आवास के लिए भूमि का कानूनी अधिकार चाहते है.

 



Rural Expert
 

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