पलायन (माइग्रेशन)

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What's Inside

 

फंसे हुए श्रमिकों के लिए एक्शन नेटवर्क (Stranded Workers Action Network-SWAN)) - जिसमें 70 से अधिक स्वयंसेवक शामिल हैं, जिनमें से ज्यादातर भोजन के अधिकार और काम के अधिकार के लिए कार्य करने वाले सिविल नागरिक समूह हैं, इन सामाजिक कार्यकर्ताओं ने 27 मार्च, 2020 से प्रवासी श्रमिकों के बीच काम करना शुरू कर दिया था. अब तक, स्वैच्छिक (SWAN) स्वयंसेवकों ने फंसे हुए प्रवासियों के 640 समूहों के कुल 11,159 श्रमिकों से बातचीत की है. तेजी से मूल्यांकन कार्रवाई सर्वेक्षण में एकत्र किए गए सभी आंकड़ें, 21 डेज एंड काउंटिंग: COVID-19 लॉकडाउन, प्रवासी मजदूर और भारत में कल्याणकारी उपायों की अपर्याप्तता (15 अप्रैल, 2020 को जारी) नामक रिपोर्ट में दिए गए हैं, जोकि 27 मार्च से लेकर - 13 अप्रैल, 2020 तक की समयावधि के दौरान इकट्ठा किए हैं.

शुरुआत में, स्वैच्छिक (SWAN) स्वयंसेवकों का उद्देश्य इस संकट में फंसे प्रवासी मजदूरों से फोन पर बात करना और उनकी मदद करना था. हालाँकि, प्रवासियों से डेटा एकत्र करने के लिए एक सामूहिक निर्णय जल्द ही लिया गया, साथ ही साथ उनकी बुनियादी जरूरतों पर भी ध्यान दिया गया.

अध्ययन के नमूने में, अधिकांश प्रवासी मजदूर महाराष्ट्र (39,923) में फंसे पाए गए, उसके बाद कर्नाटक (3,000) और फिर उत्तर प्रदेश (1,618) में. उत्तर प्रदेश में, , स्वैच्छिक (SWAN) स्वयंसेवकों को लगभग सभी कॉल कानपुर क्षेत्र से नोएडा और गाजियाबाद क्षेत्रों से कुछ कॉल आए थे. 

प्रवासियों की जरूरतों के आकलन के आधार पर, स्वैच्छिक (SWAN) स्वयंसेवकों की इस छोटी पहल के माध्यम से, प्रवासी मजदूरों को लगभग 3.87 लाख रुपये की सहायता, छोटी-छोटी मदद (लगभग 205 रुपये प्रति व्यक्ति) के रूप में पहुंचाई गई. इस प्रयास में अब तक 203 लोगों ने वित्तीय योगदान दिया है. कई व्यथित लोगों ने स्वैच्छिक (SWAN) स्वयंसेवकों से अधिक धन के लिए फिर दोबारा से संपर्क किया है क्योंकि सरकारी आपूर्ति तक उनकी पहुंच संभव नहीं हो सकी है और उनके पास उपलब्ध सभी संसाधन समाप्त हो गए हैं. राज्यों में स्थानीय प्रशासन की प्रतिक्रियाएँ अलग-अलग हैं.

फंसे हुए प्रवासी कामगारों की रूपरेखा:

• जिन 11,159 फंसे हुए प्रवासी कामगारों से स्वैच्छिक (SWAN) स्वयंसेवकों ने बात की, उनमें से 1,643 महिलाओं और बच्चे थे.

• मोटे तौर पर 79 प्रतिशत दैनिक वेतन कारखाने/निर्माण श्रमिक थे, 8 प्रतिशत गैर-समूह आधारित दैनिक वेतनभोगी जैसे ड्राइवर, घरेलू कामगार आदि थे और 8 प्रतिशत स्व-नियोजित थे जैसे फल-सब्जी विक्रेता, ज़री कार्यकर्ता आदि (यह आंकड़ा 3,900 फंसे हुए प्रवासियों से है जिन्हें स्वैच्छिक (SWAN) स्वयंसेवकों ने दर्ज किया है.)

• नमूने में औसत दैनिक वेतन 402 रुपये था और मंझला दैनिक वेतन  400 रुपये था.

• स्वैच्छिक (SWAN) स्वयंसेवकों के संपर्क में आने वाले प्रवासी वाले लगभग 28 प्रतिशत मूल रूप से झारखंड के थे, लगभग एक चौथाई बिहार से थे और लगभग 13 प्रतिशत उत्तर प्रदेश से थे.

• फंसे हुए लोगों में एक बहुत छोटी संख्या में कामगारों ने हाल ही में काम के लिए एक दूसरे राज्य में पलायन किया था, और लॉकडाउन की घोषणा होने से बमुश्किल कुछ समय पहले ही काम शुरू किया था.

 राज्य द्वारा दिए गए कुछ सार्थक आदेशों के बावजूद, वर्तमान रिपोर्ट के अनुसार स्वैच्छिक (SWAN) स्वयंसेवकों के संपर्क में आने वाले श्रमिकों की गवाहियां एक अलग तस्वीर बुनती हैं. 

21 डेज एंड काउंटिंग: COVID-19 लॉकडाउन, प्रवासी मजदूर और भारत में कल्याणकारी उपायों की अपर्याप्तता नामक इस रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष इस प्रकार हैं (एक्सेस करने के लिए कृपया यहां क्लिक करें):

• लगभग 50 प्रतिशत श्रमिकों के पास 1 दिन से कम समय का राशन बचा था.

• लगभग 96 प्रतिशत को सरकार से राशन नहीं मिला था और 70 प्रतिशत को कोई पका हुआ भोजन नहीं मिला था.

• मोटे तौर पर 78 प्रतिशत लोगों के पास 300 रुपये से भी कम रुपये बचे थे.

• लॉकडाउन के दौरान लगभग 89 प्रतिशत श्रमिकों को उनके नियोक्ताओं द्वारा भुगतान नहीं किया गया था.

• फंसे हुए प्रवासियों के लगभग 44 प्रतिशत कॉल "इमरजेंसी-एसओएस" थे, जिसमें उनके पास कोई पैसा नहीं बचा था या राशन ना होने के कारण भूखे रहना पड़ रहा था.

• भूख की दर राहत की दर से अधिक है. जिन लोगों के पास 1 दिन से कम राशन राशन बचा था, लॉकडाउन का तीसरा हफ्ता आते-आते उनकी संख्या 36 प्रतिशत से बढ़कर 50 प्रतिशत हो गई है, जबकि सरकारी राशन प्राप्त करने वाले लोगों की संख्या में 1 प्रतिशत से बढ़कर केवल 4 प्रतिशत इजाफा हुआ.

• जिन लोगों को सरकार या किसी स्थानीय संगठन से पकाया हुआ भोजन नहीं मिला उनकी संख्या पोस्ट लॉकडाउन के दूसरे सप्ताह के अंत से तीसरे सप्ताह के अंत तक 80 प्रतिशत से घटकर लगभग 70 प्रतिशत हो गई.

• सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई अपनी एक में बताया है कि 6 लाख प्रवासी जोकि राहत आश्रयों में हैं और 22 लाख प्रवासियों को भोजन उपलब्ध कराया गया है. यह आंकड़े अपने आपमें प्रवासियों के लिए किए गए कमजोर प्रंबधन का एक और संकेत है.

• कई विधानों में प्रवासी श्रम को रिकॉर्ड करना एक वैधानिक दायित्व है जो केंद्र और राज्य सरकारों पर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम (2005), अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिक अधिनियम (1979), और स्ट्रीट वर्कर्स एक्ट (2014) के तहत बाध्यकारी है. इसके अलावा अन्य श्रम कानून भी हैं जो यह आदेश देते हैं कि श्रमिक पूरी और समय पर मजदूरी के भुगतान के हकदार हैं. इसके अलावा विस्थापन भत्ता, यात्रा के दौरान मजदूरी का भुगतान सहित गृह यात्रा भत्ता जैसे भत्तों के भी हकदार हैं. प्रवासी श्रमिकों के लिए सुरक्षित वातावरण प्रदान करने हेतु इन कानूनों का अनुपालन सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है.



Rural Expert
 

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