पलायन (माइग्रेशन)

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अदृश्य नागरिकों की पुकार: देश के आतंरिक प्रवासी मजदूरों पर कोविड ​​-19 लॉकडाउन के प्रभाव का मूल्यांकन, (अप्रैल 2020 में जारी) नामक रिपोर्ट को ऐक्सेस करने के लिए कृपया यहां क्लिक करें.

यह रिपोर्ट 1.20 लाख से अधिक प्रवासी कामगारों के साथ काम करने वाली संस्था ‘जनसाहस’ द्वारा तैयार की गई है. इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए संस्था ने उत्तर और मध्य भारत के 3,196 प्रवासी निर्माण श्रमिकों (अर्थात् मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और अन्य राज्यों) के साथ टेलीफोनिक साक्षात्कार किए हैं. इस टेलिफोनिक सर्वेक्षण से प्राप्त आंकड़ें प्रवासी कामगारों के प्रति लापरवाही और उदासीनता की एक निर्मम तस्वीर उकेरते हैं.

रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष इस प्रकार हैं:

• सर्वेक्षण में शामिल किए गए लगभग 55 प्रतिशत श्रमिक चार व्यक्तियों के औसत परिवार को पालने के लिए 200 रुपये से लेकर 400 रुपये तक कमाते थे.

• लगभग 42 प्रतिशत मजदूरों ने बताया कि इस लॉकडाउन में खाने के लिए उनके पास एक दिन का राशन भी नहीं है.

• इस टेलिफोनिक सर्वेक्षण से पता कि 14 प्रतिशत मजदूरों के पास राशन कार्ड नहीं थे. इसलिए, रिपोर्ट लेखकों ने केंद्र और राज्यों द्वारा भूख से होने वाली मौतों को रोकने के लिए उन्हें राशन प्रदान करने के लिए तत्काल उपाय करने की सिफारिश की है.

• साक्षात्कार में शामिल 33 प्रतिशत मजदूरों ने बताया कि इस लॉकडाउन में वे अभी भी पलायित शहरों में बिना भोजन, पानी और पैसे के फंसे हुए हैं.

• 94 प्रतिशत मजदूरों (लगभग 5.1 करोड़ से अधिक मजदूरों) के पास भवन और अन्य निर्माण श्रमिक (BOCW) पहचान पत्र नहीं थे, जिसकी वजह से राज्यों द्वारा उसके 32,000 करोड़ BOCW कॉर्पस फंड से दी जाने वाली किसी भी सहायता का लाभ नहीं उठा पाएंगे.

• वर्तमान रिपोर्ट में लाभार्थी पहचान प्रणाली में संरचनात्मक खामियों पर प्रकाश डाला गया है जो संभवत: प्रवासी श्रमिकों तक सब्सिडी और राहत पहुंचाने में दिक्कतें पैदा करने वाली हैं.

• टेलिफोनिक साक्षात्कार से पता चलता है कि 17 प्रतिशत मजदूरों के पास बैंक खाते नहीं थे. इसलिए, रिपोर्ट लेखकों ने सिफारिश की है कि सरकार को समय पर प्रवासियों तक आर्थिक लाभ सुनिश्चित करने के कई दूसरे विकल्प भी तुरंत तलाशने चाहिए – संभवतः  जन धन खातों, आधार पहचान की मदद से नकद भुगतान के अन्य सरल तरीकों से ग्राम पंचायत और डाकघरों की मदद से जल्द ही नकद भुगतान करने चाहिए.

• टेलीफोनिक सर्वेक्षण में लगभग 31 प्रतिशत श्रमिकों ने बताया कि उन्होंने कर्ज लिया हुआ है और रोजगार के बिना उस कर्ज को चुकाना मुश्किल होगा.

• सर्वेक्षण से पता चलता है कि लगभग 90 प्रतिशत मजदूरों ने पिछले 1-3 हफ्तों में अपनी आय का स्त्रोत खो चुके हैं.(ठीक उस समय से पहले जब वर्तमान अध्ययन यानी 27-29 मार्च, 2020 को आयोजित किया गया था).

• मोटे तौर पर 62 प्रतिशत श्रमिकों को सरकार द्वारा उनके लिए घोषित आपातकालीन कल्याण उपायों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी और लगभग 37 प्रतिशत श्रमिकों को पता नहीं था कि मौजूदा योजनाओं का उपयोग कैसे किया जाए.

• निर्माण क्षेत्र देश की जीडीपी में लगभग 9 प्रतिशत का योगदान देता है और पूरे भारत में 5.5 करोड़ दैनिक मजदूरी वाले प्रवासी श्रमिकों की संख्या सबसे अधिक है. हर साल लगभग 90 लाख श्रमिक निर्माण स्थलों और कारखानों में काम की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों में जाते हैं.



Rural Expert
 

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