पलायन (माइग्रेशन)

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What's Inside

 

[inside]आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 (जनवरी, 2017 में जारी)[/inside] के अनुसार (एक्सेस करने के लिए कृपया यहां क्लिक करें):

भारत में श्रम प्रवास (लेबर माइग्रेशन) के नए अनुमानों से पता चला है कि अंतर-राज्य श्रम गतिशीलता पिछले अनुमानों की तुलना में काफी अधिक है.

नए डेटा स्रोतों और नई कार्यप्रणाली के विश्लेषण के आधार पर अध्ययन से यह भी पता चलता है कि पलायन तेज हो रहा है और विशेष रूप से महिलाओं के मामले में बढ़ोतरी देखने को मिली है. अध्ययन के लिए उपयोग किए गए डेटा स्रोत 2011 की जनगणना और रेल मंत्रालय के रेल यात्री यातायात प्रवाह (रेल यात्रा टिकट डेटा) और कोहॉर्ट-बेस्ड माइग्रेशन मेट्रिक (सीएमएम) सहित नई कार्यप्रणाली हैं.

नए कोहॉर्ट-बेस्ड माइग्रेशन मेट्रिक (सीएमएम) से पता चलता है कि 2001 और 2011 के बीच अंतर-राज्य श्रम गतिशीलता औसतन 50-65 लाख लोगों की थी, जिसमें लगभग 6 करोड़ की अंतर-राज्य प्रवासी आबादी और 8 करोड़ अंतर-जिला प्रवासी आबादी शामिल है.

• 2011-2016 की अवधि के लिए रेलवे डेटा का उपयोग करके आंतरिक कार्य-संबंधित पलायन का पहला अनुमान राज्यों के बीच 90 लाख प्रवासी लोगों के वार्षिक औसत प्रवाह का संकेत देता है. ये दोनों अनुमान, क्रमिक जनगणना (सेन्सस) द्वारा सुझाए गए लगभग 40 लाख की वार्षिक औसत गतिशीलता (एवरेज फ्लो) से काफी अधिक हैं और पहले किए गए किसी भी अध्ययन के अनुमानों से अधिक हैं.

इस नए अध्ययन से यह भी पता चलता है कि काम और शिक्षा के लिए पलायन में तेजी आ रही है. 2001-2011 की अवधि में श्रम प्रवासियों की वृद्धि दर 4.5 प्रतिशत प्रति वर्ष, जोकि पिछले एक दशक के सापेक्ष दोगुनी हो गई है. दिलचस्प बात यह है कि पलायन की गति विशेष रूप से महिलाओं में अधिक बढ़ी है और 2000 के दशक में पुरुषों की पलयान दर से लगभग दोगुना बढ़ी है. अंतर-राज्य पलायन में अकेले 20-29 साल की उम्र के श्रमिकों की संख्या लगभग 1.2 करोड़ क आंकड़े के साथ दोगुनी हो गई है. पलायन में इस तेजी के लिए एक प्रशंसनीय परिकल्पना यह है कि पुरस्कार (आय और रोजगार के अवसरों की संभावनाएं) उन लागतों और जोखिमों पर भारी पड़े, जिन्हें प्रवासी झेलते हैं. यह भी हो सकता है कि उच्च विकास और आर्थिक अवसरों की असीम संभावनाओं ने पलायन में आई इस तेजी के लिए चिंगारी का काम किया हो.

तीसरी, और एक संभावित रोचक खोज, जिसके लिए अस्थायी लेकिन कोई निर्णायक सबूत नहीं हैं. वह है कि बेशक राजनीतिक सीमाएं लोगों के प्रवाह को बाधित करती हों, लेकिन भाषा लोगों के प्रवाह के लिए एक बाधा अवरोधक नहीं साबित हुई है. उदाहरण के लिए, एक ग्रेविटी मॉडल दर्शाता है कि राजनीतिक सीमाएं लोगों के प्रवाह को बाधित करती हैं, यह तथ्य इस बात से पुष्ट होता है कि अंतर राज्य पलायन से राज्यों के भीतर (राज्य के अंदर पलायन) प्रवासी लोग 4 गुणा अधिक पलायन करते हैं. हालांकि, एक सामान्य भाषा के रूप में हिंदी का न होना भी राज्यों में व्यापार और लोगों के बीच कोई अवरोध पैदा नहीं करता है.

चौथा, इस अध्ययन में पाए गए प्रवासियों की आवाजाही के पैटर्न मोटे तौर पर उसी के अनुरूप हैं जो अपेक्षित है - कम संपन्न राज्यों से अधिक लोग दूसरे सम्पन्न राज्यों में पलायन करते हैं जबकि अधिकांश संपन्न राज्यों में प्रवासी मजदूर अपना डेरा जमाते हैं. राज्य स्तर पर सीएमएम स्कोर और प्रति व्यक्ति आय के बीच एक मजबूत सकारात्मक संबंध पाया जा सकता है. बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे अपेक्षाकृत गरीब राज्यों में नेट-माइग्रेशन अधिक है. नेट-इन-माइग्रेशन को दर्शाते हुए सात राज्य सकारात्मक CMM मूल्य लेते हैं: गोवा, दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक.

प्रवासियों तक कल्याणकारी लाभों को बनाए रखने और अधिकतम करने के लिए नीतिगत कार्रवाइयों में खाद्य सुरक्षा लाभों की सुवाह्यता सुनिश्चित करना, स्वास्थ्य देखभाल प्रदान करना और एक अंतर-राज्य स्व-पंजीकरण प्रक्रिया के माध्यम से प्रवासियों के लिए एक बुनियादी सामाजिक सुरक्षा ढांचा शामिल हैं: हालांकि वर्तमान में ऐसी कई योजनाएँ मौजूद हैं जिनका सीधा संबंध प्रवासी कल्याण से है. ऐसी योजनाएं राज्य स्तर पर कार्यान्वित की जाती हैं, इसलिए इनके लिए अंतर-राज्य समन्वय की अधिक आवश्यकता होती है.



Rural Expert
 

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